भारत की Gen Z आबादी करीब 26% है, लेकिन संसद और विधानसभाओं में इनके सिर्फ 26 सांसद और विधायक हैं।

नई दिल्ली/अमर भारती। आज दुनिया भर में जिस पीढ़ी की सबसे ज्यादा चर्चा हो रही है, वह है Gen Z (जेनरेशन Z)। आमतौर पर 1997 से 2012 के बीच जन्मे युवाओं को इस पीढ़ी का हिस्सा माना जाता है। तकनीक के साथ पली-बढ़ी यह पीढ़ी अपनी सोच, काम करने के तरीके और सामाजिक भागीदारी के कारण पहले की पीढ़ियों से काफी अलग मानी जाती है।
Gen Z इंटरनेट, स्मार्टफोन, सोशल मीडिया, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), डिजिटल पेमेंट, ऑनलाइन एजुकेशन और कंटेंट क्रिएशन के दौर में बड़ी हुई है। यही कारण है कि यह पीढ़ी तकनीक का सबसे बेहतर उपयोग करना जानती है। पारंपरिक नौकरी के बजाय स्टार्टअप, फ्रीलांसिंग और क्रिएटर इकॉनमी की ओर इनका झुकाव भी अधिक देखने को मिलता है।
आंदोलनों में दिख रही नई पीढ़ी की ताकत
पिछले कुछ वर्षों में देशभर में हुए कई छात्र आंदोलनों और सामाजिक अभियानों में Gen Z की सक्रिय भूमिका देखने को मिली है। हाल के छात्र आंदोलनों में बड़ी संख्या में युवाओं की भागीदारी ने यह संदेश दिया कि यह पीढ़ी केवल सोशल मीडिया तक सीमित नहीं है, बल्कि जरूरत पड़ने पर अपने अधिकारों के लिए सड़कों पर उतरकर लोकतांत्रिक तरीके से अपनी आवाज भी बुलंद करती है।
सोशल मीडिया पर अभियान चलाने से लेकर धरना-प्रदर्शन, डिजिटल कैंपेन और जनमत तैयार करने तक Gen Z ने अपनी अलग पहचान बनाई है। यही वजह है कि अब इसे केवल “रील्स और वायरल ट्रेंड” वाली पीढ़ी नहीं, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों पर सक्रिय युवा वर्ग के रूप में भी देखा जा रहा है।
लेकिन राजनीति में क्यों नहीं दिखती Gen Z?
जहां एक ओर सड़कों और सोशल मीडिया पर Gen Z का प्रभाव साफ दिखाई देता है, वहीं संसद और विधानसभाओं में इनकी मौजूदगी बेहद कम है। भारत की कुल आबादी में Gen Z की हिस्सेदारी करीब 26 प्रतिशत मानी जाती है, लेकिन राजनीतिक प्रतिनिधित्व के मामले में यह आंकड़ा बेहद छोटा है। इसका सबसे बड़ा कारण चुनाव लड़ने की न्यूनतम आयु है।
भारतीय संविधान के अनुसार लोकसभा और विधानसभा चुनाव लड़ने के लिए न्यूनतम आयु 25 वर्ष निर्धारित है। चूंकि Gen Z का बड़ा हिस्सा अभी 25 वर्ष से कम आयु का है या हाल ही में इस आयु सीमा में पहुंचा है, इसलिए उनकी राजनीतिक भागीदारी अभी शुरुआती दौर में है।
संसद और विधानसभाओं में केवल 26 Gen Z जनप्रतिनिधि
इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के अनुसार, वर्तमान में देशभर की लोकसभा और विभिन्न विधानसभाओं में Gen Z के केवल 26 जनप्रतिनिधि हैं। इनमें 6 सांसद (MP) और 20 विधायक (MLA) शामिल हैं। यह संख्या बताती है कि देश की एक बड़ी युवा आबादी का राजनीतिक प्रतिनिधित्व अभी भी बहुत सीमित है।
किस पार्टी के पास कितने Gen Z सांसद और विधायक?
उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार विभिन्न राजनीतिक दलों में Gen Z जनप्रतिनिधियों की संख्या इस प्रकार है—
| राजनीतिक दल | Gen Z सांसद/विधायक |
|---|---|
| कांग्रेस (INC) | 7 |
| भारतीय जनता पार्टी (BJP) | 5 |
| तमिलगा वेट्री कझगम (TVK) | 3 |
| शिवसेना (शिंदे/संबंधित गुट, रिपोर्ट अनुसार) | 2 |
| DMK | 1 |
| AIADMK | 1 |
| JD(U) | 1 |
| जनसेना पार्टी | 1 |
| NPP | 1 |
| NCP (SP) | 1 |
| LJP (RV) | 1 |
| HSPDP | 1 |
| निर्दलीय | 1 |
क्या आने वाले वर्षों में बदलेगी तस्वीर?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अगले 5 से 10 वर्षों में बड़ी संख्या में Gen Z युवा चुनाव लड़ने की आयु सीमा में पहुंच जाएंगे। ऐसे में संसद और विधानसभाओं में इस पीढ़ी की भागीदारी तेजी से बढ़ सकती है।
डिजिटल माध्यमों पर मजबूत पकड़, नई सोच, पारदर्शिता की मांग और नीतिगत बहस में सक्रिय भागीदारी जैसी विशेषताएं भविष्य में भारतीय राजनीति का स्वरूप बदल सकती हैं। कई राजनीतिक दल भी अब युवा नेतृत्व को आगे बढ़ाने की रणनीति पर काम कर रहे हैं।
लोकतंत्र में युवाओं की बढ़ती भूमिका
आज का युवा केवल वोटर नहीं, बल्कि नीति, शासन और जवाबदेही पर सवाल पूछने वाला नागरिक भी बन रहा है। Gen Z पर्यावरण, शिक्षा, रोजगार, लैंगिक समानता, तकनीक और पारदर्शिता जैसे मुद्दों पर खुलकर अपनी राय रखती है। हालांकि, संसद और विधानसभाओं में उनकी संख्या अभी कम है, लेकिन सामाजिक और राजनीतिक विमर्श पर उनका प्रभाव लगातार बढ़ रहा है। आने वाले वर्षों में यही पीढ़ी भारत की राजनीति में निर्णायक भूमिका निभा सकती है।
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