महिलाओं और बच्चियों की सुरक्षा पर बड़ा सवाल, NCRB के आंकड़ों से सामने आई चिंताजनक तस्वीर

NCRB के आंकड़े महिलाओं और बच्चियों की सुरक्षा की गंभीर तस्वीर दिखाते हैं। बच्चियों से रेप के मामलों, POCSO और लंबित केसों को समझिए।

NCRB के आंकड़े बच्चियों के खिलाफ यौन अपराध और लंबित मामलों की गंभीर तस्वीर सामने रखते हैं।
NCRB के आंकड़े बच्चियों के खिलाफ यौन अपराध और लंबित मामलों की गंभीर तस्वीर सामने रखते हैं।

डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। बिहार के जमुई-समस्तीपुर से लेकर बांका तक, दिल्ली के कालकाजी और ओडिशा के धेनकनाल तक महिलाओं और बच्चियों के खिलाफ सामने आई यौन हिंसा की घटनाओं ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। अलग-अलग राज्यों में सामने आई इन घटनाओं के बाद आरोपियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई और पीड़ितों को जल्द न्याय दिलाने की मांग तेज हुई है।

हालांकि ये घटनाएं अलग-अलग जगहों की हैं, लेकिन इनके बीच एक बड़ी चिंता समान है—महिलाओं और खासकर नाबालिग बच्चियों की सुरक्षा। NCRB के आंकड़े इस चिंता को और गंभीर बनाते हैं। आंकड़ों के मुताबिक, नाबालिग लड़कियों के साथ दुष्कर्म के दर्ज मामलों में पिछले वर्षों में बड़ा बदलाव देखने को मिला है। साथ ही, अदालतों में लंबित मामलों और दोषसिद्धि दर को लेकर भी सवाल उठते रहे हैं।

बच्चियों से रेप के मामलों में चार गुना से ज्यादा बढ़ोतरी

NCRB के उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2015 में 18 साल से कम उम्र की बच्चियों से दुष्कर्म के 10,934 मामले दर्ज किए गए थे। वर्ष 2024 में यह संख्या बढ़कर 43,675 तक पहुंच गई। यानी एक दशक के दौरान दर्ज मामलों की संख्या लगभग चार गुना हो गई।

इन आंकड़ों को केवल संख्या के तौर पर देखना पर्याप्त नहीं है। हर आंकड़े के पीछे एक बच्ची, उसका परिवार और उसके साथ जुड़ा एक गंभीर अपराध है। यही वजह है कि बाल यौन अपराधों की रोकथाम, पुलिस जांच और समयबद्ध न्याय व्यवस्था को लेकर लगातार चर्चा होती रही है।

POCSO के तहत रेप के मामले सबसे ज्यादा

नाबालिगों के खिलाफ यौन अपराधों की निगरानी के लिए POCSO Act महत्वपूर्ण कानूनी ढांचा है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, 2020 से 2024 के बीच नाबालिग लड़कियों के साथ दुष्कर्म के करीब 1.83 लाख मामले दर्ज हुए।

इसी अवधि में बिना पेनेट्रेशन वाले यौन उत्पीड़न के 96,505 मामले दर्ज किए गए। इसके अलावा यौन उत्पीड़न/छेड़छाड़ के 12,807 मामले, बच्चों को अश्लील सामग्री के लिए इस्तेमाल करने से जुड़े 2,924 मामले और यौन अपराधों की अन्य श्रेणियों में 3,034 मामले दर्ज किए गए।

ये आंकड़े बताते हैं कि बच्चों के खिलाफ यौन अपराध केवल एक तरह के अपराध तक सीमित नहीं हैं। ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों स्तरों पर बच्चों की सुरक्षा एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। NCRB के साइबर अपराध प्रशिक्षण केंद्र की सामग्री में भी बच्चों के खिलाफ साइबर स्टॉकिंग, साइबर बुलिंग, ऑनलाइन उत्पीड़न और यौन शोषण से संबंधित सामग्री को गंभीर खतरे के रूप में रेखांकित किया गया है।

16 से 18 साल की लड़कियां सबसे अधिक प्रभावित

2020 से 2024 के बीच दर्ज दुष्कर्म के NCRB के आंकड़े महिलाओं और बच्चियों की सुरक्षा की गंभीर तस्वीर दिखाते हैं। बच्चियों से रेप के मामलों, POCSO और लंबित केसों को समझिए।

उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार:

16 से 18 वर्ष: 94,503 मामले

12 से 16 वर्ष: 70,442 मामले

यानी दर्ज मामलों का बड़ा हिस्सा 12 से 18 वर्ष की उम्र के किशोरों से संबंधित रहा। यह उम्र शिक्षा, विकास और भविष्य निर्माण की होती है। ऐसे में इस आयु वर्ग के खिलाफ यौन अपराधों की बड़ी संख्या परिवार, स्कूल, समाज और कानून-व्यवस्था सभी के लिए गंभीर चिंता का विषय है।

86 फीसदी मामले लंबित, न्याय में देरी पर सवाल

अपराध के मामले दर्ज होना ही पूरी न्याय प्रक्रिया नहीं है। पीड़ित परिवारों के लिए सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह रहता है कि आरोपी को सजा कब मिलेगी और पीड़िता को न्याय कब मिलेगा।

आपके दिए NCRB आंकड़ों के अनुसार, 2024 में बच्चियों से रेप के मामलों में दोषसिद्धि दर करीब 30 फीसदी रही, जबकि लगभग 86 फीसदी मामले अदालतों में लंबित थे।

POCSO मामलों के लिए विशेष अदालतों और फास्ट-ट्रैक व्यवस्था के बावजूद बड़ी संख्या में मामलों का लंबित रहना न्याय प्रक्रिया की गति पर सवाल खड़ा करता है। हालांकि लंबित मामलों का अर्थ यह नहीं है कि हर मामले में अदालत ने आरोपी को दोषी माना है या मामला समाप्त नहीं हुआ है। मुकदमों की लंबी प्रक्रिया, जांच, गवाहों के बयान और न्यायिक प्रक्रिया के अलग-अलग चरण भी इसमें शामिल होते हैं।

ज्यादातर मामलों में आरोपी परिचित

बच्चियों के खिलाफ यौन अपराधों की एक और चिंताजनक तस्वीर यह है कि आरोपी अक्सर पीड़िता के लिए पूरी तरह अजनबी नहीं होता। NCRB में उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, 2024 में बच्चियों से रेप के करीब 97 फीसदी दर्ज मामलों में आरोपी पीड़िता का परिचित था। इनमें शादी का झांसा देने वाले व्यक्ति, दोस्त, रिश्तेदार, पड़ोसी और परिवार या परिचित दायरे के लोग शामिल बताए गए हैं।

इस तथ्य से सुरक्षा की चुनौती और जटिल हो जाती है। इसका मतलब यह है कि केवल सार्वजनिक स्थानों की सुरक्षा बढ़ाना पर्याप्त नहीं है। बच्चों को सुरक्षित माहौल देने के लिए घर, स्कूल, पड़ोस और ऑनलाइन दुनिया—हर स्तर पर जागरूकता और निगरानी की जरूरत है।

आंकड़ों से आगे बढ़कर सुरक्षा पर ध्यान जरूरी

जमुई, समस्तीपुर, बांका, कालकाजी या धेनकनाल जैसी घटनाएं सामने आने के बाद कार्रवाई की मांग स्वाभाविक है, लेकिन लंबे समय में चुनौती केवल आरोपियों को गिरफ्तार करने तक सीमित नहीं रह सकती।

जरूरत है कि यौन अपराधों की जांच समय पर पूरी हो, पीड़ितों और उनके परिवारों को कानूनी सहायता मिले, बच्चों को सुरक्षित वातावरण मिले और अदालतों में मामलों की सुनवाई तेजी से हो।

NCRB के आंकड़े अपराध की तस्वीर दिखाते हैं, लेकिन इनके पीछे मौजूद वास्तविक समस्या को समझना और उससे निपटने के लिए पुलिस, प्रशासन, न्यायपालिका, परिवार और समाज—सभी की जिम्मेदारी तय करना उतना ही जरूरी है। महिलाओं और बच्चियों की सुरक्षा केवल कानून-व्यवस्था का विषय नहीं, बल्कि पूरे समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है।

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