भारत-चीन: बदलते जियोपॉलिटिकल हालात में भारत की अहमियत

डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग का सात साल बाद भारत दौरा ऐसे समय हुआ है, जब दोनों देशों के रिश्ते गलवान झड़प के बाद कई चुनौतियों से गुजरे हैं। इसके बावजूद भारत और चीन के बीच व्यापारिक संबंध मजबूत बने हुए हैं। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या बदलते जियोपॉलिटिकल हालात और चीन की आर्थिक चुनौतियां उसे भारत के करीब आने के लिए मजबूर कर रही हैं?
सात साल बाद भारत पहुंचे शी जिनपिंग
इस महीने की शुरुआत में किर्गिस्तान की राजधानी बिश्केक में आयोजित एससीओ बैठक के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से शी जिनपिंग की मुलाकात और हाथ मिलाने के बाद ही उनके भारत आने की अटकलें तेज हो गई थीं। 12 सितंबर को शी जिनपिंग ब्रिक्स की 18वीं बैठक में हिस्सा लेने के लिए नई दिल्ली पहुंचे।
यह सात साल में जिनपिंग की पहली भारत यात्रा है। 15 जून 2020 को पूर्वी लद्दाख की गलवान घाटी में भारत और चीन के सैनिकों के बीच हिंसक झड़प के बाद दोनों देशों के संबंधों में तनाव बढ़ गया था। इसके बाद रिश्तों में नरमी के संकेत तब दिखाई दिए, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 2025 में एससीओ की बैठक में हिस्सा लेने चीन पहुंचे।
अब सवाल यह है कि गलवान के बाद बढ़ी कड़वाहट के बीच ऐसा क्या बदला कि शी जिनपिंग भारत आने के लिए तैयार हुए। विशेषज्ञों के मुताबिक, इसके पीछे बदलते जियोपॉलिटिकल हालात के साथ-साथ चीन की अर्थव्यवस्था के सामने खड़ी चुनौतियों की भी भूमिका हो सकती है।
सीमा पर प्रतिद्वंद्वी, व्यापार में बड़े साझेदार
भारत और चीन की सेनाओं के बीच सीमा पर तनाव के बावजूद दोनों देशों के बीच व्यापार पर इसका बड़ा असर नहीं पड़ा है। दोनों देशों के बीच कुल व्यापार 151.5 अरब डॉलर का है। हालांकि, 2025-26 में चीन के साथ भारत का व्यापार घाटा बढ़कर 112.16 अरब डॉलर से ज्यादा हो गया।
भारत की औद्योगिक महत्वाकांक्षाएं भी कई क्षेत्रों में चीनी तकनीक और उत्पादों तक पहुंच से जुड़ी हुई हैं। भारत ने 2025 में चीन से करीब 57 अरब डॉलर के इलेक्ट्रॉनिक और इलेक्ट्रिकल उपकरण आयात किए।
यह आंकड़ा स्मार्टफोन, टेलीकॉम नेटवर्क और इलेक्ट्रॉनिक्स असेंबलिंग जैसे क्षेत्रों में चीनी कलपुर्जों पर भारत की निर्भरता को दिखाता है। भारत का दवा उद्योग भी चीन पर काफी निर्भर है और इसमें इस्तेमाल होने वाले ज्यादातर एपीआई चीन से आयात किए जाते हैं।
भारत चीन के लिए क्यों अहम है?
चीन के लिए भारत सिर्फ एक पड़ोसी देश नहीं, बल्कि उसके उत्पादों के लिए एक बड़ा बाजार भी है। 2025 में भारत में 15 करोड़ से ज्यादा स्मार्टफोन बिके। इनमें से 90 फीसदी स्मार्टफोन या उनके कलपुर्जे चीन से आयात किए गए थे।

शाओमी, वीवो और ओप्पो जैसी चीनी मोबाइल कंपनियों के लिए भारतीय बाजार महत्वपूर्ण रहा है। चीन की नजर भारत के कार बाजार पर भी है, जहां 2025 में 45 लाख कारों की बिक्री हुई।
इसके अलावा, 2020 से पहले भारत के स्टार्टअप इकोसिस्टम में चीनी कंपनियों ने अरबों डॉलर का निवेश किया था। अलीबाबा ग्रुप और टेनसेंट होल्डिंग्स ने पेटीएम, जोमैटो, ओला इलेक्ट्रिक और बाईजूज जैसी कंपनियों में भी बड़ी फंडिंग की थी।
गलवान के बाद निवेश और सप्लाई पर असर
2020 की गलवान झड़प के बाद भारत ने सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए कई चीनी कंपनियों के निवेश को मंजूरी देने से इनकार किया। दूसरी तरफ चीन ने भी अपनी कंपनियों को भारत को रेयर अर्थ मैटेरियल, कार निर्माण के लिए मैग्नेट और दूसरी चीजें बेचने से रोकने की कोशिश की थी।
इससे दोनों देशों के बीच आर्थिक रिश्तों में तनाव की एक नई परत जुड़ गई। हालांकि, व्यापारिक जरूरतें दोनों देशों को एक-दूसरे से जोड़े रखती हैं।
बदलते जियोपॉलिटिकल हालात ने बढ़ाई चुनौती
इस बीच वैश्विक जियोपॉलिटिक्स तेजी से बदली है। ट्रंप के टैरिफ और अमेरिका-ईरान युद्ध ने दुनिया भर में बिजनेस सेंटिमेंट को बड़ा झटका दिया है।
ऐसे माहौल में भारत और चीन दोनों के लिए आर्थिक और व्यापारिक हित महत्वपूर्ण बने हुए हैं। सीमा पर दोनों देशों के बीच प्रतिस्पर्धा और तनाव की अपनी जगह है, लेकिन व्यापार और औद्योगिक जरूरतों ने रिश्तों को पूरी तरह अलग होने से रोका है।
भारत-चीन रिश्तों में आर्थिक जरूरत कितनी अहम?
भारत के लिए चीन से आने वाले इलेक्ट्रॉनिक और इलेक्ट्रिकल उपकरण, कलपुर्जे और एपीआई महत्वपूर्ण हैं, जबकि चीन के लिए भारत एक बड़ा उपभोक्ता बाजार है। यही परस्पर निर्भरता दोनों देशों के रिश्तों को जटिल बनाती है।

शी जिनपिंग की सात साल बाद भारत यात्रा को इसी व्यापक संदर्भ में देखा जा रहा है। सीमा विवाद और रणनीतिक प्रतिस्पर्धा के बावजूद आर्थिक जरूरतें दोनों देशों के रिश्तों में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं।
बदलती दुनिया में भारत और चीन की नजदीकी की वजह
भारत और चीन के रिश्तों में गलवान के बाद पैदा हुई कड़वाहट खत्म नहीं हुई है, लेकिन व्यापारिक निर्भरता और बदलते वैश्विक हालात ने दोनों देशों के लिए संवाद की जरूरत को बनाए रखा है। चीन की खुद की आर्थिक और कारोबारी जरूरतें भारत के साथ उसके रिश्तों को प्रभावित करने वाली अहम वजहों में शामिल दिखाई देती हैं। (Expose India)
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