TMC-BJP के बीच सीधी टक्कर, बीजेपी को 2021 में 38 प्रतिशत वोट के साथ मिली थीं 77 सीटें

बंगाल चुनाव 2026: विधानसभा चुनाव 2026 में असम, केरल और पुडुचेरी में 9 अप्रैल को वोटिंग होने के बाद सबकी निगाहें पश्चिम बंगाल की ओर टिकी हैं. यहां का चुनाव कई मायनों में खास है. बीजेपी के लिए सत्ता में आने की चुनौती है तो वहीं टीएमसी के लिए सत्ता हाथ से न जाने देने का दबाव. पश्चिम बंगाल में दो चरणों में चुनाव होने हैं जिनमें पहले चरण की 152 सीटों पर 23 अप्रैल और दूसरे चरण की 142 सीटों पर 29 अप्रैल को वोट डाले जाएंगे.
6-8 चरणों नहीं अब 2 चरणों में खत्म होगा चुनाव
मीडिया विश्लेषकों की निगाहें पश्चिम बंगाल चुनाव पर इसलिए टिकी हैं क्योंकि यहां टीएमसी और बीजेपी के बीच सीधी टक्कर है. ममता लगातार बीजेपी के सामने चुनौती पेश करती आ रही हैं. सभी राज्यों की सीटों का रिजल्ट 4 मई को आना है। पहले यहां 6 से 8 चरणों में चुनाव होते थे लेकिन इस बार महज़ दो चरणों में चुनाव खत्म हो जाएंगे. चुनाव के नतीजे 4 मई को आएंगे लेकिन सवाल यह है कि आखिर बहुमत का जादुई आंकड़ा किसे हासिल होगा?
बहुमत के लिए चाहिए 148 सीट
बीजेपी ने 2021 में अपनी पूरी ताकत झोंक दी थी जिसके बाद उसको 77 सीटें और 38 प्रतिशत वोट प्राप्त हुआ था और एक मज़बूत विपक्ष में रूप में सामने आई. इस बार पार्टी का लक्ष्य प्रदर्शन को जीत में बदलने का है. गौरतलब है कि बंगाल में सत्ता में आने के लिए 148 के जादुई आंकड़े को छूना होता है. इस बार बीजेपी का दावा है कि वह पूर्ण बहुमत के साथ सरकार बनाने जा रही है. बीजेपी हिदुत्व, सुरक्षा, और घुसपैठ, यूसीसी, बेहतर कानून व्यवस्था और महिलाओं व युवाओं के लिए कई योजनाएं लेकर मैदान में है.
बीजेपी के लिए क्या हैं चुनौतियां?
- टीएमसी बीजेपी को “बाहरी पार्टी” के रूप में पेश करती है, बीजेपी को अपनी इस छवि में सुधार करना होगा.
- मुस्लिमों को लेकर बीजेपी की विचारधारा बड़ी वजह है, बंगाल में मुस्लिम वोट बड़ी संख्या में है, जो आमतौर पर एकजुट होकर वोट करते हैं.
- 2021 में अच्छे वोट प्रतिशत के बावजूद बीजेपी सत्ता में नहीं आ सकी थी.
- टीएमसी पिछले कई वर्षों से सत्ता में है, उसकी ज़मीनी पकड़ मज़बूत है, इसे तोड़ना बड़ी चुनौती होगा.
इस बार होमवर्क के साथ उतरी बीजेपी
इस बार बीजेपी पूरे होमवर्क के साथ मैदान में है. उसने बूथ स्तर तक कार्यकर्ताओं को सक्रिय कर हर मतदाता तक पहुंच बनाई है. पार्टी ने स्थानीय मुद्दों के आधार पर अपनी रणनीति तैयार की है और अपना संगठनात्मक ढांचा मज़बूत किया है. हालांकि इस बार चुनाव आयोग के द्वारा मतदाता सूची में किए गए बदलाव भी चर्चा में है. जहां भाजपा इसे लेकर पारदर्शिता की बात कह रही है वहीं विपक्ष इसे लेकर सवाल खड़े कर रहा है. इस बार सबकी नज़र युवाओं और पहली बार वोट करने जा रहे मतदाताओं पर भी टिकी होंगी. फिलहाल मुकाबला कांटे का माना जा रहा है. चुनाव करीब है और उम्मीदवारों की धड़कने तेज़ हैं.