सत्य निकेतन हादसा: मलबे में दबा था 20 साल का अयान, लोगों ने बचाई जान

दिल्ली के सत्य निकेतन में इमारत गिरने के हादसे ने लोगों को झकझोर दिया। 20 साल का अयान मलबे में दब गया था।

सत्य निकेतन हादसे में मलबे से अयान को बचाने की कोशिश करते लोग
सत्य निकेतन हादसे में मलबे से अयान को बचाने की कोशिश करते लोग

नई दिल्ली/अमर भारती। दिल्ली के सत्य निकेतन में इमारत गिरने की घटना ने एक बार फिर उस भयावह मंजर को सामने ला दिया, जिसमें कुछ पल पहले तक सामान्य जिंदगी जी रहे लोग अचानक मलबे के नीचे दब गए। इस हादसे में 20 साल के अयान की जिंदगी भी कुछ समय के लिए मलबे के बीच अटक गई थी।

अयान के पिता वकील हैं। हादसे के बाद जब वह अपने बेटे को देखते हैं तो उनके लिए यह किसी चमत्कार से कम नहीं है कि अयान जिंदा बचकर बाहर आ गया। लेकिन हादसे का डर उसके मन में इस कदर बैठ गया है कि वह अब खामोश रहता है। उस भयावह घटना को याद करते हुए उसकी आवाज तक कांपने लगती है।

करीब एक साल से सत्य निकेतन में काम सीख रहा था अयान

मोची गांव का रहने वाला अयान पिछले करीब एक साल से सत्य निकेतन में एक बिजली की दुकान पर काम सीख रहा था। हादसे वाले दिन भी वह दुकान के बाहर स्टूल पर बैठा हुआ था। अयान के मुताबिक दोपहर करीब एक बजे का वक्त था। वह लंच करने के लिए घर जाने की सोच रहा था। तभी अचानक पूरी बिल्डिंग भरभराकर नीचे गिर गई। अयान कुछ समझ पाता, उससे पहले ही वह मलबे के नीचे दब चुका था। अचानक सब कुछ अंधेरे में बदल गया। चारों तरफ मलबा था। बाहर क्या हो रहा है, यह दिखाई नहीं दे रहा था। उस समय उसके सामने सबसे बड़ा डर अपनी जिंदगी को लेकर था।

‘एक पल को लगा अब अब्बा-अम्मी को नहीं देख पाऊंगा’

मलबे के नीचे दबे अयान ने मदद के लिए आवाज लगाई। वह बचाओ-बचाओ चिल्ला रहा था। उसे सांस लेने में भी परेशानी हो रही थी। हर गुजरते पल के साथ डर बढ़ता जा रहा था। अयान के मुताबिक एक पल ऐसा भी आया जब उसे लगा कि शायद वह दोबारा अपने अब्बा-अम्मी को नहीं देख पाएगा। उसके आसपास अंधेरा था और ऊपर मलबे का भारी बोझ। ऐसी स्थिति में हर सेकंड उसके लिए बेहद भारी था। इसी दौरान सौरव और उनके भाई वहां पहुंचे। दोनों ने मलबे के बीच से अयान को बाहर निकालने की कोशिश शुरू की। आखिरकार जिंदगी और मौत के बीच फंसे अयान को मलबे से बाहर निकाला गया। इसके बाद उसे सफदरजंग अस्पताल ले जाया गया। वहां उसका इलाज हुआ और बुधवार शाम उसे अस्पताल से छुट्टी मिल गई।

हादसे के वक्त पास की दुकान में थे गोरे लालजी

इस हादसे को अपनी आंखों के सामने देखने वालों में 59 साल के गोरे लालजी भी शामिल हैं। वह शिव मंदिर के पास स्थित लॉन्ड्री में अपने काम में व्यस्त थे। दुकान में उस वक्त उनके अलावा छह लोग और मौजूद थे। अचानक तेज आवाज हुई और धूल का गुबार तेजी से दुकान के अंदर पहुंच गया। कुछ ही पल में ऐसा लगा जैसे पूरा माहौल बदल गया हो। लोग घबराकर दुकान से बाहर निकलने लगे। बाहर आने के बाद जो मंजर दिखाई दिया, उसने सभी को हिला दिया। चारों तरफ मलबा था। उस मलबे के बीच से मदद के लिए चीख-पुकार सुनाई दे रही थी।

मलबे के बीच सिर्फ बच्चे की गर्दन दिखाई दे रही थी

गोरे लालजी के मुताबिक मलबे के बीच एक बच्चे की सिर्फ गर्दन दिखाई दे रही थी। वह लगातार मदद की गुहार लगा रहा था। आवाज सुनते ही आसपास के लोग उसकी तरफ दौड़े। लेकिन मुश्किल यह थी कि मलबा इतना भारी था कि किसी को समझ नहीं आ रहा था कि उसे हटाने के लिए कहां से शुरुआत की जाए। यह भी पता नहीं चल पा रहा था कि मलबे के नीचे कितने लोग और कहां दबे हुए हैं।

कुछ लोग अपने हाथों से मलबा हटाने की कोशिश कर रहे थे। कुछ लोग मदद के लिए फोन कर रहे थे। लेकिन उस समय सबसे बड़ी चुनौती सामने दबे लोगों तक पहुंचना थी। गोरे लालजी खुद कहते हैं कि उनके शरीर में इतनी ताकत नहीं थी कि वह भारी मलबा हटा सकें। सामने बच्चा लगातार चीख रहा था और वह चाहकर भी उसकी मदद नहीं कर पा रहे थे। ऐसे में वह आसपास के लोगों को आवाज लगाकर मदद के लिए बुलाते रहे।

अयान की जिंदगी बची, लेकिन डर अभी बाकी

अयान के लिए यह हादसा केवल एक इमारत के गिरने की घटना नहीं थी। वह कुछ समय के लिए जिंदगी और मौत के बीच फंस गया था। अंधेरे में दबे रहने, सांस लेने में परेशानी और अपने परिवार को दोबारा न देख पाने का डर उसके मन पर गहरा असर छोड़ गया। बचाव के बाद उसे अस्पताल पहुंचाया गया और इलाज के बाद छुट्टी भी मिल गई। लेकिन हादसे की याद अब भी उसके साथ है। उसके पिता के लिए भी यह घटना उस डरावने वक्त की याद दिलाती है जब उनका बेटा मलबे में जिंदगी के लिए संघर्ष कर रहा था।

सत्य निकेतन की यह घटना उन लोगों की हिम्मत को भी सामने लाती है, जो हादसे के बाद बिना समय गंवाए मदद के लिए आगे आए। सौरव और उनके भाई ने मलबे में फंसे अयान को बाहर निकालने में मदद की, जबकि आसपास मौजूद लोग भी राहत और बचाव की कोशिशों में जुट गए।

इस हादसे के बाद सामने आई अयान और गोरे लालजी की कहानी बताती है कि इमारत गिरने जैसी घटना में सिर्फ मलबा नहीं गिरता, बल्कि उसके नीचे लोगों की जिंदगी, परिवारों की उम्मीद और कई सपने भी दब जाते हैं। अयान के बच जाने से उसके परिवार को राहत जरूर मिली, लेकिन हादसे का खौफ उसकी यादों में लंबे समय तक बना रहने वाला है।

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