हड़प्पा काल के हुनर को करीब से जाना, पत्थरों को घिसकर मनके बनाने की सीखी कला

लखनऊ, 23 अक्टूबर। प्राचीन भारत में शिल्पकार किस तरह साधारण पत्थरों को खूबसूरत मनकों में बदलते थे और उन्हें चमकदार रूप देते थे, इसकी तकनीक विद्यार्थियों और शोधार्थियों ने करीब से समझी। उत्तर प्रदेश राज्य पुरातत्त्व निदेशालय की ओर से छतर मंजिल परिसर में आयोजित दो दिवसीय कार्यशाला में प्रतिभागियों ने हड़प्पाकालीन मनका निर्माण की पारंपरिक विधियों का न केवल अध्ययन किया, बल्कि खुद हाथों से इन्हें बनाने का व्यावहारिक प्रशिक्षण भी लिया।

‘प्राचीन मनका निर्माण की तकनीक: हड़प्पाकालीन मनकों के विशेष संदर्भ में’ विषय पर आयोजित इस कार्यशाला का शुक्रवार को समापन हुआ। इसका उद्देश्य प्राचीन भारतीय शिल्प परंपराओं से नई पीढ़ी को परिचित कराने के साथ मनका निर्माण की तकनीकी बारीकियों का व्यावहारिक ज्ञान देना था।

कार्यशाला में शामिल होने के लिए 300 से अधिक लोगों ने ऑनलाइन पंजीकरण कराया था। प्रशिक्षण की उपलब्ध सुविधाओं और निर्धारित क्षमता को देखते हुए ‘पहले आओ, पहले पाओ’ के आधार पर 150 प्रतिभागियों को अवसर दिया गया। प्रतिभागियों की संख्या ने प्राचीन शिल्प और पुरातात्त्विक तकनीकों के प्रति विद्यार्थियों एवं शोधार्थियों की बढ़ती दिलचस्पी को भी सामने रखा।

कार्यशाला के दूसरे दिन मनकों को घर्षण के जरिए आकार देने यानी ग्राइंडिंग और उनकी सतह को चिकना व चमकदार बनाने की पॉलिशिंग तकनीक का प्रशिक्षण दिया गया। प्रशिक्षक अनवर हुसैन शेख, आफताब हुसैन शेख और प्रताप भाई माथुर भाई परमार ने पारंपरिक तरीकों का प्रदर्शन करते हुए बताया कि मनकों के निर्माण में आकार निर्धारण और सतह को परिष्कृत करने की प्रक्रिया कितनी महत्वपूर्ण होती है।

विभिन्न विश्वविद्यालयों से आए छात्र-छात्राओं और शोधार्थियों ने इन प्रक्रियाओं में स्वयं भाग लिया। इससे उन्हें प्राचीन शिल्पकारों के कौशल, तकनीकी समझ और निर्माण की बारीकियों को प्रत्यक्ष रूप से जानने का अवसर मिला। कार्यशाला में सैद्धांतिक जानकारी के साथ प्रयोग आधारित प्रशिक्षण पर विशेष जोर दिया गया, ताकि प्रतिभागी प्राचीन वस्तुओं को केवल पुरातात्त्विक अवशेष के रूप में नहीं, बल्कि उनके पीछे मौजूद तकनीकी ज्ञान और श्रम के संदर्भ में भी समझ सकें।

समापन सत्र में प्रतिभागियों ने अपने अनुभव साझा किए। उन्होंने इस प्रशिक्षण को ज्ञानवर्धक और उपयोगी बताते हुए कहा कि इस तरह के आयोजन प्राचीन भारतीय शिल्प परंपराओं को समझने तथा पारंपरिक तकनीकी ज्ञान के संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

समापन अवसर पर उत्तर प्रदेश राज्य पुरातत्त्व निदेशालय के उत्खनन एवं अन्वेषण अधिकारी रामविनय और संस्कृति विभाग के अनु सचिव मनोज कुमार ने प्रतिभागियों को प्रमाण-पत्र वितरित किए। कार्यक्रम का संचालन बलिहारी सेठ ने किया।

इस मौके पर गौरव गुप्ता, राहुल कुमार त्यागी, राहुल कुमार बरैया, अभयराज सिंह, संतोष कुमार सिंह, आशीष, अभिषेक कुमार (प्रथम एवं द्वितीय), दरियाब, हिमांशु और निर्भय सहित विभाग के अन्य अधिकारी एवं कर्मचारी उपस्थित रहे। कार्यशाला में प्रशिक्षण देने वाले विशेषज्ञों के साथ विभिन्न विश्वविद्यालयों के शोधार्थियों और छात्र-छात्राओं ने भी हिस्सा लिया।

यह कार्यशाला प्राचीन भारतीय शिल्प परंपराओं के संरक्षण और पुरातात्त्विक अध्ययन को अधिक व्यावहारिक बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल रही। ऐसे प्रशिक्षण कार्यक्रम विद्यार्थियों को इतिहास के साथ तकनीकी कौशल के संबंध को समझने का अवसर देते हैं और देश की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के प्रति उनकी रुचि बढ़ाते हैं।