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बच्चों को शिक्षा दो, मौत नहीं?

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 रमेश ठाकुर।

पब्लिक स्कलों में जब दाखिला लेना होता है तो हर अभिभावक के जेहन में सुरक्षा को लेकर सवाल उमड़ने लगता है। इस मसले पर जब स्कूल प्रशासन से मंत्रणा की जाती है तो उस स्थिति में पब्लिक स्कूलों के मालिक सुरक्षा की दुहाई सीसीटीवी के कैमरों को आधार बनाकर तर्क देते हैं। उस दौरान उनका बस यही कहना होता है कि हमारे यहां इतने कैमरे लगे हैं, हर जगह कैमरे हैं।

इस गली में, उस गली में, यानी हर जगह कैमरे लगे होने की बात कही जाती है। मसलन उनकी सुरक्षा की सुई सीसीटीवी कैमरों पर ही रूक जाती है। पर, उनके दावे उस समय फुस्स हो जाते हैं जब स्कूलों से अनहोनी की घटनाएं सामने निकलती हैं। प्रबंधक स्कूलों में दो-ंचार कैमरे लगाकार हाथ खड़े कर लेते हैं। जो नाकाफी होते हैं। सीसीटीवी के भरोसे न रहकर स्कूलों में अब आमूलचूल सुरक्षा परिवर्तन की जरूरत है ताकि फिर ऐसे मामलों में पुलिस व न्यायिक सुस्ती की गुंजाइस न दिखे।

दिल्ली से सटे गुरूग्राम के रेयान इंटरनेशनल की घटना ने पूरे देश की आत्मा को झकझोर दिया है। अभिभावक डरे-सहमे हैं। पब्लिक स्कूलों की सुरक्षा को लेकर जब भी बात होती है तो स्कूल प्रबंधक सबसे पहले अपने यहां लगे सीसीटीवी कैमरों का हवाला देते हैं। लेकिन जब कोई घटना घट जाती है तो उनके कैमरे अचानक खराब हो जाते हैं। रेहान स्कूल में घटी घटना के बाद यही तर्क सामने आया। जबकि पूरे स्कूल में करीब 30 सीसीटीवी कैमरे लगे होने की बात कही गई है।

स्कूल के टाॅयलेट में भी कैमरा लगा था लेकिन हादसे के वक्त कैमरा खराब हो गया, या कर दिया गया था। ये थ्योरी स्कूल प्रबंधन और पुलिस की है जिसपर विश्वास करना बहुत मुश्किल हो रहा है। रेहान स्कूल में हुए सात साल के बच्चे के मर्डर ने पूरे देश के पब्लिक स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों की सुरक्षा को लेकर एक बार फिर सवाल खड़े कर दिए हैं। प्राइवेट स्कूलों के सामने बच्चों की सुरक्षा का फूलप्रूफ प्लान बनाने की बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है। एक बात हमें मानकर चलना चाहिए कि प्राइवेट स्कूलों में केवल सीसीटीवी कैमरे लगाने से ही समस्या हल नहीं हो सकता। वह इसलिए कि घटना के वक्त इनका चलना अदृश्य शक्ति के चलते बंद हो जाता है।

रेहान स्कूल की लापरवाही ने एक मां की गोद सूनी कर दी। बच्चे के विलाप में उनका रो-रोकर बुरा हाल है। उस मां के सारे सपने खत्म हो गए। बाप की उम्मीद भरे पंखों के पर कतर दिए। बिना कसूर के एक अबोध बच्चे का बेरहमी से कत्ल कर दिया गया। दोष सकूल की बस चलाने वाले कंडक्टर को दिया जा रहा है, जो किसी के गले नहीं उतर रही। पुलिस जिस तरह से स्कूल प्रबंधन व प्रिंसिपल को निर्दोश साबित करने में जुटी है उसे देखकर पुलिस की जांच भी संदिग्ध लग रही है।

रेयान स्कूल में बच्चे की हत्या टायलेट में चाकू से निर्मम तरीके से की गई। घटना का खुलासा तब हुआ जब स्कूल का एक माली टॉयलेट की ओर गया। हादसे के बाद गुस्साए लोगों ने स्कूल में तोड़फोड़ की। बच्चे के पिता एक निजी कंपनी में काम करते हैं। जो सुबह 7 बजकर 55 मिनट पर अपने 7 साल के बेटे पद्युमन को स्कूल छोड़कर गए थे। करीब 9 बजे उनके पास स्कूल से फोन आया कि उनके बेटे की गर्दन में चोट लगी है इसलिए वह भी जल्दी अस्पताल पहुंचे। बच्चे के पिता के अनुसार वह तुरंत उस अस्पताल में पहुंचे जहां का पता स्कूल ने उसे दिया था। लेकिन वहां से डॉक्टर्स उसे गुरुग्राम रेफर कर चुके थे।

वहां पहुंचते ही डॉक्टर्स ने पद्युम्न को मृत घोषित कर दिया। घटना की सूचना और टाइमिंग अनहोनी की तरफ इशारा कर रही है। सात वर्षीय प्रद्युम्न की हत्या पर पुलिस प्रशासन सच्चाई को दबा रही है। बड़ी मछलियों पर हाथ न डालकर स्कूल बस के कंडक्टर को गिरफ्तार किया है। डीसीपी क्राइम सुमित कुहाड़ का तर्क है कि ने घामडोज
गांव का रहने वाला करीब 42 साल का कन्डक्टर बच्चे के साथ दुष्कर्म करना चाहता था। उसने बच्चे के कपड़े भी उतार लिए थे लेकिन बच्चे के विरोध के कारण वह अपने मंसूबे में कामयाब नहीं हो पाया और उसने उसकी हत्या कर दी।

पुलिस की इस थ्योरी में झोल-ही-झोल दिखाई पड़ता है। कंडक्टर को अगर कुकर्म जैसे कोई कृत्य करना ही था तो स्कूल परिसर या टाॅयलेट का चुनाव नहीं करता। स्कूल बस उसके लिए सुरक्षित जगह हो सकती थी। निश्चित रूप से इसमें किसी और का हाथ है। स्कूल प्रशासन खुद को बचाने के लिए हर हथकंड़े अपना रहा है। मृतक बच्चे के अभिभावक चीख-चीख कर स्कूल प्रबंधकों के नाम ले रहे हैं। लेकिन पुलिस बेखबर है। सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर स्कूल में बच्चों के लिए बने वाथरूम में वयस्कों और बाहरी स्टाफ की एंट्री क्यों थी?

पूरा मामला सीधे-सीधे स्कूल प्रशासन की लापरवाही का ही प्रतीत होता दिख रहा है। यहां बच्चों की सुरक्षा को लेकर अलग से कोई इंतजाम नहीं किया गया था। मामला किसी भी तरह से शांत हो इसके लिए पुलिस ने बस कंडक्टर को फिलहाल पकड़ लिया है। पब्लिक स्कूल फीस के नाम पर खुलेआम लूट मचा रहे हैं। इसके बाद भी सुरक्षा का मुद्दा उनके लिए खास मायने नहीं रखता। दुख इस बात का है कि स्कूलों की इस मनमानी पर लगाम लगाने का कोई सरकारी बंदोबस्त नहीं है। न ही सरकारी तौर पर और न ही स्थानीय प्रशासन के तौर पर।

स्कूल माफिया खुलकर अभिभावकों की जेब काटने का धंधा कर रहे हैं और वो भी बेरोकटोक। हैरानी की बात ये है कि इस तरफ न तो सरकार का कोई ध्यान है और न ही हमारे देश की सर्वोच्च अदालत इस बात को संज्ञान में ले रही है। शायद संविधान में कोई ऐसी व्यवस्था ही नहीं की गई है कि स्कूलों की ऐसी किसी मनमानी पर सरकार या संवैधानिक एजेंसियां किसी भी तरह लगाम लगा सकें। रेहान स्कूल की घटना भी समय के साथ सुस्त हो जाएगी। जब तक मीडिया में खबरें चलेंगी, मामला तूल पकड़ता रहेगा। जैसे ही मीडिया अपना ध्यान हटाएगी। मामला शांत पड़ जाएगा।

पुलिस व स्कूल प्रशासन भी उसी घड़ी का इंतजार कर रहा है। अंग्रेजी को हासिल करने का चलन भारत में आग की तरह फैला हुआ है। जिस पब्लिक स्कूल में अभिभावक अपने बच्चों को पढ़ाना चाहते हैं उसकी सुरक्षा व तमाम सुविधाओं पर ध्यान नहीं देते। फीस के नाम स्कूलों की अंधी लूट मची हुई है। इसमें पुलिस-प्रशासन भी मिली हुई है। इसी कारण ये पब्लिक स्कूल वाले पब्लिक को खुलेआम लूट रहे हैं। स्कूल अब बड़ा व्यवसाय बनकर उभरा है। बेहताशा कमाई का जरिया माने जाने लगे हैं पब्लिक स्कूल। सिर्फ दिल्ली या उसके आस-पास की ही बात करें तो इस हिस्से में छोटे-बड़े पब्लिक स्कूलों की तादाद करीब 1785 है।

ये महज अनुमान है, मुमकिन है कि स्कूलों की तादाद इससे भी कहीं ज्यादा हो सकती है और इन 1785 स्कूलों में औसतन 3000 बच्चे हरेक स्कूल में पढ़ते हैं, यानी इन तमाम स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों की तादाद हुई करीब 53,55,000 और हरेक बच्चे के माता-पिता की जेब से अगर स्टेशनरी और स्कूल बैग के नाम पर स्कूल की तिजोरी में महज 1000 रुपये का औसत रख लें, तब भी ये आंकड़ा 5 अरब, 35 करोड़ रुपये पहुंचता है। यानी एक स्कूल के खाते में 30 लाख तीन हजार तीन सौ 65 रुपये। यानी बिना कुछ कहे और करे। स्कूल को सिर्फ अभिभावकों की जेब काटने की इजाजत देने के नाम पर ही 30 लाख रुपये की कमाई हो जाती है। हालांकि कमाई का ये आंकड़ा इससे कहीं ज्यादा बड़ा होगा।

मोटी फीस लेने वाला रेहान स्कूल में मेडिकल इमरजेंसी के लिए कोई इंतजाम नहीं था। स्कूल प्रशासन इसलिए भी सवालों में है क्योंकि यहां मेडिकल इमरजेंसी के लिए स्कूल में कोई इंतजाम क्यों नहीं था? वक्त रहते प्रद्युम्न को इलाज मिलता तो मासूम प्रद्युम्न की जान बच सकती थी। कई ऐसे मुद्दे सामने उभरकर आ रहे हैं जिससे साबित होता है कि रेहान इंटरनेशनल स्कूल की घोर लापरवाही रही। इस घटना के बाद पूरे देश के अभिभावकों के भीतर अपने बच्चों को लेकर भय का माहौल पैदा हो गया है क्योंकि सभी के बच्चे किसी न किसी स्कूल में पढ़ते हैं।

स्कूल प्रशासन पर कड़ी-से-कड़ी कार्रवाई करनी चाहिए। कंडक्टर घटना का मोहरा बना गया है असल सच्चाई कुछ और है। उसे बाहर लाना चाहिए। हालांकि उस सच्चाई को दबाने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी जाएगी। मामले की लीपापोती अभी से होनी शुरू हो गई है। स्कूल के भीतर लगीं तमाम राजनेताओं की फोटो से प्रतीत होता है कि उनकी पहुंच सफेदपोश तक है। इसलिए जांच को प्रभावित करने की कोशिश हो सकती है। लेकिन पूरा देश असल सच्चाई की प्रतीक्षा कर रहा है।

रमेश ठाकुर
पताः 5/5/6, द्वितीय तल, गीता कालोनी, दिल्ली-110031
संपर्कः 9350977026

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