
लखनऊ। ऐतिहासिक मनकामेश्वर उत्पन्न घाट पर आज आस्था, भक्ति और सामाजिक समरसता का ऐसा दृश्य देखने को मिला, जिसने हर श्रद्धालु के मन को छू लिया। माँ आदि गंगा गोमती की पावन संध्या आरती के साथ संत शिरोमणि रविदास जयंती का भव्य आयोजन हुआ। गोमती तट पर जलते दीप, आरती की गूंज और संत रविदास के विचारों ने मिलकर इस संध्या को आध्यात्मिक ऊर्जा से भर दिया।
मनकामेश्वर मंदिर की छत्रछाया में स्थित उत्पन्न घाट पर जैसे ही संध्या आरती प्रारंभ हुई, गोमती की कल-कल बहती लहरें भी मानो भक्तों की भावना में शामिल हो गईं। आरती के मंत्रोच्चार, शंखनाद और दीपों की पंक्तियों ने घाट को दिव्यता से आलोकित कर दिया। इसी पावन वातावरण में संत शिरोमणि रविदास जी की जयंती का आयोजन सामाजिक एकता और मानवता के संदेश के साथ संपन्न हुआ।
संत रविदास जी का प्रसिद्ध संदेश— “मन चंगा तो कठौती में गंगा”—आज यहाँ साकार होता दिखा। श्रद्धालुओं और उपस्थित जनसमूह ने यह अनुभव किया कि सच्ची भक्ति बाहरी आडंबर में नहीं, बल्कि शुद्ध मन और सेवा भाव में निहित है। गोमती तट पर भजन-कीर्तन और संत रविदास के विचारों की प्रस्तुति ने समाज में समरसता, समानता और प्रेम का संदेश दिया।
आयोजन के दौरान श्रद्धालुओं ने माँ गोमती से प्रदेश और देश की सुख-समृद्धि की कामना की। दीपदान, आरती और भजनों के बीच घाट पर मौजूद हर व्यक्ति आध्यात्मिक शांति से ओतप्रोत नजर आया। भक्तों का कहना था कि मनकामेश्वर उत्पन्न घाट केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि लखनऊ की साझा संस्कृति और गंगा-जमुनी तहजीब का प्रतीक है, जहाँ हर वर्ग और समुदाय आस्था के सूत्र में बंधा दिखाई देता है।
संत रविदास जयंती के अवसर पर वक्ताओं ने उनके जीवन और शिक्षाओं पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि संत रविदास जी ने समाज को जाति, वर्ग और भेदभाव से ऊपर उठकर मानवता की राह पर चलने की प्रेरणा दी। आज के समय में उनके विचार और भी प्रासंगिक हो गए हैं, जब समाज को एकता और सद्भाव की सबसे अधिक आवश्यकता है।
माँ गोमती की आरती और संत रविदास जयंती के संयुक्त आयोजन ने यह संदेश दिया कि भक्ति और समाज सेवा एक-दूसरे के पूरक हैं। भगवान शिव की नगरी कही जाने वाली इस पवित्र भूमि पर, जहाँ आध्यात्मिक चेतना सदियों से प्रवाहित हो रही है, यह आयोजन लखनऊ की धार्मिक और सामाजिक पहचान को और सशक्त करता है।
कार्यक्रम के समापन पर सभी श्रद्धालुओं ने बाबा भोलेनाथ, माँ गोमती और संत रविदास जी से आशीर्वाद की कामना की। आयोजकों ने बताया कि इस तरह के आयोजन समाज को जोड़ने और नई पीढ़ी को सांस्कृतिक मूल्यों से परिचित कराने का माध्यम बनते हैं।
कुल मिलाकर, मनकामेश्वर उत्पन्न घाट पर आयोजित यह पावन संध्या केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं रही, बल्कि भक्ति, सेवा और सामाजिक समरसता का जीवंत उदाहरण बन गई। लखनऊ की इस पवित्र धरती पर गूंजता यह आध्यात्मिक स्वर लंबे समय तक श्रद्धालुओं के मन में गूंजता रहेगा।