
हरदोई। उत्तर प्रदेश सरकार जहां प्रशासनिक पारदर्शिता और “जीरो टॉलरेंस” नीति को सुशासन की आधारशिला बताती है, वहीं हरदोई जिले की बिलग्राम तहसील का एक भूमि विवाद राजस्व प्रशासन की कार्यप्रणाली पर कई गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े कर रहा है। एक ही प्रकरण में पहले पैमाइश, फिर थाकबंदी आदेश, उसके अनुपालन में मेड़बंदी और कब्जा दिलाने की कार्रवाई, तथा बाद में उसी मामले में प्रस्तुत विरोधाभासी रिपोर्ट ने पूरे घटनाक्रम को चर्चा का विषय बना दिया है। ग्रामीणों के बीच यह मामला अब प्रशासनिक निर्णयों की विश्वसनीयता और जवाबदेही को लेकर सवाल खड़े कर रहा है।
न्यायालय में पहुंचा मामला, पैमाइश में सामने आया भूमि का घाटा
बिलग्राम तहसील के ग्राम श्यामपुर निवासी दिवाकर मिश्रा पुत्र प्रेमचंद्र ने गाटा संख्या 75 की भूमि के संबंध में उपजिलाधिकारी (एसडीएम) बिलग्राम न्यायालय में थाकबंदी वाद प्रस्तुत किया था। न्यायालय के निर्देश पर क्षेत्रीय राजस्व निरीक्षक द्वारा मौके पर पैमाइश कर नक्शा नजरी एवं थाकबंदी आख्या तैयार की गई। जांच में पाया गया कि राजस्व अभिलेखों में गाटा संख्या 75 का क्षेत्रफल 0.2710 हेक्टेयर दर्ज है, जबकि मौके पर वास्तविक क्षेत्रफल मात्र 0.1792 हेक्टेयर मिला। इस प्रकार गाटा संख्या 75 में कुल 0.0918 हेक्टेयर भूमि का घाटा दर्ज किया गया।
पड़ोसी गाटों में दर्ज हुई बढ़त, किसी पक्ष ने नहीं जताई आपत्ति
पैमाइश के दौरान आसपास के कई गाटों में क्षेत्रफल की बढ़त भी दर्ज की गई। रिपोर्ट के अनुसार गाटा संख्या 55 में 0.0635 हेक्टेयर, गाटा संख्या 74 में 0.0376 हेक्टेयर, गाटा संख्या 76 में 0.0278 हेक्टेयर तथा गाटा संख्या 77 में 0.0283 हेक्टेयर क्षेत्रफल की बढ़त पाई गई। इसके अतिरिक्त गाटा संख्या 72 एवं 73 में भी क्षेत्रफल संबंधी अंतर दर्ज किया गया। तैयार आख्या न्यायालय में प्रस्तुत की गई तथा प्रभावित पक्षों को समन एवं समाचार पत्र के माध्यम से सूचना दी गई। हालांकि किसी भी पक्ष द्वारा कोई आपत्ति प्रस्तुत नहीं की गई। इसके बाद एसडीएम न्यायालय ने 28 मई 2025 को रिपोर्ट को स्वीकार करते हुए थाकबंदी आदेश पारित कर दिया।
आदेश के बावजूद लंबे समय तक नहीं हुआ अनुपालन
दिवाकर मिश्रा का आरोप है कि न्यायालय का आदेश पारित होने के बाद भी लंबे समय तक उसका अनुपालन नहीं कराया गया। आदेश अभिलेखों तक सीमित रहा और जमीन पर उसकी वास्तविक तस्वीर दिखाई नहीं दी। अंततः 11 मार्च 2026 को उन्होंने जिलाधिकारी हरदोई को शिकायत देकर थाकबंदी आदेश का अनुपालन कराने की मांग की। जिलाधिकारी के निर्देश के बाद एसडीएम बिलग्राम ने राजस्व निरीक्षक और लेखपाल को मौके पर भेजा, जिसके बाद मेड़बंदी कराई गई और दिवाकर मिश्रा को भूमि पर कब्जा दिलाया गया।
कब्जा मिलने के बाद फिर शुरू हुआ विवाद
दिवाकर मिश्रा का आरोप है कि कब्जा दिलाए जाने के बाद रामलखन त्रिपाठी पुत्र श्याममोहन तथा उमाकांत शुक्ल निवासी बालामऊ चार-पांच अन्य लोगों के साथ मौके पर पहुंचे और बनाई गई मेड़ को तोड़ दिया। आरोप है कि संबंधित लोगों ने भूमि को पुनः अपने खेत में मिला लिया तथा विरोध करने पर गाली-गलौज और जान से मारने की धमकी दी। इस संबंध में दिवाकर मिश्रा ने आईजीआरएस पोर्टल पर शिकायत संख्या 20015536022250 दर्ज कराई।
पहली जांच रिपोर्ट में मेड़ तोड़े जाने की पुष्टि
शिकायत की जांच के दौरान क्षेत्रीय राजस्व निरीक्षक ने 19 मई 2026 को प्रस्तुत अपनी रिपोर्ट में मेड़ तोड़े जाने का उल्लेख किया। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि थाकबंदी आदेश के अनुरूप कराई गई मेड़बंदी को नहीं माना गया और मौके की स्थिति बदल दी गई। इस रिपोर्ट के बाद कार्रवाई की उम्मीद जगी, लेकिन दिवाकर मिश्रा का आरोप है कि इसके बावजूद कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं की गई।
दूसरी शिकायत के बाद बदल गई रिपोर्ट की दिशा
इसके बाद दिवाकर मिश्रा ने पुनः आईजीआरएस शिकायत संख्या 20015526024152 दर्ज कराई। इस बार जांच में प्रस्तुत रिपोर्ट ने पूरे मामले को नया मोड़ दे दिया। आरोप है कि उसी राजस्व निरीक्षक ने अपनी नई रिपोर्ट में कहा कि आवेदक का भू-चित्र छोटा बना हुआ है, इसलिए उसे पूरी भूमि नहीं दी जा सकती। रिपोर्ट में विपक्षी पक्ष द्वारा दिए गए प्रत्यावेदन का भी उल्लेख किया गया। बाद में एसडीएम बिलग्राम स्तर से भी इसी आधार पर रिपोर्ट प्रस्तुत कर दी गई।
विरोधाभासी रिपोर्टों से उठे कई अहम सवाल
मामले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि यदि भू-चित्र में त्रुटि थी तो उसी पैमाइश रिपोर्ट के आधार पर थाकबंदी आदेश कैसे पारित हुआ। यदि आदेश में कोई कमी थी तो प्रशासन ने मौके पर पहुंचकर मेड़बंदी कर कब्जा क्यों दिलाया। वहीं यदि कब्जा दिलाने की कार्रवाई सही थी तो बाद में अधिकारियों की रिपोर्ट का आधार क्या था। इसी प्रकार जब पहली रिपोर्ट में मेड़ तोड़े जाने की पुष्टि हो चुकी थी, तब संबंधित लोगों के खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं की गई। और यदि दूसरी रिपोर्ट को सही माना जाए तो पहली रिपोर्ट तथा उसके आधार पर हुई प्रशासनिक कार्रवाई की वैधता पर भी सवाल खड़े होते हैं।
निष्पक्ष जांच की मांग तेज, प्रशासन पर टिकी निगाहें
दिवाकर मिश्रा ने पूरे मामले की निष्पक्ष एवं उच्चस्तरीय जांच की मांग की है। उनका कहना है कि न्यायालय के आदेश, पैमाइश रिपोर्ट, नक्शा नजरी, आईजीआरएस शिकायतों और बाद में प्रस्तुत विरोधाभासी रिपोर्टों की समग्र जांच कराई जानी चाहिए। उनका दावा है कि जांच से यह स्पष्ट हो सकेगा कि एक ही मामले में सरकारी अभिलेखों और प्रशासनिक निष्कर्षों में इतना बड़ा अंतर आखिर क्यों दिखाई दे रहा है। फिलहाल ग्राम श्यामपुर से लेकर तहसील मुख्यालय तक यह मामला चर्चा का विषय बना हुआ है और अब सभी की निगाहें जिला प्रशासन पर टिकी हैं कि क्या इस पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच होगी या गाटा संख्या 75 का यह विवाद आगे और बड़े सवाल खड़े करेगा।