रामराज्य में मार्क्सवाद का प्रवेश: डिप्टी सीएम की मुलाकात से निकला नया संकेत

लखनऊ।उत्तर प्रदेश की राजनीति में इन दिनों सियासी समीकरणों को लेकर हलचल तेज़ है। इसी बीच राजधानी लखनऊ में डिप्टी सीएम बृजेश पाठक और डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य की मुलाकात ने नए राजनीतिक संकेत छोड़ दिए हैं। सात कालिदास मार्ग स्थित सरकारी आवास पर हुई इस मुलाकात को शिष्टाचार भेंट बताया गया, लेकिन राजनीतिक गलियारों में चर्चा किसी और वजह से है। चर्चा का केंद्र बनी वह पुस्तक, जिसका शीर्षक है “मार्क्सवाद और रामराज्य”।

इस मुलाकात के बाद यह स्पष्ट नहीं हो पाया कि पुस्तक किसने किसे भेंट की, लेकिन यह साफ है कि इस किताब का ज़िक्र ही अब प्रदेश की राजनीति में विमर्श का नया बिंदु बन गया है। राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि किताब का शीर्षक अपने आप में दो विचारधाराओं का संगम है—एक ओर “मार्क्सवाद” जो वर्ग संघर्ष और समानता का दर्शन है, तो दूसरी ओर “रामराज्य” जो भारतीय परंपरा में आदर्श शासन और न्यायपूर्ण व्यवस्था का प्रतीक है।

विश्लेषकों के मुताबिक, इस पुस्तक का उल्लेख यह संदेश देता है कि उत्तर प्रदेश की राजनीति केवल जातीय समीकरण और विकास की बहस तक सीमित नहीं रह गई है। बीजेपी अब विपक्ष की “सामाजिक न्याय” वाली राजनीति को अपने ढंग से साधने की कोशिश कर रही है। जहाँ एक ओर विपक्ष जातीय जनगणना और असमानता जैसे मुद्दों को हवा दे रहा है, वहीं बीजेपी यह दिखाना चाहती है कि वह रामराज्य जैसे भारतीय आदर्शों के साथ-साथ समानता और न्याय के वैश्विक विमर्श को भी जोड़कर चल रही है।

यह मुलाकात ऐसे समय पर हुई है जब 2027 विधानसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक तापमान बढ़ता जा रहा है। पार्टी के भीतर भी विभिन्न चेहरों और समुदायों की भूमिका को लेकर समीकरण बन रहे हैं। ब्राह्मण और ओबीसी राजनीति के दो बड़े चेहरों का साथ आना, और उसमें “मार्क्सवाद और रामराज्य” जैसी किताब का प्रतीकात्मक प्रवेश, इस बात का संकेत माना जा रहा है कि बीजेपी अपने सामाजिक गठजोड़ को और व्यापक बनाने की तैयारी में है।

राजनीति में किताबें अक्सर सिर्फ कागज़ नहीं होतीं, बल्कि संदेश होती हैं। यह पुस्तक भी उसी श्रेणी में रखी जा रही है। इसे शिष्टाचार कहा जाए या रणनीति, इतना तय है कि लखनऊ की यह मुलाकात आने वाले महीनों में चर्चाओं का विषय बनी रहेगी।