
लखनऊ। अवधी विकास संस्थान ने रविवार को हास्य सम्राट और संस्थान के संरक्षक स्वर्गीय राजू श्रीवास्तव को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की। राजधानी स्थित संस्थान कार्यालय में आयोजित श्रद्धांजलि सभा में अध्यक्ष विनोद मिश्रा ने उनके चित्र पर पुष्प अर्पित कर उन्हें नमन किया। इस अवसर पर संस्थान के पदाधिकारी, कार्यकर्ता, साहित्यकार और समाजसेवी बड़ी संख्या में उपस्थित रहे।
संस्थान के अध्यक्ष विनोद मिश्रा ने कहा कि राजू श्रीवास्तव का व्यक्तित्व बहुआयामी था। वे केवल हास्य कलाकार ही नहीं बल्कि एक सच्चे समाजसेवी और अवधी संस्कृति के संवाहक भी थे। उन्होंने मंच और परदे पर अपनी अदाकारी से लोगों को हंसाया, लेकिन साथ ही समाज के गंभीर मुद्दों को व्यंग्य के जरिए सहजता से लोगों तक पहुँचाया। यही उनकी सबसे बड़ी ताकत थी।
सभा में वक्ताओं ने कहा कि राजू श्रीवास्तव ने अवधी बोली और संस्कृति को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई। उनकी कॉमेडी में अवधी तर्जुमा, किस्से और मुहावरे अक्सर झलकते थे। उन्होंने कभी अपनी जड़ों से दूरी नहीं बनाई और हमेशा लखनऊ और कानपुर की मिट्टी की खुशबू को अपने साथ रखा। वे जहां भी गए, अवधी संस्कृति का मान बढ़ाया।
संस्थान के पदाधिकारियों ने स्मरण किया कि राजू श्रीवास्तव ने कई बार संस्थान के कार्यक्रमों में मार्गदर्शन दिया और कहा था कि अवधी की असली ताकत उसकी लोकभाषा और लोककला में है। उनका मानना था कि जब तक लोकभाषाएँ जीवित रहेंगी, तब तक भारतीय संस्कृति की आत्मा भी जीवित रहेगी।
कार्यक्रम में मौजूद कार्यकर्ताओं और सदस्यों ने दो मिनट का मौन रखकर दिवंगत आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना की। साथ ही यह संकल्प लिया गया कि राजू श्रीवास्तव द्वारा दिखाए गए मार्ग पर चलकर संस्थान उनके अधूरे सपनों को पूरा करेगा और अवधी संस्कृति को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाने का प्रयास करेगा।
श्रद्धांजलि अर्पित करने वालों में समीर शेख, राजीव पाण्डेय, नीरज यादव, शुभम सहित अनेक लोग उपस्थित रहे। साहित्यकारों, पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने भी उन्हें श्रद्धासुमन अर्पित किए। सभी ने एक स्वर में कहा कि राजू श्रीवास्तव जैसा व्यक्तित्व विरले ही जन्म लेता है। वे हास्य और मानवीय संवेदनाओं के बीच पुल बनाने वाले कलाकार थे। उनके जाने से न केवल हास्य जगत बल्कि पूरा समाज एक सच्चे मार्गदर्शक से वंचित हो गया है।
सभा के अंत में संस्थान की ओर से यह घोषणा भी की गई कि हर वर्ष उनकी जयंती पर अवधी संस्कृति को समर्पित कार्यक्रम आयोजित किया जाएगा। इस अवसर पर राजू श्रीवास्तव के जीवन और कृतित्व पर आधारित स्मारिका भी प्रकाशित करने का निर्णय लिया गया।
राजू श्रीवास्तव को दी गई यह श्रद्धांजलि केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि उनके योगदान को याद करने और उसे आगे बढ़ाने का सामूहिक संकल्प था। उपस्थित जनसमूह की आँखें नम थीं, लेकिन दिलों में उनके प्रति अपार सम्मान और प्रेरणा से भरी श्रद्धा थी।