भारत का पहला AI-असिस्टेड ‘लिवर पूप ऐप’ लॉन्च: नवजातों की जान बचाने में बनेगा मील का पत्थर

लखनऊ। डॉ. राम मनोहर लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान में एक महत्वपूर्ण चिकित्सा उपलब्धि सामने आई है। संस्थान के प्रसिद्ध बाल हेपेटोलॉजिस्ट एवं गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट डॉ. पीयूष उपाध्याय ने तीन वर्षों के शोध और पिछले डेढ़ वर्ष की गहन मेहनत के बाद भारत का पहला AI-असिस्टेड मोबाइल एप्लिकेशन “लिवर पूप” विकसित किया है। इस क्रांतिकारी ऐप का उद्घाटन संस्थान के निदेशक प्रो. डॉ. सीएम सिंह द्वारा किया गया। इस मौके पर डॉ. विक्रम सिंह (मुख्य चिकित्सा अधीक्षक), डॉ. अरविंद कुमार सिंह, डॉ. प्रद्युम्न सिंह, डॉ. भुवन चंद्र तिवारी, डॉ. दीप्ति अग्रवाल सहित अन्य वरिष्ठ चिकित्सक और संकाय सदस्य उपस्थित रहे।

नवजातों में गंभीर बीमारी की समय रहते पहचान करेगा ऐप

यह अत्याधुनिक ऐप नवजात शिशुओं (0–1 वर्ष) में होने वाली जानलेवा बीमारी बिलीरी एट्रेसिया की स्क्रीनिंग करने में सक्षम है। चिकित्सा अध्ययन में इसकी सेंसिटिविटी 100 प्रतिशत पाई गई है, जिससे यह शुरुआती स्तर पर ही बीमारी की पहचान करने में बेहद प्रभावी साबित होता है। उपयोगकर्ता केवल शिशु के मल की फोटो लेकर स्क्रीन पर टैप करता है, जिसके बाद AI तकनीक तुरंत यह बता देती है कि स्थिति सामान्य है या खतरे का संकेत।

समय पर पहचान से बच सकती है जान, घटेगा इलाज का खर्च

विशेषज्ञों के अनुसार, बिलीरी एट्रेसिया में यदि जन्म के 60 दिनों के भीतर ऑपरेशन (कसाई सर्जरी) हो जाए, तो बच्चा सामान्य जीवन जी सकता है। लेकिन 90 दिनों के बाद लीवर गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त हो जाता है, जिससे महंगे लीवर ट्रांसप्लांट या मृत्यु का खतरा बढ़ जाता है। ऐसे में यह ऐप समय पर पहचान सुनिश्चित कर न केवल नवजातों की जान बचा सकता है, बल्कि सरकार के करोड़ों रुपये के इलाज खर्च में भी कमी ला सकता है।

वैश्विक स्तर पर उपयोगी, 40 भाषाओं में उपलब्ध

“लिवर पूप” ऐप को वैश्विक उपयोग को ध्यान में रखते हुए तैयार किया गया है। यह 18 भारतीय और 22 विदेशी भाषाओं—जैसे अरबी, स्पेनिश, फ्रेंच, रूसी, चीनी और जापानी—में उपलब्ध है। यह SAARC, ASEAN और अफ्रीकी देशों के साथ-साथ प्रवासी श्रमिकों के लिए भी उपयोगी साबित होगा, जो अपनी भाषा में इसका इस्तेमाल कर सकते हैं।

स्वास्थ्य तंत्र के लिए बड़ी राहत और अवसर

यह ऐप पूरी तरह मुफ्त है और इसके उपयोग में कोई अतिरिक्त लागत नहीं आती। इसके जरिए रियल-टाइम डेटा सीधे स्वास्थ्य विभाग तक पहुंच सकता है। राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम के तहत ASHA और आंगनवाड़ी कार्यकर्ता भी इसे आसानी से इस्तेमाल कर सकती हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि समय पर पहचान होने से लीवर ट्रांसप्लांट की जरूरत में करीब 20 प्रतिशत तक कमी लाई जा सकती है।

डॉ. पीयूष उपाध्याय का विजन

डॉ. पीयूष उपाध्याय ने बताया कि इस ऐप का मुख्य उद्देश्य जन्म के तुरंत बाद इस बीमारी की पहचान करना है, ताकि कोई भी बच्चा बिना इलाज के न रहे। उन्होंने कहा कि यह तकनीक हर माँ और स्वास्थ्य कार्यकर्ता को सशक्त बनाती है और अब देश को पारंपरिक पेपर स्टूल चार्ट पर करोड़ों रुपये खर्च करने की आवश्यकता नहीं होगी।