झारखंड के गिरिडीह स्थित पारसनाथ पहाड़ का धार्मिक, सांस्कृतिक और पर्यावरणीय महत्व। जैन समाज इसे सम्मेद शिखरजी के रूप में पवित्र तीर्थ मानता है, जबकि संताल समाज की धार्मिक परंपरा में इसे मरांग बुरु से जोड़ा जाता है।

डिजिटल डेस्क, गिरिडीह। झारखंड का Parasnath पहाड़ इन दिनों फिर एक ऐसे सवाल के केंद्र में है, जिसका जवाब सिर्फ जमीन की सीमा या प्रशासनिक आदेश से नहीं दिया जा सकता। यह सवाल आस्था का है, इतिहास का है, धार्मिक पहचान का है और उस साझा भूगोल का भी है, जिसे अलग-अलग समुदाय अपनी-अपनी स्मृतियों और परंपराओं के जरिए देखते हैं।
जैन समाज के लिए यही पर्वत श्री सम्मेद शिखरजी है—मोक्षभूमि, सिद्धक्षेत्र और भगवान पार्श्वनाथ सहित 20 तीर्थंकरों की निर्वाण स्थली। दूसरी ओर संताल आदिवासी समाज इसे मरांग बुरु के रूप में अपनी धार्मिक और सांस्कृतिक परंपरा से जोड़ता है। अगस्त 2026 में मरांग बुरु बचाओ संघर्ष मोर्चा की ओर से जैन संगठनों के दावों का विरोध किए जाने के बाद यह पुराना विवाद एक बार फिर सार्वजनिक बहस में आ गया है।
लेकिन इस विवाद को केवल ‘जैन बनाम आदिवासी’ के रूप में देखना इस पूरे प्रश्न को बेहद छोटा कर देना होगा। असल कहानी इससे कहीं अधिक पुरानी और जटिल है। यह उस भारत की कहानी है, जहां एक ही पहाड़ अलग-अलग समुदायों के लिए अलग-अलग अर्थ रख सकता है।
भगवान पार्श्वनाथ: अहिंसा, संयम और आत्मविजय का दर्शन
पारसनाथ के विवाद को समझने से पहले भगवान Parasnath के जीवन और दर्शन को समझना जरूरी है। जैन धर्म में भगवान पार्श्वनाथ को 24 तीर्थंकरों में 23वां तीर्थंकर माना जाता है। जैन परंपरा में तीर्थंकर केवल धार्मिक पूज्य व्यक्तित्व नहीं हैं, बल्कि वे उस आध्यात्मिक मार्ग के मार्गदर्शक माने जाते हैं जो मनुष्य को संसार के बंधनों से मुक्त होकर मोक्ष की दिशा में ले जाता है।
पार्श्वनाथ के दर्शन के केंद्र में अहिंसा, सत्य, अस्तेय और अपरिग्रह जैसे सिद्धांत हैं। इसका मूल भाव यह है कि मनुष्य अपने भीतर की हिंसा, लोभ, असत्य और अनावश्यक संग्रह की प्रवृत्ति पर विजय प्राप्त करे।
अहिंसा यहां केवल शारीरिक हिंसा से बचने तक सीमित नहीं है। जैन दर्शन में जीव मात्र के प्रति करुणा का भाव महत्वपूर्ण है। सत्य व्यक्ति के विचार और व्यवहार को अनुशासित करता है। अस्तेय का अर्थ है जो अपना नहीं है उसे ग्रहण न करना और अपरिग्रह का अर्थ है आवश्यकता से अधिक संग्रह की प्रवृत्ति से दूर रहना। यही कारण है कि जैन समाज के लिए पारसनाथ कोई सामान्य पहाड़ी नहीं है। यह उस आध्यात्मिक परंपरा की भूमि है, जिसमें तप, त्याग, संयम और मोक्ष की स्मृति जुड़ी हुई है।
पारसनाथ से सम्मेद शिखरजी तक
झारखंड सरकार के अनुसार Parasnath पहाड़ राज्य की सबसे ऊंची पहाड़ी है और इसकी ऊंचाई करीब 4,480 फीट है। यह गिरिडीह से लगभग 35 किलोमीटर दूर है। झारखंड सरकार के विवरण में पारसनाथ को जैन धर्म के सबसे महत्वपूर्ण और पवित्र स्थलों में शामिल किया गया है। जैन मान्यता के अनुसार 24 तीर्थंकरों में से 20 ने इसी क्षेत्र में मोक्ष प्राप्त किया। इनमें भगवान पार्श्वनाथ भी शामिल हैं।
यही कारण है कि जैन समाज इसे सम्मेद शिखरजी या शिखरजी के नाम से पुकारता है। यहां तीर्थयात्रा भी अपने आप में एक आध्यात्मिक साधना मानी जाती है। श्रद्धालु पहाड़ पर पैदल चढ़ते हैं, विभिन्न टोंकों की वंदना करते हैं और तीर्थंकरों के निर्वाण की स्मृति से स्वयं को जोड़ते हैं। इस धार्मिक परंपरा को समझे बिना पारसनाथ विवाद की गंभीरता को समझना संभव नहीं है। एक जैन श्रद्धालु के लिए यह सिर्फ जंगल, चट्टान और पहाड़ी रास्ता नहीं है। यह मोक्ष की स्मृति से जुड़ा हुआ तीर्थ है।
संताल समाज के लिए पारसनाथ क्यों है मरांग बुरु?
अब कहानी का दूसरा पक्ष सामने आता है। संताल आदिवासी समाज की धार्मिक-सांस्कृतिक परंपरा में मरांग बुरु का विशेष महत्व है। मरांग बुरु का अर्थ सामान्य तौर पर महान या सर्वोच्च पर्वत से जुड़ा है और संताल धार्मिक विश्वास में इसका विशिष्ट आध्यात्मिक स्थान है।
इसी कारण संताल समाज Parasnath को सिर्फ जैन तीर्थ के रूप में नहीं देखता। उसके लिए यह मरांग बुरु है। यही वह बिंदु है जहां दो धार्मिक परंपराएं एक ही भौगोलिक क्षेत्र में सामने आती हैं। जैन समाज की दृष्टि में यहां तीर्थंकरों की निर्वाण परंपरा है, जबकि संताल समाज की दृष्टि में यहां उनकी धार्मिक-सांस्कृतिक स्मृति और पारंपरिक आस्था मौजूद है। इस अंतर को समझे बिना विवाद को केवल अधिकार की लड़ाई कहना भी अधूरा होगा।
विवाद की असली जड़ क्या है?
Parasnath पहाड़ विवाद की जड़ सिर्फ यह नहीं है कि पहाड़ को कौन किस नाम से बुलाता है। असल सवाल है—इस क्षेत्र की धार्मिक पहचान, पारंपरिक पूजा-पद्धतियों, पर्यावरणीय नियमों और प्रशासनिक व्यवस्था में किस तरह संतुलन बनाया जाए? जैन समाज की प्राथमिक चिंता सम्मेद शिखरजी की पवित्रता है। वह चाहता है कि इस क्षेत्र में ऐसी गतिविधियां न हों जो तीर्थ की धार्मिक प्रकृति को प्रभावित करें।
संताल समाज की चिंता यह है कि उसकी पारंपरिक धार्मिक पहचान और पूजा-पद्धतियों को किसी दूसरी धार्मिक व्यवस्था के कारण सीमित न किया जाए। यहीं से मांस, मदिरा, पारंपरिक शिकार और पूजा-पद्धति जैसे प्रश्न विवाद का हिस्सा बन जाते हैं। जैन दर्शन में अहिंसा केंद्रीय सिद्धांत है। दूसरी ओर संताल समाज की कुछ पारंपरिक प्रथाओं का संबंध शिकार और प्रकृति-केंद्रित सामुदायिक परंपराओं से रहा है। दोनों धार्मिक दृष्टियों का यह अंतर जमीन पर प्रशासनिक व्यवस्था के लिए चुनौती पैदा करता है।
क्या यह विवाद नया है?
नहीं। Parasnath को लेकर धार्मिक और सांस्कृतिक अधिकारों की बहस पुरानी है। अलग-अलग समय में जैन धार्मिक संस्थाओं, स्थानीय समुदायों और प्रशासन के बीच क्षेत्र के उपयोग और प्रबंधन को लेकर सवाल उठते रहे हैं। इसलिए आज का विवाद अचानक पैदा हुई घटना नहीं है। इसके पीछे लंबे समय से मौजूद धार्मिक दावे, स्थानीय परंपराएं, प्रशासनिक निर्णय और कानूनी प्रक्रियाएं हैं। यही कारण है कि पारसनाथ को लेकर किसी भी नए विवाद को केवल आज की राजनीतिक या सामाजिक परिस्थिति से जोड़ना पर्याप्त नहीं होगा।
2023 में राष्ट्रीय स्तर पर क्यों गरमाया था पारसनाथ?
Parasnath विवाद ने जनवरी 2023 में देशव्यापी ध्यान खींचा था। उस समय जैन संगठनों ने सम्मेद शिखरजी की धार्मिक पवित्रता और क्षेत्र में पर्यटन संबंधी गतिविधियों को लेकर चिंता जताई थी। केंद्र के पर्यावरण मंत्रालय ने 5 जनवरी 2023 को 2019 की इको-सेंसिटिव जोन अधिसूचना के तहत पर्यटन और ईको-टूरिज्म से जुड़े प्रावधानों के क्रियान्वयन पर तत्काल रोक लगाने के निर्देश दिए थे।
केंद्र सरकार की ओर से उस समय यह भी कहा गया था कि सम्मेद शिखर की पवित्रता बनाए रखने के लिए आवश्यक कदम उठाए जाएंगे। इसके बाद जैन समुदाय की प्रमुख मांगों में तीर्थ क्षेत्र की धार्मिक प्रकृति को सुरक्षित रखना प्रमुख रहा। लेकिन उसी समय आदिवासी पक्ष ने भी अपनी चिंताएं सामने रखीं। यानी 2023 ने उस विवाद को राष्ट्रीय स्तर पर पहुंचाया, जिसकी जड़ें इससे कहीं पहले की थीं।
पर्यावरण का सवाल भी उतना ही महत्वपूर्ण
पारसनाथ का विवाद सिर्फ धर्म तक सीमित नहीं है। Parasnath वन्यजीव अभयारण्य लगभग 49.33 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला है। झारखंड वन विभाग के अनुसार यह क्षेत्र जैव विविधता से समृद्ध है और यहां मिश्रित पर्णपाती वन तथा विभिन्न प्रकार के वन्यजीव पाए जाते हैं। इसका अर्थ साफ है-पारसनाथ पर किसी भी गतिविधि को धार्मिक अधिकारों के साथ-साथ वन और पर्यावरण कानूनों की कसौटी पर भी देखा जाएगा।
यहीं एक और सवाल पैदा होता है। अगर तीर्थयात्रियों की संख्या बढ़ती है तो पर्यावरण पर क्या प्रभाव पड़ेगा? अगर पर्यटन गतिविधियां बढ़ती हैं तो जंगल पर कितना दबाव आएगा? अगर स्थानीय धार्मिक आयोजन होते हैं तो उनका पर्यावरणीय असर क्या होगा? और अगर किसी गतिविधि पर प्रतिबंध लगाया जाता है तो उसका असर स्थानीय समुदाय की आजीविका और धार्मिक परंपरा पर कितना पड़ेगा? इन सवालों का जवाब सिर्फ धार्मिक भावना से नहीं दिया जा सकता।
जैन समाज की चिंता: तीर्थ या पर्यटन?
जैन समाज के लिए सम्मेद शिखरजी (Parasnath) की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि यह एक तीर्थ है, सामान्य पर्यटन स्थल नहीं। तीर्थ और पर्यटन में मूल अंतर भी यही है। पर्यटन में व्यक्ति किसी स्थान को देखने, घूमने या मनोरंजन के लिए जाता है। तीर्थ में व्यक्ति धार्मिक आस्था और आध्यात्मिक उद्देश्य से जाता है। जैन समुदाय की चिंता यह है कि अगर सम्मेद शिखरजी को सामान्य पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित किया गया तो तीर्थ की मूल धार्मिक प्रकृति प्रभावित हो सकती है। यह चिंता जैन धर्म के दर्शन से भी जुड़ती है। जब किसी स्थान को मोक्षभूमि माना जाता है, तो वहां शांति, संयम और धार्मिक अनुशासन को विशेष महत्व मिलना स्वाभाविक है।
संताल समाज की चिंता: हमारी आस्था कहां जाएगी?
संताल समाज का सवाल भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। अगर किसी पहाड़ की धार्मिक पहचान को केवल एक समुदाय की दृष्टि से तय किया जाता है, तो दूसरे समुदाय की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक स्मृति के संरक्षण का प्रश्न उठना स्वाभाविक है। संताल पक्ष का कहना रहा है कि मरांग बुरु उनकी धार्मिक पहचान का हिस्सा है और पहाड़ से जुड़े पारंपरिक अधिकारों को भी मान्यता मिलनी चाहिए।
यहां एक बुनियादी संवैधानिक प्रश्न सामने आता है—धार्मिक स्वतंत्रता और सांस्कृतिक अधिकारों की रक्षा कैसे की जाए? किसी समुदाय की धार्मिक स्वतंत्रता का सम्मान करते हुए दूसरे समुदाय की परंपरा को भी कैसे सुरक्षित रखा जाए? यही Parasnath विवाद की सबसे कठिन चुनौती है।
2026 में फिर क्यों उठा विवाद?
अगस्त 2026 में Parasnath पहाड़ का विवाद एक बार फिर सामने आया। मरांग बुरु बचाओ संघर्ष मोर्चा ने जैन संगठन की ओर से किए गए दावों का विरोध किया और कहा कि संताल समाज के धार्मिक और पारंपरिक अधिकारों की अनदेखी नहीं की जा सकती। मोर्चा ने सरकार से अपने पक्ष में कार्रवाई की मांग की और आंदोलन की चेतावनी भी दी। यहां एक महत्वपूर्ण बात समझना जरूरी है। किसी संगठन द्वारा किया गया दावा अपने आप में अंतिम कानूनी निष्कर्ष नहीं होता। किसी क्षेत्र के अधिकार और प्रबंधन की वास्तविक स्थिति सरकारी अधिसूचनाओं, राजस्व रिकॉर्ड, न्यायिक आदेशों और लागू कानूनों से तय होती है। इसलिए पारसनाथ विवाद में भावनात्मक दावों के साथ-साथ दस्तावेजों और न्यायिक रिकॉर्ड को भी देखना जरूरी है।
अदालतों की भूमिका क्यों महत्वपूर्ण है?
Parasnath जैसे विवाद में अदालतों की भूमिका इसलिए महत्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि यहां धार्मिक आस्था के साथ जमीन, वन, निर्माण, पर्यावरण और प्रशासनिक अधिकार भी जुड़े हुए हैं। अदालती कार्यवाही में अलग-अलग समय पर पारसनाथ पहाड़ से जुड़े धार्मिक स्थलों, निर्माण और प्रबंधन संबंधी प्रश्न सामने आए हैं।
इसका मतलब यह है कि समाधान केवल धार्मिक संगठनों की आपसी सहमति से नहीं, बल्कि मौजूदा कानूनों के अनुपालन से भी जुड़ा है। विशेष रूप से वन क्षेत्र में किसी भी निर्माण या गतिविधि के लिए संबंधित कानूनों और अनुमतियों का पालन आवश्यक है। इसलिए यह मान लेना कि धार्मिक महत्व वाला क्षेत्र सभी सामान्य कानूनों से बाहर हो जाता है, सही दृष्टिकोण नहीं होगा।
असली टकराव आस्था का नहीं, व्यवस्थाओं का भी है
Parasnath विवाद को सिर्फ दो धर्मों के बीच संघर्ष के रूप में देखना आसान है, लेकिन वास्तविकता इससे ज्यादा जटिल है। यहां कम से कम चार अलग-अलग हित एक साथ मौजूद हैं- पहला, जैन समाज की धार्मिक आस्था और सम्मेद शिखरजी की पवित्रता। दूसरा, संताल समाज की मरांग बुरु से जुड़ी धार्मिक-सांस्कृतिक परंपरा। तीसरा, वन और पर्यावरण संरक्षण। चौथा, स्थानीय लोगों की आजीविका और आर्थिक हित। इन चारों को अलग-अलग करके नहीं देखा जा सकता।
अगर तीर्थयात्रा बढ़ती है तो स्थानीय अर्थव्यवस्था को लाभ हो सकता है, लेकिन पर्यावरण पर दबाव भी बढ़ सकता है। अगर पर्यटन पर प्रतिबंध लगाया जाता है तो तीर्थ की पवित्रता को संरक्षण मिल सकता है, लेकिन स्थानीय कारोबार प्रभावित हो सकता है। अगर पारंपरिक गतिविधियों पर प्रतिबंध लगाया जाता है तो धार्मिक भावनाओं का सवाल उठ सकता है। यानी हर फैसले के कई प्रभाव होंगे।
क्या एक पहाड़ दो समुदायों की आस्था हो सकता है?
यही शायद Parasnath की सबसे बड़ी पहेली है। एक ही भूगोल अलग-अलग समुदायों के लिए अलग धार्मिक अर्थ रख सकता है। जैन श्रद्धालु उस पहाड़ पर तीर्थंकरों के निर्वाण की स्मृति देखते हैं। संताल समाज उसी पहाड़ को मरांग बुरु की धार्मिक पहचान से जोड़ता है। इन दोनों बातों को एक-दूसरे का खंडन मानना जरूरी नहीं है। समस्या तब पैदा होती है जब धार्मिक पहचान अधिकार के दावे में बदल जाती है और एक पक्ष की धार्मिक आवश्यकता दूसरे पक्ष की परंपरा के लिए जगह कम करने लगती है।
इसलिए शायद पारसनाथ का समाधान इस सवाल में नहीं है कि ‘पहाड़ किसका है?’ बल्कि सवाल यह होना चाहिए कि ‘इस पहाड़ से जुड़ी अलग-अलग आस्थाओं और कानूनी अधिकारों का सम्मान कैसे हो?’
भगवान पार्श्वनाथ का दर्शन आज क्या कहता है?
यहां भगवान Parasnath के दर्शन की प्रासंगिकता फिर सामने आती है। अहिंसा का अर्थ केवल हथियार न उठाना नहीं है। सामाजिक स्तर पर अहिंसा का अर्थ यह भी हो सकता है कि संवाद के रास्ते खुले रहें और धार्मिक मतभेद संघर्ष में न बदलें। जैन दर्शन में अनेकांतवाद का विचार भी यह बताता है कि सत्य को समझने के लिए अलग-अलग दृष्टिकोणों को देखना जरूरी है। पारसनाथ के मामले में यह दृष्टिकोण विशेष महत्व रखता है।
जैन समाज की आस्था को समझे बिना सम्मेद शिखरजी की पवित्रता को समझना मुश्किल है। संताल समाज की परंपरा को समझे बिना मरांग बुरु के महत्व को समझना भी उतना ही मुश्किल है। इसलिए समाधान का पहला कदम एक-दूसरे की धार्मिक भाषा को समझना हो सकता है।
सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती
सरकार के सामने चुनौती किसी एक समुदाय को संतुष्ट करने की नहीं, बल्कि कानून के भीतर रहते हुए संतुलन बनाने की है। एक ऐसी व्यवस्था की जरूरत है जिसमें- सम्मेद शिखरजी (Parasnath) की धार्मिक पवित्रता सुरक्षित रहे, संताल समाज की पारंपरिक धार्मिक पहचान का सम्मान हो, वन्यजीव और पर्यावरण की रक्षा हो, अवैध निर्माण और अनधिकृत गतिविधियों पर रोक हो, और स्थानीय लोगों की आजीविका भी प्रभावित न हो।
इसके लिए केवल पुलिस या प्रशासनिक आदेश पर्याप्त नहीं होंगे। जरूरत है एक संस्थागत संवाद की, जिसमें जैन धार्मिक प्रतिनिधि, संताल समुदाय के प्रतिनिधि, स्थानीय प्रशासन, पर्यावरण विशेषज्ञ और कानूनी विशेषज्ञ शामिल हों। किसी भी अंतिम व्यवस्था का आधार भावनात्मक दावे नहीं, बल्कि दस्तावेज, कानून, ऐतिहासिक रिकॉर्ड और संवैधानिक अधिकार होने चाहिए।
पारसनाथ को संघर्ष की नहीं, संवाद की जरूरत
पारसनाथ पहाड़ की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि जिस भूमि को एक समुदाय मोक्ष की भूमि मानता है और दूसरा अपनी धार्मिक पहचान की भूमि, वही भूमि विवाद का केंद्र बन गई है। भगवान Parasnath के जीवन का मूल संदेश आत्मविजय, संयम और अहिंसा है। संताल समाज की धार्मिक परंपरा में प्रकृति और सामुदायिक स्मृति का गहरा स्थान है।
अगर इन दोनों परंपराओं को एक-दूसरे के विरोध में खड़ा करने के बजाय उनके अस्तित्व को समझा जाए, तो रास्ता निकाला जा सकता है। पारसनाथ को किसी एक समुदाय के पक्ष में खड़ा करने की बजाय उसे ऐसा क्षेत्र बनाया जा सकता है जहां धार्मिक पवित्रता, सांस्कृतिक अधिकार और पर्यावरण संरक्षण एक साथ मौजूद रहें। यह आसान नहीं होगा। लेकिन यही किसी भी लोकतांत्रिक और बहुलतावादी समाज की असली परीक्षा है।
निष्कर्ष नहीं, एक जरूरी सवाल
Parasnath का सवाल अंततः केवल यह नहीं है कि इस पहाड़ को सम्मेद शिखरजी कहा जाए या मरांग बुरु। सवाल इससे बड़ा है। क्या भारत का एक धार्मिक स्थल एक से अधिक समुदायों की स्मृतियों को अपने भीतर समेट सकता है? क्या जैन समाज की तीर्थ-पवित्रता और संताल समाज की सांस्कृतिक आस्था एक ही भूगोल में सुरक्षित रह सकती है? क्या पर्यावरण संरक्षण और धार्मिक गतिविधियों के बीच संतुलन बनाया जा सकता है?
और क्या सरकार ऐसी व्यवस्था बना सकती है जिसमें किसी एक समुदाय की धार्मिक स्वतंत्रता दूसरे समुदाय की परंपरा को कमजोर न करे? इन सवालों का जवाब किसी आंदोलन, नारे या एकतरफा दावे से नहीं मिलेगा। जवाब मिलेगा इतिहास को समझने से, कानून को पढ़ने से, दस्तावेजों को देखने से और सबसे बढ़कर—एक-दूसरे की आस्था को सुनने से। पारसनाथ की चोटी पर पहुंचने वाला जैन श्रद्धालु वहां मोक्ष की स्मृति देखता है। मरांग बुरु की परंपरा से जुड़ा संताल व्यक्ति उसी पहाड़ में अपने देव और पूर्वजों की सांस्कृतिक स्मृति देखता है।
शायद पारसनाथ की सबसे बड़ी सच्चाई यही है-एक पहाड़, कई स्मृतियां।और उन स्मृतियों को मिटाने के बजाय साथ लेकर चलना ही इस विवाद के भविष्य की सबसे बड़ी चुनौती भी है और संभावना भी।
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