
लखनऊ। कुछ कलाकार पर्दे से उतर जाते हैं, लेकिन दिल से कभी नहीं उतरते। नाना पाटेकर भी ऐसे ही कलाकार थे। उनकी आवाज, उनका चेहरा, संवाद बोलने का अंदाज और किरदार में उतर जाने की उनकी कला हमेशा याद की जाएगी। गुरुवार को नाना पाटेकर के निधन की खबर आई तो देशभर के सिनेमा प्रेमियों के साथ लखनऊ के रंगकर्मियों और फिल्म से जुड़े लोगों की आंखें भी नम हो गईं। 75 साल की उम्र में गोवा स्थित अपने घर पर कार्डियक अरेस्ट के बाद उन्होंने अंतिम सांस ली।
लेकिन लखनऊ के लिए नाना पाटेकर की यह विदाई कुछ ज्यादा ही करीब महसूस होती है। अभी कुछ ही सप्ताह पहले नाना पाटेकर लखनऊ आए थे। अगस्त 2026 में वह यूपी पुलिस के थीम सॉन्ग ‘खाकी का सितारा’ के लॉन्च कार्यक्रम में शामिल हुए थे। उस समय किसी ने नहीं सोचा था कि यह लखनऊ में उनकी आखिरी यात्राओं में से एक साबित होगी। कार्यक्रम में उन्होंने उत्तर प्रदेश की कानून व्यवस्था और पुलिस व्यवस्था पर भी अपने विचार रखे थे।
आज जब उस यात्रा की तस्वीरें और उनकी बातें याद आती हैं तो मन में एक ही सवाल उठता है—क्या पता था कि इतनी जल्दी यह आवाज खामोश हो जाएगी।
नाना पाटेकर का लखनऊ से रिश्ता सिर्फ हाल की इस यात्रा तक सीमित नहीं था। यह शहर उनकी फिल्मों और उनके अभिनय की यादों से भी जुड़ा रहा। नवाबों का शहर अपनी तहजीब, पुरानी गलियों और मजबूत रंगमंच परंपरा के लिए जाना जाता है। नाना जैसे कलाकार का यहां आना हमेशा शहर के कलाकारों और सिनेमा प्रेमियों के लिए खास रहा।
वर्ष 2018 में एक फिल्म की शूटिंग के लिए नाना पाटेकर के लखनऊ आने की खबर सामने आई थी। फिल्म के लिए लखनऊ रंगमंच से जुड़े 23 कलाकारों का चयन भी किया गया था। घंटाघर, हुसैनाबाद, रूमी दरवाजा और पुराने लखनऊ की कई जगहों पर शूटिंग की योजना थी। राजनीतिक कहानी पर आधारित इस फिल्म में विधानसभा के बाहर भी कुछ दृश्य फिल्माए जाने थे।
उस समय लखनऊ के रंगमंच से जुड़े कलाकारों के लिए यह केवल किसी बड़े अभिनेता के साथ काम करने का मौका नहीं था। नाना पाटेकर उन कलाकारों में थे, जिन्हें देखकर अभिनय की कई पीढ़ियों ने बहुत कुछ सीखा। उनके अभिनय में बनावट नहीं थी। वह संवाद को सिर्फ बोलते नहीं थे, उसे महसूस कराते थे।
इसके बाद वर्ष 2019 में ‘रॉबर्ट’ फिल्म की शूटिंग के लिए भी नाना पाटेकर के लखनऊ और प्रयागराज आने की खबर सामने आई। फिल्म के लिए पुराने लखनऊ की कई लोकेशन चुनी गई थीं और स्थानीय कलाकारों के भी फिल्म से जुड़ने की बात सामने आई थी।
पुराना लखनऊ अपने आप में एक कहानी है। घंटाघर, रूमी दरवाजा, हुसैनाबाद की गलियां और चौक की चहल-पहल—इन सबके बीच कैमरा चलता है तो शहर सिर्फ लोकेशन नहीं रहता, कहानी का हिस्सा बन जाता है। शायद यही वजह है कि लखनऊ और नाना पाटेकर की यादें एक-दूसरे से जुड़ती चली गईं।
नाना की खासियत यह थी कि वह सिर्फ फिल्म अभिनेता नहीं थे। उनकी जड़ें रंगमंच से जुड़ी थीं। उन्होंने अभिनय को ग्लैमर से ज्यादा मेहनत और जिम्मेदारी माना। यही वजह है कि लखनऊ के रंगकर्मियों के बीच भी उनका नाम एक ऐसे कलाकार के रूप में लिया जाता रहा, जिसने मंच से लेकर बड़े पर्दे तक अभिनय की ताकत दिखाई।
आज उनके जाने के बाद लखनऊ के रंगमंच पर भी उनकी कमी महसूस होगी। कोई उनके संवाद याद करेगा, कोई उनकी आंखों का अभिनय, कोई उनकी आवाज और कोई उनका वह अंदाज, जिसमें वह चुप रहकर भी बहुत कुछ कह जाते थे।
‘क्रांतिवीर’, ‘परिंदा’, ‘तिरंगा’, ‘अग्निसाक्षी’ और ‘वेलकम’ जैसी फिल्मों में नाना ने अलग-अलग किरदार निभाए। उन्होंने गंभीर भूमिकाएं कीं, खलनायक बने, नायक बने और हास्य से भी दर्शकों को खूब हंसाया। लेकिन हर भूमिका में नाना पाटेकर की अपनी एक अलग पहचान रही।
उनकी सबसे बड़ी ताकत उनकी आवाज थी। उस आवाज में गुस्सा था, दर्द था, संवेदना थी और समाज से सवाल करने की ताकत भी थी। जब वह पर्दे पर बोलते थे तो लगता था कि कोई किरदार नहीं, बल्कि हमारे बीच का कोई आदमी अपनी बात कह रहा है।
और अब लखनऊ में उनकी आखिरी याद अगस्त 2026 की वही यात्रा बनकर रह गई है। कुछ सप्ताह पहले जिस शहर में नाना पाटेकर लोगों के सामने खड़े होकर अपनी बात कह रहे थे, आज उसी शहर में उनके निधन की खबर पर लोग उन्हें याद कर रहे हैं।
लखनऊ की गलियां वही हैं। रूमी दरवाजा वहीं है। घंटाघर आज भी खड़ा है। रंगमंच के पर्दे फिर उठेंगे। कैमरे फिर चलेंगे। कलाकार फिर नए किरदार निभाएंगे। लेकिन नाना पाटेकर जैसा कलाकार बार-बार नहीं आता।
लखनऊ ने बहुत से कलाकारों को आते-जाते देखा है, लेकिन कुछ कलाकार शहर की यादों में हमेशा के लिए बस जाते हैं। नाना पाटेकर भी उन्हीं कलाकारों में से एक हैं।
आज जब उनके निधन के साथ उनकी पुरानी तस्वीरें और वीडियो सामने आते हैं तो लगता है जैसे वह अभी भी किसी सेट पर खड़े हैं। कैमरा उनकी तरफ है और निर्देशक कह रहा है—“एक्शन…”
नाना फिर अपना किरदार निभा रहे हैं।
बस फर्क इतना है कि इस बार कैमरा बंद हो चुका है।
नाना पाटेकर नहीं हैं, लेकिन उनका अभिनय है, उनकी आवाज है, उनके किरदार हैं और उन किरदारों में धड़कता हुआ एक पूरा दौर है। लखनऊ की तरफ से इस बेबाक और बेमिसाल अभिनेता को भावभीनी श्रद्धांजलि।