जहाँ फूल बने शोध और आस्था ने ओढ़ा विज्ञान का चोला: मनकामेश्वर मंदिर की अनोखी पहल

लखनऊ। आमतौर पर मंदिरों में चढ़ाए गए फूल पूजा के बाद आस्था की स्मृति बनकर रह जाते हैं, लेकिन लखनऊ स्थित ऐतिहासिक मनकामेश्वर मंदिर ने इस परंपरा को एक नई दिशा देते हुए धर्म, विज्ञान और पर्यावरण संरक्षण का अद्भुत संगम प्रस्तुत किया है। मंदिर परिसर में निर्माल्य यानी चढ़े हुए फूलों से दिव्य भस्म निर्माण एवं उत्पादों के विक्रय केंद्र का उद्घाटन देश की शीर्ष वैज्ञानिक और CSIR (Council of Scientific and Industrial Research) की महानिदेशक डॉ. एन. कलैसेल्वी के कर-कमलों द्वारा किया गया। यह आयोजन केवल एक धार्मिक या प्रशासनिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि एक ऐसी पहल का प्रतीक बना जिसने यह सिद्ध कर दिया कि विज्ञान और अध्यात्म एक-दूसरे के पूरक हो सकते हैं।


डॉ. एन. कलैसेल्वी की उपस्थिति ने इस पहल को राष्ट्रीय स्तर पर वैज्ञानिक मान्यता प्रदान की। उद्घाटन के दौरान उन्होंने मंदिर में अपनाई गई फूलों से भस्म निर्माण की तकनीक की सराहना करते हुए कहा कि यह प्रक्रिया वैज्ञानिक दृष्टि से सटीक, पर्यावरण के अनुकूल और टिकाऊ है। उन्होंने कहा कि मंदिरों से निकलने वाला अपशिष्ट यदि सही वैज्ञानिक विधि से प्रबंधित किया जाए, तो वह पर्यावरण के लिए बोझ नहीं बल्कि संसाधन बन सकता है। मनकामेश्वर मंदिर का यह मॉडल ‘जीरो वेस्ट’ अवधारणा को जमीन पर उतारने का प्रभावी उदाहरण है, जिससे गोमती नदी को प्रदूषण से बचाने में भी महत्वपूर्ण योगदान मिल रहा है।
इस अवसर पर मंदिर की महंत देव्या गिरि ने कहा कि यह पहल केवल भस्म निर्माण तक सीमित नहीं है, बल्कि यह समाज को यह संदेश देती है कि आस्था के साथ जिम्मेदारी भी जुड़ी होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि अध्यात्म का वास्तविक उद्देश्य प्रकृति, समाज और मानवता के प्रति संवेदनशीलता पैदा करना है। फूलों से भस्म निर्माण की यह प्रक्रिया उसी सोच का परिणाम है, जिसमें पूजा के बाद बचे निर्माल्य को सम्मानपूर्वक और उपयोगी रूप में परिवर्तित किया जा रहा है।
कार्यक्रम का एक खास पहलू यह रहा कि मंच पर विज्ञान और अध्यात्म की दो सशक्त महिला प्रतिनिधियों की उपस्थिति ने नारी शक्ति और नेतृत्व का सशक्त संदेश दिया। एक ओर देश की अग्रणी वैज्ञानिक डॉ. एन. कलैसेल्वी और दूसरी ओर अध्यात्म की ध्वजवाहक महंत देव्या गिरि—दोनों ने मिलकर यह दिखाया कि आधुनिक भारत में परंपरा और प्रगति साथ-साथ चल सकती हैं।
अब मंदिर परिसर में स्थापित विक्रय केंद्र से श्रद्धालु वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित, शुद्ध और पर्यावरण-अनुकूल तरीके से तैयार दिव्य भस्म एवं अन्य उत्पाद प्राप्त कर सकेंगे। यह पहल न केवल धार्मिक आस्था को नई सोच से जोड़ रही है, बल्कि यह भी साबित कर रही है कि यदि इच्छा शक्ति और नवाचार हो, तो परंपरागत संस्थान भी पर्यावरण संरक्षण और सतत विकास में अग्रणी भूमिका निभा सकते हैं।
मनकामेश्वर मंदिर की यह पहल आने वाले समय में देश के अन्य धार्मिक स्थलों के लिए भी प्रेरणास्रोत बन सकती है, जहाँ आस्था, विज्ञान और पर्यावरण एक साझा उद्देश्य के लिए एक साथ खड़े दिखाई दें।