कानून ही न्याय के कटघरे में: ढाई दशक बाद हुई कार्रवाई पर कोर्ट सख्त, पूर्व IPS अमिताभ ठाकुर की गिरफ्तारी पर उठे गंभीर सवाल

देवरिया। जब कानून के नाम पर की गई कार्रवाई खुद कानून के कटघरे में खड़ी हो जाए, तो उसे न्याय नहीं बल्कि ज्यादती कहा जाता है। शनिवार को देवरिया की मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (CJM) अदालत में कुछ ऐसा ही नज़ारा देखने को मिला, जब पूर्व आईपीएस अधिकारी अमिताभ ठाकुर की गिरफ्तारी को लेकर अदालत ने जांच एजेंसी की कार्यप्रणाली पर तीखे सवाल दागे। धोखाधड़ी के एक पुराने मामले में जेल भेजे गए अमिताभ ठाकुर की पेशी के दौरान अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि अब इस प्रकरण की जांच कोर्ट की निगरानी में होगी।
करीब 30 मिनट तक चली सुनवाई में विवेचक अदालत के सवालों के सामने निरुत्तर नजर आए। अदालत ने पूछा कि गिरफ्तारी की आवश्यकता आखिर क्यों पड़ी, सबूत कहां हैं और किस आधार पर आरोपी बनाया गया। लखनऊ से आए विवेचक इन सवालों का कोई संतोषजनक उत्तर नहीं दे सके। इस पर सीजेएम ने नाराजगी जाहिर करते हुए कहा कि अब तक की विवेचना में ऐसा कुछ भी सामने नहीं आया है, जिससे यह साबित हो कि गिरफ्तारी अनिवार्य थी या आरोप प्रथम दृष्टया टिकाऊ हैं।
सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी सवाल उठाया कि मामला लगभग 25 वर्षों तक ठंडे बस्ते में क्यों पड़ा रहा और अचानक अब कार्रवाई क्यों की गई। गिरफ्तारी का समय, साक्ष्यों की स्थिति और विवेचना की मंशा पर सवाल उठाते हुए अदालत ने जांच एजेंसी की साख को संदेह के घेरे में ला खड़ा किया। कोर्ट का यह कहना कि अब जांच उसकी निगरानी में चलेगी, अपने आप में जांच एजेंसी पर बड़ा अविश्वास माना जा रहा है।
पेशी के बाद अमिताभ ठाकुर ने आरोप लगाया कि उनके खिलाफ की गई कार्रवाई कानून नहीं बल्कि सियासी बदले का नतीजा है। उन्होंने कहा कि जैसे ही उन्होंने पूर्व सांसद धनंजय सिंह और कुछ प्रभावशाली नेताओं से जुड़े तथ्यों को सार्वजनिक किया, उनके खिलाफ साजिश रची गई। पुराने मामलों को फिर से जिंदा कर उन्हें जेल भेज दिया गया, जबकि असली आरोपी आज भी खुलेआम घूम रहे हैं।
पूर्व आईपीएस ने यह भी दावा किया कि मुकदमा दर्ज होने के अगले ही दिन रात करीब दो बजे पुलिस उन्हें उठाकर ले गई। जिस तरीके से रात के सन्नाटे में गिरफ्तारी की गई, उससे उन्हें एनकाउंटर का डर सताने लगा। उन्होंने कोडीन कफ सिरप मामले में भी जानबूझकर फंसाने का आरोप लगाया और कहा कि असली नेटवर्क अब भी सुरक्षित है।
अमिताभ ठाकुर के अधिवक्ता अभिषेक शर्मा ने अदालत में दलील दी कि मामला ढाई दशक पुराना है। यदि 25 साल में कोई ठोस सबूत नहीं मिला, तो अब अचानक गिरफ्तारी का क्या औचित्य है। उन्होंने इसे न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग बताते हुए कहा कि यह कार्रवाई दबाव में ली गई प्रतीत होती है।
अदालत ने अगली सुनवाई की तारीख 6 जनवरी तय करते हुए स्पष्ट कर दिया कि अब इस केस में किसी भी तरह की मनमानी बर्दाश्त नहीं की जाएगी और हर कदम कोर्ट की निगरानी में होगा। अमिताभ ठाकुर ने बताया कि न्यायालय के इस रुख के बाद उन्होंने अपना आमरण अनशन 15 जनवरी तक स्थगित कर दिया है। फिलहाल वह जेल में हैं और उनकी मेडिकल निगरानी जारी है।
मामले की पृष्ठभूमि पर नजर डालें तो अमिताभ ठाकुर पर आरोप है कि वर्ष 1999 में देवरिया में एसपी रहते हुए उन्होंने अपनी पत्नी नूतन ठाकुर के नाम औद्योगिक क्षेत्र में एक प्लॉट खरीदा था। प्लॉट आवंटन के दौरान पत्नी का नाम ‘नूतन देवी’ और पति का नाम ‘अभिजात’ दर्ज कराया गया था। यह प्लॉट ‘नूतन इंडस्ट्रीज’ के नाम अलॉट हुआ, लेकिन तीन वर्षों तक यहां कोई उद्योग स्थापित नहीं किया गया। सितंबर 2002 में इस जमीन की लीज डीड शराब और कंस्ट्रक्शन कारोबारी संजय प्रताप सिंह को ट्रांसफर कर दी गई। यह मामला सितंबर 2025 में लखनऊ के तालकटोरा थाने में दर्ज हुआ था, जिसके बाद एसआईटी गठित की गई और बाद में देवरिया सदर कोतवाली में भी केस दर्ज किया गया। 10 दिसंबर को शाहजहांपुर से अमिताभ ठाकुर की गिरफ्तारी कर उन्हें सीजेएम कोर्ट में पेश किया गया, जहां से उन्हें न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया।