निजीकरण के विरोध में बिजली-कर्मियों का प्रदेशव्यापी प्रदर्शन, उग्र-आंदोलन की चेतावनी

लखनऊ। उत्तर प्रदेश में बिजली कर्मियों का आक्रोश अब खुलकर सामने आने लगा है। उत्तर प्रदेश विद्युत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति के आह्वान पर चल रहे प्रदेशव्यापी जन-जागरण अभियान के तहत शुक्रवार को पश्चिमांचल विद्युत वितरण निगम के मेरठ मुख्यालय पर सैकड़ों बिजली कर्मचारी, अभियंता और संविदा कर्मी एकत्र हुए। इस दौरान प्रदेश के विभिन्न जनपदों में भी निजीकरण और कथित उत्पीड़नात्मक कार्रवाइयों के खिलाफ जोरदार प्रदर्शन किए गए और विरोध सभाओं के माध्यम से कर्मचारियों ने अपना विरोध दर्ज कराया।

सभा को संबोधित करते हुए संघर्ष समिति के संयोजक शैलेन्द्र दुबे ने पावर कॉर्पोरेशन प्रबंधन की डर और दमन की नीति की कड़ी आलोचना की। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि कर्मचारियों के खिलाफ की जा रही कार्रवाई तुरंत वापस नहीं ली गई तो प्रदेशभर में उग्र आंदोलन शुरू किया जाएगा, जिसकी पूरी जिम्मेदारी प्रबंधन की होगी। दुबे ने आरोप लगाया कि प्रबंधन गर्मियों में बिजली व्यवस्था को प्रभावित करने की मंशा से काम कर रहा है। उन्होंने पनकी और जवाहरपुर ताप बिजली घरों के संचालन और अनुरक्षण को 25 वर्षों के लिए निजी कंपनियों को सौंपने की प्रक्रिया को आंदोलन भड़काने वाला कदम बताया।

क्या कहना है पदाधिकारियों का

इस दौरान ऑल इंडिया पावर इंजीनियर्स फेडरेशन के सेक्रेटरी यशपाल शर्मा सहित कई केंद्रीय पदाधिकारियों जितेन्द्र सिंह गुर्जर, महेन्द्र राय, मोहम्मद वसीम, योगेन्द्र लाखा, आरसी पाल, सीपी सिंह और निखिल कुमार ने भी सभा को संबोधित किया। वक्ताओं ने पूर्वांचल और दक्षिणांचल विद्युत वितरण निगमों के निजीकरण, ओबरा और अनपरा परियोजनाओं को ज्वाइंट वेंचर के माध्यम से निजी हाथों में सौंपने, गंगा कैनाल की जल विद्युत परियोजनाओं को लीज पर देने तथा ट्रांसमिशन क्षेत्र में टैरिफ बेस्ड प्रतिस्पर्धी बोली के जरिए निजीकरण के प्रयासों का विरोध किया। उनका कहना था कि ये कदम न तो बिजली व्यवस्था के हित में हैं और न ही उपभोक्ताओं के लिए लाभकारी साबित होंगे।

इन कार्रवाइयों को तुरंत वापस लेने की मांग

वक्ताओं ने ग्रेटर नोएडा और आगरा में निजी कंपनियों के कार्यों को लेकर उपभोक्ताओं से मिल रही शिकायतों का भी उल्लेख किया और संबंधित कंपनियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की। संघर्ष समिति ने आरोप लगाया कि 3 दिसंबर 2022 को ऊर्जा मंत्री और शासन के साथ हुए लिखित समझौते का अब तक पालन नहीं किया गया है, जिससे कर्मचारियों में असंतोष बढ़ रहा है। साथ ही मार्च 2023 के आंदोलन के दौरान दर्ज एफआईआर, निलंबन, स्थानांतरण और अन्य अनुशासनात्मक कार्रवाइयों को तुरंत वापस लेने की मांग उठाई गई।

क्या-क्या है मांगे

कर्मचारियों ने डाउनसाइजिंग और वर्टिकल रिस्ट्रक्चरिंग के नाम पर हटाए गए संविदा कर्मियों की पुनर्बहाली, आउटसोर्स कर्मचारियों को आउटसोर्स सेवा निगम में समाहित करने, निलंबित कर्मचारियों की सम्मानजनक वापसी और लंबित अनुशासनात्मक मामलों को समाप्त करने की भी मांग की। इसके अलावा मई 2025 में सेवा नियमों में किए गए संशोधनों को तानाशाहीपूर्ण बताते हुए उनका विरोध किया गया। कर्मचारियों का कहना है कि बिना जांच और सुनवाई के सेवा समाप्ति जैसे प्रावधान पूरी तरह अस्वीकार्य हैं।

सभा में फेशियल अटेंडेंस के नाम पर वेतन कटौती, विरोध में शामिल होने पर स्थानांतरण, वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से अलग होने पर कार्रवाई और कर्मचारियों के आवासों पर जबरन स्मार्ट मीटर लगाए जाने जैसे मुद्दों को भी उठाया गया। संघर्ष समिति ने इन सभी कार्रवाइयों को तत्काल बंद करने की मांग की।

निजीकरण और उत्पीड़न के खिलाफ जारी रहेगा संघर्ष

संघर्ष समिति ने प्रदेश की जनता, किसानों और उपभोक्ताओं से अपील करते हुए कहा कि यह लड़ाई केवल कर्मचारियों की नहीं, बल्कि सस्ती, सुलभ और भरोसेमंद बिजली व्यवस्था को बचाने की है। उनका दावा है कि निजीकरण से उपभोक्ताओं पर आर्थिक बोझ बढ़ेगा और सेवाओं की गुणवत्ता प्रभावित होगी। वहीं संघर्ष समिति ने दोहराया कि बिजली कर्मी उपभोक्ताओं के हितों को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए आंदोलन के दौरान भी निर्बाध और बेहतर बिजली आपूर्ति सुनिश्चित करेंगे, साथ ही निजीकरण और उत्पीड़न के खिलाफ अपना संघर्ष जारी रखेंगे।