
कुशीनगर। पडरौना नगर स्थित गोस्वामी तुलसीदास इंटर कॉलेज के करीब 700 छात्र इस वर्ष परीक्षा कक्ष तक नहीं पहुंच सकेंगे। मामला प्रशासनिक अनियमितताओं और कथित फर्जीवाड़े से जुड़ा है। जब छात्रों ने अंतिम उम्मीद के तौर पर इलाहाबाद उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया, तो न्यायालय ने ‘नो रिलीफ’ की टिप्पणी करते हुए तत्काल राहत देने से इंकार कर दिया।
न्यायालय ने आवेदन-पत्रों में पाई गई गंभीर अनियमितताओं को आधार बनाते हुए स्पष्ट किया कि परीक्षा प्रक्रिया में नियमों से कोई समझौता नहीं किया जा सकता। कोर्ट के इस सख्त रुख के बाद 700 छात्रों का पूरा शैक्षणिक वर्ष अधर में लटक गया है। बिना परीक्षा दिए ही उनका एक साल व्यर्थ हो गया।
🔴 कैसे फंसा 700 छात्रों का भविष्य?
बताया जा रहा है कि पंजीकरण और परीक्षा संबंधी औपचारिकताओं में गंभीर लापरवाही बरती गई। समय पर ऑनलाइन प्रविष्टियां, सत्यापन और आवश्यक दस्तावेज अपलोड नहीं किए गए। आरोप है कि नोडल अधिकारी विकास मणि त्रिपाठी निगरानी में विफल रहे, जबकि प्रधान लिपिक ज्ञान प्रकाश पाठक स्तर पर कागजी कार्रवाई में भारी चूक हुई।
जिला विद्यालय निरीक्षक (डीआईओएस) कार्यालय, जो अंतिम सत्यापन की जिम्मेदारी निभाता है, भी समय रहते त्रुटियों को पकड़ने में असफल रहा। जांच में सामने आया कि बोर्ड परीक्षा के लिए भेजे गए आवेदन-पत्रों पर अधिकृत हस्ताक्षर नहीं थे। नोडल अधिकारी के स्थान पर प्रधान लिपिक के हस्ताक्षर पाए गए, जिन्हें जांच में फर्जी माना गया। इसके आधार पर बोर्ड ने सभी संबंधित आवेदन निरस्त कर दिए और प्रवेश पत्र जारी नहीं किए गए।
🔴 परीक्षा छूटी, बिना फेल हुए बर्बाद हुआ साल
परीक्षा से वंचित छात्र अब असमंजस और निराशा में हैं। कई छात्रों का सपना सेना भर्ती, पॉलिटेक्निक या स्नातक प्रवेश का था। आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के लिए यह झटका सिर्फ शैक्षणिक नहीं, बल्कि मानसिक और आर्थिक आघात भी है।
एक छात्र ने कहा, “गलती अफसरों की थी, लेकिन सजा हमें मिली।” अभिभावकों ने दोषियों पर कठोर कार्रवाई और छात्रों के लिए विशेष परीक्षा या वैधानिक विकल्प की मांग की है।
🔴 न्यायालय का सख्त संदेश
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि शैक्षणिक प्रक्रियाओं में पारदर्शिता सर्वोपरि है। यदि आवेदन विधिसम्मत नहीं हैं, तो परीक्षा में बैठने की अनुमति नहीं दी जा सकती। अदालत ने यह भी संकेत दिया कि प्रशासनिक लापरवाही का समाधान नियमों को दरकिनार कर नहीं किया जा सकता।
🔴 जिम्मेदार कौन?
सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि फर्जी हस्ताक्षरों के लिए जिम्मेदार कौन है?
क्या दस्तावेज बिना नोडल अधिकारी की जानकारी के भेजे गए?
डीआईओएस कार्यालय ने समय रहते त्रुटि क्यों नहीं पकड़ी?
यदि हस्ताक्षर फर्जी पाए गए हैं, तो यह केवल प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि दंडनीय अपराध की श्रेणी में आता है। फिलहाल हाईकोर्ट से राहत न मिलने के बाद छात्रों के सामने अगला शैक्षणिक सत्र ही विकल्प बचा है। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि शासन स्तर पर पहल हो तो विशेष अनुमति या वैकल्पिक परीक्षा की संभावना तलाश की जा सकती है।
जब तक जिम्मेदारी तय नहीं होती, यह मामला शिक्षा व्यवस्था की पारदर्शिता और जवाबदेही पर बड़ा प्रश्नचिह्न बना रहेगा।