महाकवि जयशंकर प्रसाद की प्रपौत्री डॉ. कविता प्रसाद की गरिमामयी उपस्थिति में वागीश्वरी साहित्यिक पटल का तृतीय वार्षिकोत्सव सम्पन्न

प्रयागराज। प्रयागराज स्थित साहित्यिक संस्था वागीश्वरी काव्य निर्झरिणी का तृतीय वार्षिकोत्सव दिनांक 18 जनवरी 2026 को अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी के रूप में भारतीय समयानुसार सायं 5 बजे ऑनलाइन माध्यम (गूगल मीट) से अत्यंत गरिमामय एवं सारस्वत वातावरण में सम्पन्न हुआ। इस अवसर पर देश-विदेश से जुड़े अनेक प्रतिष्ठित साहित्यकारों एवं काव्य-मनीषियों की सहभागिता रही। कार्यक्रम की अध्यक्षता अटलांटा, अमेरिका से पधारीं विदुषी डॉ. मृदुल कीर्ति ने की, जबकि मुख्य अतिथि के रूप में छायावादी महाकवि जयशंकर प्रसाद की प्रपौत्री एवं जयशंकर प्रसाद ट्रस्ट की अध्यक्ष डॉ. कविता प्रसाद (वाराणसी) की गरिमामयी उपस्थिति ने आयोजन को विशेष गौरव प्रदान किया।
कार्यक्रम का शुभारंभ संस्था के संस्थापक अध्यक्ष डॉ. अर्जुन गुप्ता ‘गुंजन’ के मार्गदर्शक उद्बोधन से हुआ। माँ सरस्वती की वंदना विभा रंजन सिंह द्वारा मधुर स्वर में प्रस्तुत की गई। स्वागत उद्बोधन विनीता निर्झर द्वारा दिया गया तथा कार्यक्रम का कुशल संचालन विभा रंजन सिंह ने किया। पटल व्यवस्थापक दुर्गादत्त मिश्र ‘बाबा’ ने संस्था से जुड़े अपने अनुभव साझा करते हुए काव्य-पाठ किया। पटल सलाहकार क्षमा पांडेय ने संस्था की साहित्यिक यात्रा एवं उपलब्धियों पर प्रकाश डालते हुए अपने सशक्त काव्य-पाठ से श्रोताओं को भावविभोर किया। वरिष्ठ संरक्षक विनीता निर्झर ने मंच से जुड़े अपने अनुभव साझा किए।
डॉ. अर्जुन गुप्ता ‘गुंजन’ ने संस्था की स्थापना, साहित्यिक गतिविधियों एवं भावी योजनाओं की विस्तार से जानकारी देते हुए बताया कि छंदों की पाठशाला/कार्यशाला के माध्यम से अब तक 90 छंद सिखाए जा चुके हैं। साथ ही संस्था के तत्वावधान में “संचेतना के स्वर” नामक त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका का नियमित संपादन किया जा रहा है तथा हिन्दी साहित्य के इतिहास पर क्रमवार ऑनलाइन संगोष्ठियों का आयोजन भी किया जाता है। विशिष्ट अतिथियों के रूप में डॉ. स्मिता सिंह (सिंगापुर), डॉ. मंजु रुस्तगी (चेन्नई), डॉ. अतिला कोतलावल (श्रीलंका) एवं आचार्या अनुराधा चंदर (न्यूयॉर्क, अमेरिका) ने अपने विचारों एवं काव्य-पाठ से साहित्यिक चेतना को समृद्ध किया।
मुख्य अतिथि डॉ. कविता प्रसाद ने अपने उद्बोधन में महाकवि जयशंकर प्रसाद के व्यक्तित्व, कृतित्व एवं उनके साहित्य की वैश्विक प्रासंगिकता पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने प्रसाद जी के पारिवारिक वातावरण, उनके नाटकों की विशेषताओं, मंचन परंपरा तथा महाकाव्य कामायनी की पृष्ठभूमि पर सारगर्भित चर्चा की। उन्होंने बताया कि जयशंकर प्रसाद के साहित्य में निहित भारतीय ज्ञान, दर्शन और सांस्कृतिक चेतना को वैश्विक पटल पर स्थापित करना उनके जीवन का प्रमुख उद्देश्य है।
अध्यक्षीय उद्बोधन में डॉ. मृदुल कीर्ति ने वैदिक एवं दार्शनिक ग्रंथों के काव्यात्मक रूपांतरण के अपने अनुभव साझा किए। उन्होंने हिन्दी वर्णमाला के ‘अ’ वर्ण के दार्शनिक पक्ष पर प्रकाश डालते हुए वेदों, उपनिषदों एवं श्रीमद्भगवद्गीता के श्लोकों के माध्यम से श्रोताओं को गूढ़ भारतीय दर्शन से परिचित कराया।
कार्यक्रम के अंतिम सत्र में दुर्गादत्त मिश्र ‘बाबा’ एवं अर्चना द्विवेदी ‘गुदालू’ के संयुक्त संचालन में देश-विदेश से जुड़े अनेक साहित्यकारों ने अपने अनुभव साझा किए तथा काव्य-पाठ प्रस्तुत कर साहित्यिक रसधारा प्रवाहित की। अंत में दुर्गादत्त मिश्र ‘बाबा’ ने आभार ज्ञापन प्रस्तुत किया तथा डॉ. अर्जुन गुप्ता ‘गुंजन’ ने कार्यक्रम की औपचारिक समाप्ति की घोषणा की। समग्र रूप से यह तृतीय वार्षिकोत्सव साहित्यिक सौहार्द, भाव-संवेदना और रचनात्मक ऊर्जा का स्मरणीय उत्सव सिद्ध हुआ।