संभल हिंसा मामले में मुल्ला अफरोज की निवारक हिरासत पर Supreme Court ने यूपी सरकार पर 10 लाख रुपये की कॉस्ट लगाई। जानिए पूरा मामला।

डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। संभल हिंसा मामले में आरोपी मुल्ला अफरोज की निवारक हिरासत को लेकर Supreme Court ने उत्तर प्रदेश सरकार पर 10 लाख रुपये की कॉस्ट लगाई है। अदालत ने हिरासत के आधार और कथित पुलिस हिरासत में दिए गए कबूलनामे की कानूनी वैधता पर महत्वपूर्ण टिप्पणी की। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी व्यक्ति को निवारक हिरासत में रखने का आदेश केवल ऐसे कबूलनामे के आधार पर नहीं दिया जा सकता, जिसकी स्वीकार्यता कानून के तहत सवालों के घेरे में हो।
मुल्ला अफरोज की निवारक हिरासत का मामला
मुल्ला अफरोज को संभल में नवंबर 2024 में हुई हिंसा के मामले से जोड़ा गया था। इस हिंसा के बाद उनके खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के तहत निवारक हिरासत की कार्रवाई की गई थी। अफरोज ने अपनी हिरासत को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था।
मामले की सुनवाई के दौरान Supreme Court ने यह सवाल उठाया कि क्या पुलिस हिरासत में कथित तौर पर दिए गए किसी कबूलनामे को निवारक हिरासत का आधार बनाया जा सकता है। अदालत ने इसी पहलू पर उत्तर प्रदेश सरकार से जवाब मांगा था। इससे पहले 8 सितंबर 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने मामले में सुनवाई पूरी करते हुए अपना फैसला सुरक्षित रखा था।
कबूलनामे को लेकर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी
मामले का अहम पहलू कथित कस्टोडियल कन्फेशन यानी पुलिस हिरासत में दिए गए कबूलनामे से जुड़ा है। Supreme Court ने इस बात की जांच की कि ऐसे बयान को निवारक हिरासत के आदेश के लिए किस सीमा तक आधार बनाया जा सकता है।
अदालत की टिप्पणी का मूल सवाल यह था कि जब कोई व्यक्ति पुलिस हिरासत में है, तब उसके कथित कबूलनामे की कानूनी स्वीकार्यता क्या होगी और क्या उसी के आधार पर उसकी भविष्य की गतिविधियों को रोकने के लिए NSA के तहत हिरासत का आदेश पारित किया जा सकता है।
10 लाख रुपये की कॉस्ट क्यों लगाई गई?
Supreme Court ने मामले में उत्तर प्रदेश सरकार पर 10 लाख रुपये की कॉस्ट लगाई है। अदालत की कार्रवाई का संबंध मुल्ला अफरोज की निवारक हिरासत के कानूनी आधार और उसे जारी करने की प्रक्रिया से है।
निवारक हिरासत सामान्य आपराधिक मुकदमे से अलग व्यवस्था है। इसमें किसी व्यक्ति को भविष्य में ऐसी गतिविधियों से रोकने के उद्देश्य से हिरासत में रखा जाता है, जिन्हें सार्वजनिक व्यवस्था या राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा माना जाता है। इसलिए इस तरह की हिरासत में संवैधानिक और कानूनी प्रक्रियाओं का पालन महत्वपूर्ण होता है।
संभल हिंसा के बाद हुई थी कार्रवाई
मुल्ला अफरोज का मामला नवंबर 2024 में संभल की शाही जामा मस्जिद के सर्वे के दौरान हुई हिंसा से जुड़ा है। हिंसा के दौरान पुलिस और प्रशासन के साथ टकराव की स्थिति बनी थी और कई लोग घायल हुए थे। इसके बाद पुलिस ने अलग-अलग धाराओं में मुकदमे दर्ज किए और कई आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई की।
उत्तर प्रदेश सरकार ने अदाल Supreme Court के समक्ष निवारक हिरासत का बचाव करते हुए मामले की परिस्थितियों, सार्वजनिक व्यवस्था पर पड़े प्रभाव और भविष्य में ऐसी गतिविधियों की आशंका से जुड़े आधारों का उल्लेख किया था। न्यायालय ने हालांकि यह जांच की कि निवारक हिरासत के लिए जिन सामग्रियों पर भरोसा किया गया, उनका इस्तेमाल कानून के अनुरूप हुआ या नहीं।
निवारक हिरासत में संवैधानिक सुरक्षा भी अहम
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 22 निवारक हिरासत के मामलों में भी कुछ महत्वपूर्ण प्रक्रियात्मक सुरक्षा प्रदान करता है। अदालतें ऐसे मामलों में यह देख सकती हैं कि हिरासत का आदेश जारी करते समय संबंधित प्राधिकारी (Supreme Court) ने कानून में निर्धारित प्रक्रिया का पालन किया या नहीं और उपलब्ध सामग्री पर उचित तरीके से विचार किया या नहीं।
इलाहाबाद हाईकोर्ट के रिकॉर्ड में भी इस मामले से जुड़े NSA आदेश, राज्य सरकार की कार्रवाई और हिरासत के दौरान आरोपी को उपलब्ध कराई गई सामग्री का विस्तृत उल्लेख मिलता है।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी का क्या मतलब है?
Supreme Court की कार्रवाई का व्यापक महत्व इस बात से जुड़ा है कि निवारक हिरासत जैसे असाधारण कानूनी प्रावधान का इस्तेमाल करते समय आधार और प्रक्रिया दोनों का कानून के अनुरूप होना जरूरी है। केवल किसी व्यक्ति पर गंभीर आरोप होना और निवारक हिरासत के लिए कानूनी रूप से पर्याप्त आधार होना, दोनों अलग-अलग प्रश्न हैं।
संभल हिंसा मामले में सुप्रीम कोर्ट ने इसी कानूनी प्रक्रिया और हिरासत के आधार की वैधता की जांच की। मामले में 10 लाख रुपये की कॉस्ट लगाया जाना उत्तर प्रदेश सरकार के लिए अदालत की कार्रवाई का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
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