
मथुरा/कोसीकला। प्राकृतिक आपदाओं से फसलों को हुए नुकसान के मुद्दे पर एक बार फिर राजनीति तेज हो गई है। प्रदेश के अलग-अलग हिस्सों में कहीं कम तो कहीं ज्यादा फसली नुकसान हुआ है, लेकिन सबसे ज्यादा मार किसान झेल रहा है। इसके बावजूद राजनीतिक दलों के नेता मुआवजे की राजनीति में जुटे नजर आ रहे हैं।
प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ मंगलवार को वृंदावन आए और लौट भी गए, लेकिन बारिश से हुए फसली नुकसान को लेकर उन्होंने कोई ठोस बयान नहीं दिया। सत्ताधारी दल के जनप्रतिनिधि उनके स्वागत में तो पहुंचे, मगर किसानों की इस गंभीर समस्या को उनके सामने प्रभावी ढंग से नहीं रख सके।
अब हालात यह हैं कि विभिन्न राजनीतिक दलों के नेता गांवों में जाकर बर्बाद फसलों के बीच फोटोशूट कराते दिख रहे हैं। कहीं ट्रैक्टर पर बैठकर तो कहीं खेतों में खड़े होकर अपनी मौजूदगी दर्ज कराई जा रही है। अधिकारियों को ज्ञापन सौंपकर सभी दल खुद को किसानों का हमदर्द साबित करने की कोशिश में लगे हैं।
किसानों का कहना है कि सरकार जहां सम्मान निधि दे सकती है और उर्वरकों पर सब्सिडी दे सकती है, वहीं फसल बीमा व्यवस्था को प्रभावी क्यों नहीं बनाया जा रहा। नौहझील के प्रगतिशील किसान तेजपाल चौधरी के अनुसार बीमा कंपनियां आसानी से क्लेम नहीं देतीं और पटवारी स्तर पर भी रिपोर्ट लगाने में दिक्कतें आती हैं।
राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त किसान सुधीर अग्रवाल का कहना है कि जब व्यक्ति, पशु और वाहनों का व्यक्तिगत बीमा संभव है तो फसल बीमा व्यक्तिगत आधार पर क्यों नहीं किया जाता। उनका मानना है कि यदि एक किसान की भी फसल खराब होती है तो उसका सत्यापन कर उसे मुआवजा मिलना चाहिए।
कुल मिलाकर हर दल किसानों के हितैषी होने का दावा कर रहा है, लेकिन स्थायी और प्रभावी नीति की कमी साफ नजर आ रही है। किसान आज भी राहत की आस में है, जबकि राजनीति अपने चरम पर है।