
पंकज चतुर्वेदी
बाराबंकी। उत्तर प्रदेश के बाराबंकी जिले की रामनगर तहसील से लगभग तीन किलोमीटर दूर स्थित उत्तर भारत का प्रसिद्ध पौराणिक तीर्थ लोधेश्वर महादेव धाम आस्था का प्रमुख केंद्र माना जाता है। यहां प्रतिवर्ष चार बड़े धार्मिक मेलों का आयोजन होता है, जिनमें उत्तर प्रदेश सहित मध्य प्रदेश, राजस्थान और अन्य राज्यों से लाखों श्रद्धालु दर्शन, पूजन, जलाभिषेक और कांवड़ यात्रा के लिए पहुंचते हैं। पहले मंदिर और मेलों की व्यवस्था मठ एवं पुजारियों के स्तर पर होती थी, लेकिन पिछले करीब दो दशकों से प्रशासन भी मेले की व्यवस्थाओं में सक्रिय भूमिका निभा रहा है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा काशी विश्वनाथ कॉरिडोर की तर्ज पर लोधेश्वर कॉरिडोर विकसित करने की घोषणा के बाद यहां सुविधाओं का लगातार विस्तार किया जा रहा है।
महाभारत और रामायण काल से जुड़ा है लोधेश्वर धाम का इतिहास
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार लोधेश्वर महादेव का शिवलिंग स्वयंभू है और इसे पृथ्वी पर स्थित 52 स्वयंभू शिवलिंगों में विशेष स्थान प्राप्त है। विद्वानों का मत है कि यह धाम सतयुग, त्रेतायुग और द्वापरयुग की अनेक पौराणिक घटनाओं का साक्षी रहा है। कथा के अनुसार सतयुग में भगवान विष्णु ने वाराह अवतार धारण कर पृथ्वी का उद्धार करने के बाद भगवान शिव की आराधना की थी। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव गंडकी (वर्तमान सरयू-घाघरा) नदी के तट पर स्वयंभू शिवलिंग के रूप में प्रकट हुए, जिन्हें भगवान विष्णु ने गंडकेश्वर नाम दिया।
लव महाराज ने किया था पुनः पूजन, रखा ‘लवेश्वर’ नाम
त्रेतायुग में भगवान श्रीराम के गुप्तार घाट से सशरीर प्रस्थान के बाद उनके पुत्र लव आत्मग्लानि से व्यथित हो गए। महर्षि वशिष्ठ के निर्देश पर उन्होंने वाराह क्षेत्र पहुंचकर स्वयंभू शिवलिंग की खोज की और विधिवत पूजा-अर्चना की। मान्यता है कि उसी समय इस शिवलिंग का नाम लवेश्वर पड़ा और भगवान शिव ने भक्तों के कल्याण का आशीर्वाद दिया।
महाभारत काल में भी रहा विशेष महत्व
द्वापरयुग में कौरव-पांडव संघर्ष के समय भी इस क्षेत्र का उल्लेख मिलता है। कहा जाता है कि पांडवों ने यहां आकर भगवान शिव की आराधना की थी। माता कुंती ने किंतूर में कुंतेश्वर महादेव की स्थापना की, जबकि अर्जुन स्वर्ग से पारिजात वृक्ष लाकर बरौलिया में स्थापित किए। मान्यता है कि आज भी माता कुंती प्रतिदिन शिवलिंग की पूजा करती हैं और मंदिर खुलने पर पूजन के चिह्न दिखाई देते हैं।
कुरुक्षेत्र युद्ध से पूर्व धर्मराज युधिष्ठिर ने भी इस क्षेत्र में विशाल यज्ञ किया था। माना जाता है कि अर्जुन के बाण से यहां जलधारा फूटी, जो आज बोहनिया तालाब के नाम से प्रसिद्ध है। कांवड़ यात्रा पर आने वाले श्रद्धालु पहले इसी पवित्र सरोवर में स्नान कर भगवान लोधेश्वर के दर्शन के लिए प्रस्थान करते हैं।
कलयुग में लोधेराम अवस्थी को स्वप्न में हुए भगवान शिव के दर्शन
पौराणिक कथा के अनुसार समय के साथ शिवलिंग भूमि में विलुप्त हो गया था। कलयुग में लोधौरा गांव निवासी लोधेराम अवस्थी खेत की सिंचाई कर रहे थे, तभी पानी एक गड्ढे में समाता चला गया। खुदाई के दौरान फावड़ा पत्थर से टकराया और वहां से रक्त की धारा निकलने लगी। भयभीत होकर वह घर लौट आए। रात में भगवान शिव ने उन्हें स्वप्न में दर्शन देकर बताया कि वह उसी स्थान पर स्वयंभू रूप में विराजमान हैं। अगले दिन लोधेराम ने वहां शिवलिंग स्थापित कर पूजा-अर्चना शुरू की। भगवान शिव ने वरदान दिया कि कलयुग में उनका नाम लोधे + ईश्वर = लोधेश्वर के रूप में प्रसिद्ध होगा और लोधेराम का नाम भी अमर रहेगा।
मठ परंपरा आज भी कायम, उत्तराधिकार विवाद न्यायालय में
कथा के अनुसार भगवान शिव के निर्देश पर लोधेराम अवस्थी ने मंदिर की आधी व्यवस्था संन्यासी सवाई सहदेव पुरी को सौंप दी, जो पहले महंत बने। उनके बाद परमहंस पुरी, अच्युत पुरी, रामेश्वर पुरी, निर्वाण पुरी, अलखपुरी, शिवरामपुरी, बृजरामपुरी, नंदलालपुरी, जानकी पुरी, त्रिलोकपुरी, टीकमपुरी, फूलपुरी, नारायणपुरी, धीरज पुरी, बलभद्रपुरी, राजेंद्रपुरी और चंद्र चूड़ेन्द्र पुरी सहित कई महंतों ने गद्दी संभाली। वर्तमान में उत्तराधिकार का मामला न्यायालय में विचाराधीन है। महादेवा मठ से जुड़ी कई सहायक गद्दियां भी विभिन्न क्षेत्रों में संचालित हैं और मंदिर की परंपरा आज भी पुरी संप्रदाय के संन्यासियों द्वारा निभाई जा रही है।
सालभर लगते हैं चार बड़े मेले, लाखों श्रद्धालु पहुंचते हैं धाम
लोधेश्वर महादेव धाम में प्रतिवर्ष चार प्रमुख धार्मिक मेलों का आयोजन होता है। इनमें महाशिवरात्रि, श्रावण मास, भाद्रपद की हरितालिका तीज तथा अगहन मास का मेला प्रमुख है। सावन में दूर-दूर से कांवड़िए गंगाजल लेकर पैदल यात्रा करते हुए ‘बम-बम भोले’ के जयघोष के साथ भगवान लोधेश्वर का जलाभिषेक करते हैं। सामान्य दिनों में भी प्रतिदिन हजारों श्रद्धालु यहां दर्शन के लिए पहुंचते हैं।
कॉरिडोर बनने से बढ़ेंगी सुविधाएं और श्रद्धालुओं की संख्या
मंदिर के पुजारी आदित्य तिवारी के अनुसार लोधेश्वर धाम में प्रतिदिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु दर्शन-पूजन के लिए आते हैं, जबकि सावन, महाशिवरात्रि, कजरी तीज और अगहन मेले में यह संख्या लाखों तक पहुंच जाती है। वहीं वरिष्ठ पत्रकार चंद्र प्रकाश चौरसिया का कहना है कि उत्तर भारत के प्रमुख तीर्थ स्थलों में शामिल लोधेश्वर महादेव धाम का महत्व कॉरिडोर बनने के बाद और बढ़ेगा। इससे श्रद्धालुओं को बेहतर सुविधाएं मिलेंगी और धार्मिक पर्यटन को भी नई पहचान मिलेगी।