खुफिया एजेंसियों ने उत्तर भारत की जेलों में SFJ नेटवर्क द्वारा नए गुर्गों की भर्ती की आशंका जताई है। पटियाला जेल से जुड़े इनपुट की जांच जारी है।

डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। उत्तर भारत की जेलों को लेकर खुफिया एजेंसियों ने एक संभावित खतरे के संबंध में अलर्ट जारी किया है। एजेंसियों के इनपुट के मुताबिक, प्रतिबंधित खालिस्तानी संगठन सिख्स फॉर जस्टिस (SFJ) जेलों में बंद कैदियों के बीच अपना नेटवर्क बढ़ाने और नए लोगों को अपने साथ जोड़ने की कोशिश कर सकता है। जांच एजेंसियों के अनुसार, हाल ही में गिरफ्तार किए गए एक कथित गुर्गे से पूछताछ के दौरान इस नेटवर्क से जुड़ी कुछ महत्वपूर्ण जानकारियां सामने आई हैं।
जांच में सामने आई जानकारी के मुताबिक, आरोपी जब पटियाला जेल में सजा काट रहा था, उसी दौरान कथित तौर पर उसे इस नेटवर्क से जोड़ा गया। पूछताछ में यह भी दावा सामने आया कि जेल के भीतर ही उसे SFJ प्रमुख और विदेश में रह रहे खालिस्तानी समर्थक गुरपतवंत सिंह पन्नू का संपर्क नंबर उपलब्ध कराया गया था। हालांकि, इन दावों की जांच अभी जारी है और सामने आई जानकारी को जांच एजेंसियों के इनपुट के तौर पर देखा जा रहा है।
जेलों में नए गुर्गों की भर्ती का आरोप
खुफिया एजेंसियों को आशंका है कि जेलों में मौजूद कुछ बंदियों को नेटवर्क में शामिल करने की कोशिश की जा सकती है। जांच के अनुसार, आर्थिक रूप से कमजोर कैदी या पहली बार छोटे अपराधों के मामलों में जेल पहुंचने वाले लोग ऐसे नेटवर्क के निशाने पर हो सकते हैं।
एजेंसियों के मुताबिक, जेल के भीतर संपर्क बनाए जाने के बाद बाहर मौजूद नेटवर्क के साथ कनेक्शन स्थापित करने की कोशिश की जाती है। इस तरह जेल से बाहर आने वाले लोगों का इस्तेमाल आगे अलग-अलग गतिविधियों में किए जाने की आशंका जताई गई है।
जासूसी में इस्तेमाल होने वाला ‘डेड-ड्रॉप’ तरीका क्या है?
जांच से जुड़े इनपुट में डेड-ड्रॉप जैसी पारंपरिक जासूसी तकनीक के इस्तेमाल का भी उल्लेख किया गया है। इसका सामान्य अर्थ ऐसी व्यवस्था से है, जिसमें दो पक्षों के बीच सीधे संपर्क के बजाय किसी निर्धारित स्थान पर सामान, दस्तावेज या अन्य सामग्री छोड़कर बाद में उसे दूसरे व्यक्ति द्वारा हासिल किया जाता है।
खुफिया एजेंसियों के अनुसार, आपराधिक और आतंकी नेटवर्क इस तरह की व्यवस्था का इस्तेमाल अपनी पहचान और प्रत्यक्ष संपर्क को छिपाने के लिए कर सकते हैं। जांच में सीमा पार से होने वाली कथित गतिविधियों, हथियारों की आपूर्ति और नकदी पहुंचाने के नेटवर्क की भी पड़ताल की जा रही है।
डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिए संपर्क की आशंका
खुफिया एजेंसियों को आशंका है कि विदेश में बैठे हैंडलर और भारत में मौजूद स्थानीय लोगों के बीच संपर्क के लिए एन्क्रिप्टेड मैसेजिंग प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल किया जा सकता है। ऐसे प्लेटफॉर्म के जरिए संपर्क होने पर नेटवर्क में शामिल लोगों की पहचान और भूमिका की जांच करना सुरक्षा एजेंसियों के लिए चुनौती बन सकता है।
जांच में सीमा पार से ड्रोन के जरिए हथियार या अन्य सामग्री पहुंचाए जाने की आशंकाओं को भी शामिल किया गया है। एजेंसियां इन संभावित कड़ियों की पुष्टि के लिए गिरफ्तार आरोपियों से पूछताछ और अन्य तकनीकी एवं भौतिक साक्ष्यों की जांच कर रही हैं।
2016 के नाभा जेलब्रेक की याद
जेल के भीतर नेटवर्क तैयार करने की आशंका ने 2016 के नाभा जेलब्रेक की घटना की याद ताजा कर दी है। नवंबर 2016 में पंजाब की नाभा जेल पर हमला कर हथियारबंद हमलावरों ने कुछ कैदियों को छुड़ा लिया था। इस घटना ने जेल सुरक्षा और संगठित आपराधिक नेटवर्क के बीच संभावित संबंधों को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए थे।
मौजूदा मामले में खुफिया एजेंसियों यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि क्या जेलों के भीतर किसी संगठित नेटवर्क के जरिए कैदियों को प्रभावित किया जा रहा है और क्या इसका संबंध सीमा पार बैठे हैंडलरों से है।
आर्थिक रूप से कमजोर कैदियों पर नजर?
खुफिया एजेंसियों के मुताबिक, ऐसे नेटवर्क उन कैदियों को प्रभावित करने की कोशिश कर सकते हैं जो आर्थिक या सामाजिक रूप से कमजोर स्थिति में हों। पहली बार जेल पहुंचने वाले या छोटे अपराधों में बंद कैदियों को कथित तौर पर लालच, आर्थिक मदद या अन्य माध्यमों से प्रभावित करने की आशंका जताई गई है।
हालांकि, किसी भी कैदी को केवल आरोपों या संपर्क के आधार पर किसी आतंकी नेटवर्क का हिस्सा मानना उचित नहीं होगा। जांच एजेंसियों को प्रत्येक मामले में उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर ही आगे की कार्रवाई करनी होगी।
सुरक्षा एजेंसियों के लिए बड़ी चुनौती
उत्तर भारत की जेलों में बंद कैदियों के बीच किसी बाहरी नेटवर्क की संभावित गतिविधि सुरक्षा व्यवस्था के लिए गंभीर चुनौती हो सकती है। खुफिया एजेंसियों जेल प्रशासन और अन्य सुरक्षा इकाइयों के साथ मिलकर संदिग्ध संपर्कों और संभावित नेटवर्क की जांच कर रही हैं।
फिलहाल जांच का मुख्य फोकस गिरफ्तार आरोपी से मिले इनपुट, कथित संपर्कों और सीमा पार से संचालित नेटवर्क के बीच संभावित संबंधों की पुष्टि पर है। जांच पूरी होने के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि सामने आए दावों का वास्तविक नेटवर्क कितना व्यापक है।
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