वंदे मातरम के पूरे छंद गाने को लेकर कांग्रेस और नेशनल कॉन्फ्रेंस के बीच मतभेद खुलकर सामने आ गया है।

नई दिल्ली/अमर भारती। वंदे मातरम के पूरे छंद गाने को लेकर शुरू हुआ विवाद अब जम्मू-कश्मीर की राजनीति में भी चर्चा का बड़ा मुद्दा बन गया है। कांग्रेस की ओर से वंदे मातरम के दो छंद गाने की सलाह दिए जाने के बाद नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेताओं की प्रतिक्रियाएं सामने आईं और अब जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने भी अपनी सहयोगी पार्टी कांग्रेस को तीखा जवाब दिया है।
गुरुवार को पत्रकारों से बातचीत के दौरान उमर अब्दुल्ला से जब वंदे मातरम के सभी छंद गाने को लेकर सवाल पूछा गया तो उन्होंने कहा कि अब पूरे देश के लिए एक कानून है। उनके मुताबिक सरकारी कार्यक्रमों में पूरा वंदे मातरम गाना आवश्यक है और इसका पालन नहीं करने पर कार्रवाई हो सकती है। मुख्यमंत्री के बयान से साफ है कि नेशनल कॉन्फ्रेंस इस मुद्दे पर अपनी राजनीतिक और वैचारिक स्थिति को अलग मानती है, लेकिन साथ ही वह सरकारी कार्यक्रमों से जुड़े कानूनी प्रावधानों और प्रोटोकॉल का पालन करने की बात कह रही है।
राष्ट्रीय गीत को लेकर कानून का हवाला
उमर अब्दुल्ला ने कहा कि राष्ट्रीय गीत को लेकर कानून बनाया गया है और वंदे मातरम के सभी पद गाना अनिवार्य हो गया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह व्यवस्था सिर्फ जम्मू-कश्मीर तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे देश में लागू होती है। मुख्यमंत्री के मुताबिक सरकारी कार्यक्रमों के लिए यह एक प्रोटोकॉल है और सरकारी आयोजनों में इसका पालन करना जरूरी होगा। उन्होंने कहा कि नियमों का पालन नहीं करने पर कार्रवाई भी हो सकती है।
यही वह बिंदु है जहां उमर अब्दुल्ला ने कांग्रेस की सलाह पर सवाल उठाया। उन्होंने अपनी सहयोगी पार्टी से तीखे अंदाज में पूछा कि क्या कांग्रेस चाहती है कि इस मुद्दे पर कश्मीरियों को जेल भेज दिया जाए? उनका यह बयान कांग्रेस और नेशनल कॉन्फ्रेंस के बीच इस मुद्दे पर मतभेद की गंभीरता को सामने लाता है।
‘नेकां ने कभी वंदे मातरम को नहीं अपनाया’
उमर अब्दुल्ला ने अपनी पार्टी की स्थिति भी स्पष्ट की। उन्होंने कहा कि एक राजनीतिक दल के तौर पर नेशनल कॉन्फ्रेंस ने कभी वंदे मातरम को नहीं अपनाया है और भविष्य में भी इसे अपनाने की स्थिति नहीं है। हालांकि, उन्होंने साथ ही कहा कि पार्टी को कानूनी जरूरतों का पालन करना होगा। यानी उमर अब्दुल्ला की दलील के मुताबिक पार्टी की अपनी राजनीतिक या वैचारिक स्थिति अलग हो सकती है, लेकिन सरकारी कार्यक्रमों से संबंधित कानून और प्रोटोकॉल का पालन करना जरूरी है।
इस बयान ने पूरे विवाद को एक नया राजनीतिक आयाम दे दिया है। एक तरफ कांग्रेस अपने सहयोगियों को 1937 में कांग्रेस द्वारा अपनाए गए वंदे मातरम के संस्करण का सम्मान करने की सलाह दे रही है, तो दूसरी तरफ नेशनल कॉन्फ्रेंस अपने पुराने राजनीतिक रुख का हवाला दे रही है।
केसी वेणुगोपाल की सलाह के बाद बढ़ा विवाद
यह पूरा विवाद कांग्रेस सांसद केसी वेणुगोपाल के आठ सितंबर के सोशल मीडिया पोस्ट के बाद और ज्यादा चर्चा में आया था। केसी वेणुगोपाल ने नेकां के सहयोगियों से वंदे मातरम के दो छंद गाने की सलाह दी थी। उन्होंने अपने पोस्ट में कहा था कि वंदे मातरम का पूरा संस्करण भारत की आजादी की लड़ाई लड़ने वालों की मिली-जुली और अनेकतावादी सोच के अनुरूप नहीं है।
वेणुगोपाल ने कांग्रेस द्वारा 1937 में अपनाए गए राष्ट्रीय गीत के संस्करण का सम्मान करने की अपील की थी। उनकी यह टिप्पणी ऐसे समय आई जब श्रीनगर में इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल के उद्घाटन समारोह में मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला और नेशनल कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष फारूक अब्दुल्ला वंदे मातरम के पूरे गायन के दौरान खड़े रहे थे।
पूरे छह पदों के दौरान खड़े रहे उमर और फारूक
श्रीनगर में आयोजित कार्यक्रम के दौरान उमर अब्दुल्ला और फारूक अब्दुल्ला के पूरे वंदे मातरम के दौरान खड़े रहने की तस्वीर और जानकारी सामने आने के बाद राजनीतिक चर्चा और तेज हो गई। बताया गया कि अब्दुल्ला परिवार के दोनों नेता गीत के सभी छह पदों के दौरान खड़े रहे। इसके बाद कांग्रेस की ओर से वंदे मातरम के संस्करण को लेकर टिप्पणी और नेकां की प्रतिक्रिया ने INDIA गठबंधन के भीतर मतभेदों को भी चर्चा में ला दिया।
एक तरफ कांग्रेस के नेता वंदे मातरम के उस संस्करण की बात कर रहे हैं जिसे 1937 में अपनाया गया था, जबकि नेशनल कॉन्फ्रेंस अपनी राजनीतिक स्थिति और जम्मू-कश्मीर के संदर्भ में इसे देख रही है।
सहयोगी दलों के बीच बढ़ी वैचारिक खींचतान
कांग्रेस और नेशनल कॉन्फ्रेंस दोनों विपक्षी गठबंधन का हिस्सा हैं। ऐसे में वंदे मातरम जैसे संवेदनशील और भावनात्मक मुद्दे पर दोनों दलों के अलग-अलग रुख ने राजनीतिक बहस को और तेज कर दिया है।
उमर अब्दुल्ला का बयान इस लिहाज से भी महत्वपूर्ण है कि उन्होंने एक तरफ अपनी पार्टी के रुख को स्पष्ट किया, वहीं दूसरी तरफ कानून और सरकारी प्रोटोकॉल के पालन की बात कही। उन्होंने यह संदेश देने की कोशिश की कि पार्टी का अपना राजनीतिक नजरिया हो सकता है, लेकिन यदि किसी सरकारी कार्यक्रम के लिए कोई कानूनी प्रावधान या निर्धारित प्रोटोकॉल है तो उसका पालन करना होगा।
अब आगे किस दिशा में जाएगा विवाद?
वंदे मातरम को लेकर शुरू हुई यह बहस अब केवल गीत के पूरे या सीमित संस्करण तक सीमित नहीं रह गई है। यह मुद्दा कांग्रेस और नेशनल कॉन्फ्रेंस के बीच राजनीतिक और वैचारिक मतभेद को भी सामने ला रहा है।
केसी वेणुगोपाल की सलाह के बाद उमर अब्दुल्ला का तीखा जवाब बताता है कि सहयोगी दल होने के बावजूद दोनों पार्टियों के बीच इस मुद्दे पर सहमति नहीं है। उमर अब्दुल्ला ने साफ कहा है कि नेशनल कॉन्फ्रेंस ने कभी वंदे मातरम को पार्टी के तौर पर नहीं अपनाया और आगे भी नहीं अपनाएगी, लेकिन सरकारी कार्यक्रमों से जुड़ी कानूनी जरूरतों का पालन करेगी।
अब सवाल यही है कि कांग्रेस इस बयान पर क्या प्रतिक्रिया देती है और क्या दोनों सहयोगी दल इस विवाद को राजनीतिक टकराव में बदलने से रोक पाएंगे। फिलहाल वंदे मातरम के पूरे छंद गाने का विवाद कांग्रेस और नेशनल कॉन्फ्रेंस के बीच मतभेद की एक नई वजह बनकर सामने आया है।
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