लखनऊ। महाभारत में पांडवों को जिंदा जलाने के लिए लाक्षागृह बनाया गया था। 21वीं सदी के आधुनिक लखनऊ में ऐसा कोई लाक्षागृह बनाने की साजिश तो नहीं थी, लेकिन अलीगंज के पुरनिया इलाके में जिस इमारत में 15 लोगों की दर्दनाक मौत हुई, वह सुरक्षा मानकों की अनदेखी, विभागीय लापरवाही और नियमों की धज्जियां उड़ाने का ऐसा उदाहरण बन गई है जिसने पूरे सिस्टम को कठघरे में खड़ा कर दिया है। जिन मंजिलों पर युवा अपने भविष्य के सपने संजो रहे थे, वही मंजिलें कुछ मिनटों में मौत के जाल में बदल गईं।
22 जून 2026 को हुए इस भीषण अग्निकांड के बाद पुलिस, फॉरेंसिक साइंस लैब (FSL), विशेष जांच दल (SIT), लखनऊ विकास प्राधिकरण (LDA) और अन्य एजेंसियों की जांच लगातार कई चौंकाने वाले खुलासे कर रही है। शुरुआती जांच से लेकर अब तक सामने आए तथ्य यह संकेत दे रहे हैं कि हादसा केवल आग लगने का नहीं था, बल्कि वर्षों से चली आ रही अनदेखी और जवाबदेही के अभाव का परिणाम था।
पुलिस ने इस मामले में छह नामजद आरोपियों समेत अन्य जिम्मेदार लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया है। अब तक तीन आरोपियों—रामकृष्ण उपाध्याय, वीरेंद्र प्रसाद शुक्ला और तुषार कृष्णा जायसवाल—को गिरफ्तार किया जा चुका है। जांच एजेंसियों का मानना है कि इस हादसे के पीछे केवल एक तकनीकी खराबी नहीं, बल्कि नियमों की अनदेखी और सुरक्षा मानकों की घोर लापरवाही भी जिम्मेदार हो सकती है।
प्रारंभिक जांच में सामने आया है कि जिस तीन मंजिला इमारत में आग लगी, वह मूल रूप से आवासीय उपयोग के लिए स्वीकृत थी। बाद में इसका उपयोग व्यावसायिक गतिविधियों के लिए किया जाने लगा। ग्राउंड फ्लोर पर पेट क्लिनिक संचालित था, जबकि ऊपरी मंजिलों पर लाइब्रेरी, एनिमेशन और 3D आर्ट प्रोडक्शन स्टूडियो चल रहे थे। बताया जा रहा है कि इमारत में आपातकालीन निकास की व्यवस्था नहीं थी और केवल एक संकरी सीढ़ी ही आने-जाने का रास्ता थी। आग लगने के बाद यही सीढ़ी धुएं से भर गई और भीतर मौजूद लोग फंस गए।
दमकल कर्मियों को कई लोगों तक पहुंचने के लिए इमारत की पिछली दीवार तोड़नी पड़ी। FSL की टीम ने घटनास्थल को क्राइम सीन घोषित कर साक्ष्य जुटाने शुरू कर दिए हैं। ग्राउंड फ्लोर से दूसरी मंजिल तक वीडियोग्राफी की गई और आग के कारणों की वैज्ञानिक जांच की जा रही है। वहीं SIT ने KGMU ट्रॉमा सेंटर पहुंचकर घायलों और उनके परिजनों से पूछताछ की है। जांच टीम को सात दिनों के भीतर अपनी रिपोर्ट शासन को सौंपनी है।
जांच का दायरा अब केवल भवन मालिकों तक सीमित नहीं है। सूत्रों के अनुसार करीब 16 अधिकारियों और कर्मचारियों की भूमिका भी जांच के घेरे में है। नगर निगम वर्ष 2022 से भवन से व्यावसायिक कर वसूल रहा था, जबकि भवन का मूल नक्शा आवासीय था। ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि यदि उपयोग बदल गया था तो संबंधित विभागों ने समय रहते कार्रवाई क्यों नहीं की। मुख्यमंत्री के निर्देश पर LDA के संबंधित एई और जेई को निलंबित भी किया जा चुका है।
LDA उपाध्यक्ष प्रथमेश कुमार ने मामले की जांच के लिए पांच सदस्यीय समिति का गठन किया है। ज्ञानेंद्र वर्मा के नेतृत्व में बनी इस समिति में के.के. गौतम, मानवेंद्र सिंह, मनोज सागर और रविनंदन सिंह को शामिल किया गया है। समिति भवन के नक्शे, निर्माण, उपयोग परिवर्तन और सुरक्षा मानकों की जांच करेगी।
सोमवार को FSL की टीम घटनास्थल पर पहुंची और उस स्थान का निरीक्षण किया जहां से मृतकों और घायलों को बाहर निकाला गया था। पूरे भवन को क्राइम सीन घोषित कर हर साक्ष्य को सुरक्षित किया गया। दूसरी ओर SIT की टीम ने घटनास्थल के अलावा ट्रॉमा सेंटर पहुंचकर घायलों और परिजनों से भी पूछताछ की। टीम में शामिल अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि सरकारी और निजी दोनों पक्षों की जिम्मेदारी तय की जाएगी।
इस बीच कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष अजय राय ने भी KGMU पहुंचकर घायलों और मृतकों के परिजनों से मुलाकात की तथा दोषियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई की मांग की।
लखनऊ के बड़े अग्निकांड और उनसे मिले सबक
🔴 अलीगंज अग्निकांड (22 जून 2026) मृतक: 15
कारण: एसी शॉर्ट-सर्किट की आशंका
चूक: इमरजेंसी एग्जिट नहीं, एक संकरी सीढ़ी, आवासीय भवन का व्यावसायिक उपयोग
🔴 नगराम पटाखा फैक्ट्री विस्फोट (15 जून 2026) मृतक: 1 बच्ची
घायल: 1
चूक: सुरक्षा मानकों की अनदेखी
🔴 विकासनगर झुग्गी अग्निकांड (15 अप्रैल 2026) मृतक: 2 बच्चे
प्रभावित: 280 से अधिक परिवार
चूक: एलपीजी सिलेंडरों के धमाकों से आग बेकाबू
🔴 लखनऊ बाईपास बस अग्निकांड (15 मई 2025) मृतक: 5 यात्री
चूक: ओवरलोडिंग और सुरक्षा इंतजामों की कमी
🔴 चारबाग होटल अग्निकांड (19 जून 2018) मृतक: 7
चूक: फायर सेफ्टी उपकरणों और वेंटिलेशन का अभाव
🔴 अमीनाबाद मेडिसिन मार्केट अग्निकांड (26 मार्च 2015) मृतक: शून्य
नुकसान: करोड़ों रुपये
चूक: संकरी गलियों के कारण राहत कार्य प्रभावित
इन सभी घटनाओं का अध्ययन करने पर एक समान पैटर्न सामने आता है। अधिकांश मामलों में शॉर्ट-सर्किट, सुरक्षा मानकों की अनदेखी, आपातकालीन निकास का अभाव, अवैध निर्माण और आवासीय भवनों का व्यावसायिक उपयोग प्रमुख कारण रहे हैं। हर बड़े हादसे के बाद जांच बैठी, रिपोर्ट बनी, कार्रवाई के दावे हुए, लेकिन कुछ समय बाद सब कुछ सामान्य होता गया और फिर एक नया अग्निकांड सामने आ गया।
अलीगंज अग्निकांड ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर कब तक लापरवाही की कीमत लोगों को अपनी जान देकर चुकानी पड़ेगी। क्या इस बार जांच की आंच केवल भवन मालिकों तक पहुंचेगी या उन अधिकारियों और विभागों तक भी जाएगी जिनकी जिम्मेदारी ऐसे हादसों को रोकना थी? क्या शहर की हजारों व्यावसायिक इमारतों, कोचिंग सेंटरों, हॉस्टलों और संस्थानों का वास्तविक फायर ऑडिट होगा या यह भी कुछ दिनों की सुर्खियों तक सीमित रह जाएगा?
SIT की रिपोर्ट का इंतजार पूरे प्रदेश को है, लेकिन उससे भी बड़ा इंतजार इस सवाल के जवाब का है कि आखिर इस लाक्षागृह के असली गुनहगार कौन हैं। क्योंकि 15 युवाओं की मौत केवल एक आंकड़ा नहीं, बल्कि सिस्टम की उस विफलता का प्रमाण है जिसकी कीमत कई परिवारों ने अपने बच्चों को खोकर चुकाई है।