अहमामऊ की दो सौ साल पुरानी जंग — जहां औरतें हारती नहीं, थामती हैं परंपरा”

लखनऊ से कुछ किलोमीटर दूर बसा अहमामऊ गांव इन दिनों काफी चर्चा में है। वजह है एक ऐसी अनोखी परंपरा, जिसमें मर्दों को पूरी तरह बाहर रखा जाता है, और औरतें पूरे गांव की कमान खुद संभालती हैं। ये परंपरा ‘हापा’ के नाम से जानी जाती है, जो हर साल नागपंचमी के बाद बड़े धूमधाम से मनाई जाती है।

यह कोई आम खेल या मेला नहीं, बल्कि औरतों की इज़्ज़त, ताक़त और परंपरा की पहचान बन चुका है। इसमें औरतें ना सिर्फ दंगल लड़ती हैं, बल्कि पूजा, तैयारी और इंतज़ाम भी खुद ही करती हैं।

ढोल-नगाड़ों की गूंज, औरतों की हुंकार

जब ढोलक बजती है, नगाड़े गूंजते हैं और औरतों की आवाज़ों से गांव गूंज उठता है, तो लगता है जैसे कोई देवी उतर आई हो। रंग-बिरंगे कपड़ों में सजी महिलाएं जब अखाड़े में उतरती हैं, तो माहौल जोश और श्रद्धा से भर जाता है।

लेकिन ये सब कोई तमाशा या शो नहीं है — ये हकीकत है उस लोक परंपरा की, जिसे अहमामऊ की औरतें पीढ़ी दर पीढ़ी निभा रही हैं।

यहां मर्दों की सख़्त मनाही है

‘हापा’ की सबसे खास बात ये है कि यहां मर्दों का आना बिल्कुल मना है। मैदान तो छोड़िए, अगर कोई मर्द अपनी छत पर खड़ा भी नज़र आ जाए, तो उसे भी हटने को कह दिया जाता है।

इस आयोजन में सिर्फ औरतें और छोटे बच्चे ही शामिल हो सकते हैं। यह कोई बगावत नहीं, बल्कि आस्था और इज़्ज़त से जुड़ा त्यौहार है, जिसमें औरतें खुद देवी की पूजा करती हैं और खुद ही दंगल लड़ती हैं।

गाली देकर होती है पूजा की शुरुआत – रीछ देवी का अनोखा रूप

इस रस्म की शुरुआत होती है ‘रीछ देवी’ की पूजा से, और वो भी एक अजीब से अंदाज़ में – देवी को गाली देकर बुलाया जाता है। आयोजन की अगुवा विनय कुमारी बताती हैं –

“रीछ देवी गाली से खुश होती हैं, तभी तो बरकत होती है और सब काम अच्छे से पूरा होता है।”

पूजा की टोकरी में फल, बताशे, सिंदूर, श्रृंगार का सामान और मिट्टी के खिलौने सजाए जाते हैं। साथ में गूंगे देवी, दुर्गा और भुईंया देवी की भी आरती होती है। इसके बाद ढोलक पर लोकगीतों का दौर चलता है – हँसी-मज़ाक, समाज पर तंज और परंपरा की बातें – सब कुछ इन गीतों में मिल जाता है।

अखाड़े में पसीना, मगर कोई हार नहीं

पूजा के बाद औरतें अखाड़े में उतरती हैं। कोई प्रोफेशनल पहलवान नहीं, कोई रेफरी नहीं – सब कुछ आपसी समझ और इज़्ज़त से चलता है। यह दंगल मुकाबले से ज़्यादा एक त्यौहार और एक बहनापा है।

इस बार शिखा सिंह चौहान भी अखाड़े में कूद पड़ीं। उन्हें गीता कुमारी से हार मिल गई, लेकिन वो मुस्कराते हुए कहती हैं:

“ये जीत-हार का खेल नहीं, ये हमारे अंदर की ताक़त और आस्था का ज़रिया है।”

पीढ़ियों की अमानत, अब बेटी संभाल रही है कमान

विनय कुमारी

विनय कुमारी, जो इस पूरे आयोजन की अगुवाई कर रही हैं, बताती हैं –

“मैंने ये रस्म अपनी दादी जनाका और मां विलासा से सीखी। अब मेरी बेटी शीला इसे आगे बढ़ा रही है।”

विनय कुमारी की बेटी शीला

शीला की बेटी भी तैयार है अगली बार अखाड़े में उतरने के लिए। विनय मुस्कुरा कर कहती हैं – “हमारी बेटियां अब बेटों से कम नहीं। अगली बार पूरा इंतज़ाम मेरी बड़ी बेटी संभालेगी।”

बिना नारेबाज़ी के औरतों का असली नेतृत्व

‘हापा’ किसी आंदोलन या विरोध का हिस्सा नहीं है। यह शांति से, आदर से समाज को आईना दिखाता है – कि जब औरतों को मौका दिया जाए, तो वो हर जिम्मेदारी बखूबी निभा सकती हैं।

यहां औरतें पूजा करती हैं, कुश्ती लड़ती हैं, गीत गाती हैं, आयोजन चलाती हैं – सब कुछ बिना किसी मर्द की मदद के। ये बताने की ज़रूरत नहीं कि असली ताक़त कहां है।

200 साल पुरानी परंपरा, आज भी जिंदा है

मुगल दौर के सिक्के

इतिहास बताता है कि करीब दो सौ साल पहले बेगम नूरजहां और कमरजहां ने इस रस्म की नींव रखी थी। उस दौर में अहमामऊ एक छोटी सी रियासत थी, जहां औरतों को कई तरह की पाबंदियों में रखा जाता था।

उन बेग़मों ने ये परंपरा शुरू की ताकि औरतें खुद को मज़बूत कर सकें – दिल से और शरीर से भी। विनय कुमारी के पास आज भी मुगल दौर के सिक्के मौजूद हैं, जो इस परंपरा की गवाही देते हैं।

अब अखाड़े की जगह भी तंग पड़ने लगी है। इस पर विनय की बेटी शीला कहती हैं –

“मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी को चाहिए कि इस ऐतिहासिक परंपरा के लिए एक स्थायी मैदान बनवाएं, ताकि हमारी बेटियां सही तरीके से कुश्ती सीख सकें और गांव का नाम रोशन करें।”

आख़िर में: ये सिर्फ दंगल नहीं, पहचान है

‘हापा’ कोई मामूली उत्सव नहीं – ये औरतों की हिम्मत, परंपरा और पहचान की आवाज़ है। यहां मर्दों की एंट्री बैन है, लेकिन औरतों का हौसला बुलंद है। वे दंगल ही नहीं जीत रही हैं – वो समाज की सोच भी बदल रही हैं।

ये परंपरा हमें याद दिलाती है कि असली ताक़त तलवार में नहीं होती, बल्कि उस सोच में होती है जो हर पीढ़ी को हिम्मत देती है आगे बढ़ने की।

अहमामऊ की बेटियां आज सिर्फ अखाड़े में नहीं, समाज के हर मोर्चे पर जीत दर्ज कर रही हैं।