बाराबंकी। विधानसभा चुनाव 2027 अभी दूर है, लेकिन बाराबंकी सदर की सियासी बिसात पर मोहरे सजने लगे हैं। भाजपा के संभावित प्रत्याशियों को लेकर चल रही चर्चाओं के बीच नेत्र सर्जन डॉ. विवेक सिंह वर्मा का नाम तेजी से राजनीतिक गलियारों में सुनाई दे रहा है। सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि भाजपा किसे टिकट देगी, बल्कि असली सवाल यह है कि क्या पार्टी इस बार ऐसा चेहरा तलाश रही है जो वर्षों से उसके लिए चुनौती बनी सदर सीट पर कमल खिलाने की जमीन तैयार कर सके?

डॉ. विवेक सिंह वर्मा का नाम इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि वह इस सीट के चुनावी मैदान से नए नहीं हैं। वर्ष 2022 में उन्होंने बहुजन समाज पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ा था और 42,506 वोट हासिल कर तीसरे स्थान पर रहे थे। उस चुनाव में सपा के धर्मराज सिंह यादव को 1,25,500 वोट मिले थे, जबकि भाजपा की डॉ. रामकुमारी मौर्य 90,450 वोटों के साथ दूसरे स्थान पर रही थीं। धर्मराज यादव ने भाजपा प्रत्याशी को 35,050 वोटों से हराया था।
42 हजार वोटों का आंकड़ा बना सियासी पूंजी
चुनाव हारने के बावजूद डॉ. विवेक सिंह वर्मा का 42 हजार से अधिक वोट हासिल करना उनकी राजनीतिक पहचान का अहम हिस्सा बन गया। यही वजह है कि 2027 की संभावित चुनावी रणनीति में उनके नाम को लेकर चर्चाएं तेज हैं।
राजनीतिक समीकरणों को समझने वालों के लिए सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि 2022 में भाजपा और बसपा प्रत्याशी के वोटों को जोड़ दिया जाए तो यह संख्या सपा प्रत्याशी के मुकाबले काफी करीब पहुंचती है। हालांकि चुनाव में अलग-अलग दलों के वोटों को सीधे जोड़कर भविष्य का परिणाम निकालना राजनीतिक रूप से सही नहीं माना जा सकता, लेकिन यह आंकड़ा भाजपा के लिए स्थानीय जनाधार और संभावित सामाजिक समीकरणों की चर्चा जरूर पैदा करता है।
सदर में भाजपा की सबसे बड़ी चुनौती—‘अपना चेहरा’
बाराबंकी सदर सीट भाजपा के लिए लंबे समय से चुनौतीपूर्ण रही है। 2022 में भी पार्टी दूसरे स्थान पर रही और सपा के धर्मराज सिंह यादव ने जीत दर्ज की। उपलब्ध चुनावी आंकड़ों के मुताबिक धर्मराज यादव 2012, 2017 और 2022 में लगातार तीन बार इस सीट से निर्वाचित हुए हैं।
ऐसे में 2027 में भाजपा के सामने सिर्फ संगठन को मजबूत करने की चुनौती नहीं है, बल्कि उसे ऐसा स्थानीय चेहरा भी चाहिए जो पार्टी के परंपरागत वोट बैंक के साथ अपना व्यक्तिगत प्रभाव जोड़ सके।
इसी बिंदु पर डॉ. विवेक सिंह वर्मा की संभावित दावेदारी को उनके समर्थक महत्वपूर्ण मान रहे हैं।
डॉक्टर की पहचान से राजनीति तक
डॉ. विवेक सिंह वर्मा की पहचान पेशे से नेत्र सर्जन की है। चिकित्सकीय पेशे के कारण क्षेत्र में उनका संपर्क और सामाजिक पहचान भी उनकी राजनीतिक पूंजी के तौर पर देखी जा रही है।
2022 में बसपा ने उन्हें बाराबंकी सदर से उम्मीदवार बनाया था। उस समय उनकी उम्मीदवारी की खबरें भी प्रमुखता से सामने आई थीं।
अब यदि भाजपा के भीतर उनका नाम संभावित दावेदार के रूप में आगे बढ़ता है तो यह उनके राजनीतिक सफर का महत्वपूर्ण मोड़ हो सकता है।
लेकिन टिकट की राह आसान नहीं
हालांकि किसी भी संभावित दावेदार के लिए सिर्फ पिछला चुनावी प्रदर्शन टिकट की गारंटी नहीं होता। भाजपा में प्रत्याशी चयन के दौरान संगठनात्मक सक्रियता, बूथ स्तर की पकड़, स्थानीय समीकरण, कार्यकर्ताओं की स्वीकार्यता, सर्वे और नेतृत्व की रणनीति जैसे कई पहलू निर्णायक हो सकते हैं।
सदर सीट पर भाजपा के भीतर अन्य दावेदारों के नाम भी चर्चा में हैं। ऐसे में डॉ. विवेक सिंह वर्मा के सामने सबसे बड़ी चुनौती सिर्फ अपनी दावेदारी मजबूत करने की नहीं, बल्कि पार्टी संगठन के भीतर व्यापक स्वीकार्यता हासिल करने की भी होगी।
सपा के मजबूत गढ़ को भेदने की चुनौती
2022 के नतीजे बताते हैं कि सदर में सपा का आधार मजबूत रहा है। धर्मराज यादव ने 1,25,500 वोट हासिल किए थे, जबकि भाजपा को 90,450 और बसपा को 42,506 वोट मिले।
इसलिए भाजपा यदि 2027 में यहां बदलाव का लक्ष्य लेकर उतरती है तो उसे मजबूत संगठन के साथ एक ऐसे प्रत्याशी की जरूरत होगी जो सपा के मौजूदा आधार को चुनौती दे सके।
डॉ. विवेक सिंह वर्मा के समर्थक 2022 के उनके प्रदर्शन को इसी संदर्भ में उनकी सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत बता रहे हैं।
कमल के सामने अब चेहरा कौन?
भाजपा के लिए सदर सीट पर सवाल सिर्फ चुनाव जीतने का नहीं, बल्कि वर्षों से चली आ रही राजनीतिक तस्वीर बदलने का भी है। यदि पार्टी डॉ. विवेक सिंह वर्मा को मैदान में उतारती है तो उनके सामने दोहरी चुनौती होगी—एक तरफ अपने पुराने समर्थकों को भाजपा के साथ जोड़ना और दूसरी तरफ पार्टी के परंपरागत मतदाताओं तथा संगठन का भरोसा हासिल करना।
फिलहाल भाजपा ने 2027 के लिए बाराबंकी सदर से किसी प्रत्याशी की आधिकारिक घोषणा नहीं की है। इसलिए डॉ. विवेक सिंह वर्मा के नाम को अभी संभावित दावेदारी के तौर पर ही देखा जाना चाहिए।
लेकिन इतना तय है कि सदर की सियासत में उनका नाम फिर से चर्चा में आ गया है।
अब देखना यह होगा कि भाजपा इस बार चेहरा बदलकर इतिहास बदलने की कोशिश करती है या किसी और नाम पर भरोसा जताती है। अगर विवेक के नाम पर पार्टी का दांव लगा, तो 2027 में बाराबंकी सदर का चुनाव सिर्फ एक सीट का मुकाबला नहीं, बल्कि 42 हजार वोटों के पुराने आंकड़े और भाजपा के संगठनात्मक वोट बैंक के बीच नए समीकरण की परीक्षा भी बन सकता है।