
उन्नाव। शिक्षक की असली पहचान सिर्फ इस बात से नहीं होती कि उसने कितने बच्चों को पाठ पढ़ाया, बल्कि इससे होती है कि उसने कितने बच्चों को अपने सपनों पर विश्वास करना सिखाया। गांव के बच्चों को अवसर, मंच और आत्मविश्वास देकर उनकी प्रतिभा को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने की ऐसी ही कहानी लिख रहे हैं डॉ. प्रदीप कुमार वर्मा।
वर्ष 2013 से शिक्षण कार्य से जुड़े डॉ. वर्मा ने शिक्षक की भूमिका को महज नौकरी तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने इसे बच्चों के भविष्य और समाज के निर्माण की जिम्मेदारी माना। उच्च प्राथमिक विद्यालय रामपुर गढ़ौवा, औरास, उन्नाव आज उनके इसी संकल्प का जीवंत उदाहरण है।
कम संसाधनों से बदली विद्यालय की तस्वीर
कभी सीमित संसाधनों और कम छात्र संख्या वाला विद्यालय आज 150 से अधिक नामांकन, 85 से 90 प्रतिशत उपस्थिति और शून्य ड्रॉपआउट के साथ शिक्षा, खेल और नवाचार के क्षेत्र में अपनी अलग पहचान बना चुका है।
विद्यालय में इनवर्टर, सोलर पैनल, बागवानी, कूलर, वाटर कूलर, बेहतर फर्नीचर, कंप्यूटर और एल.बी.डी. लैब जैसी सुविधाओं ने विद्यालय के वातावरण को बदला। इसका असर अभिभावकों के विश्वास पर भी दिखाई दिया। निजी विद्यालयों से लौटकर 40 से अधिक बच्चों ने दोबारा इस परिषदीय विद्यालय में प्रवेश लिया, जो सरकारी शिक्षा व्यवस्था के प्रति बढ़ते भरोसे का संकेत है।
गांव की बेटियों ने फुटबॉल में रचा इतिहास
विद्यालय की सबसे उल्लेखनीय उपलब्धियों में खेलों में बच्चों की सफलता शामिल है। डॉ. वर्मा ने ग्रामीण प्रतिभाओं को पहचानकर उन्हें ब्लॉक से जिला, मंडल और राज्य स्तर तक पहुंचाने का प्रयास किया।
विद्यालय कई वर्षों से ब्लॉक स्तर पर चैंपियन रहा है। इसी क्रम में विद्यालय की 12 बेटियों की फुटबॉल टीम लखनऊ मंडल चैंपियन बनी और एसजीएफआई राज्य स्तरीय प्रतियोगिता तक पहुंची।
यह उपलब्धि सिर्फ एक खेल टीम की जीत नहीं थी, बल्कि उन ग्रामीण बेटियों के लिए एक संदेश भी थी, जिन्हें अक्सर संसाधनों और अवसरों की कमी के कारण अपनी प्रतिभा दिखाने का मंच नहीं मिल पाता।
डॉ. वर्मा का प्रयास यही साबित करता है कि प्रतिभा संसाधनों की मोहताज नहीं होती, उसे जरूरत होती है दिशा, अवसर और विश्वास की।
उपलब्धियों ने प्रशासन का ध्यान खींचा
विद्यालय की लगातार सफलताओं और बदलते स्वरूप से प्रभावित होकर जिलाधिकारी की ओर से एमडीएम शेड, ओपन जिम और खेल मैदान जैसी सुविधाएं उपलब्ध कराई गईं। प्रशासन का यह सहयोग विद्यालय की बदलती पहचान और उसके प्रयासों को मिली महत्वपूर्ण स्वीकृति के रूप में देखा गया।
पढ़ाई में भी लगातार बढ़ता प्रदर्शन
खेल के साथ-साथ शैक्षिक क्षेत्र में भी विद्यालय ने उल्लेखनीय उपलब्धियां हासिल की हैं। विद्यार्थियों का NMMS में छह बार चयन, विज्ञान संबंधी योजनाओं में उत्कृष्ट प्रदर्शन, चार विद्यार्थियों का टॉप-10 में स्थान तथा UNICEF के 13 प्रोजेक्ट शूट विद्यालय की शैक्षिक और नवाचारी गतिविधियों को रेखांकित करते हैं।
विद्यालय की एल.बी.डी. लैब को भी उत्कृष्ट कार्य के लिए पहचान मिल चुकी है।
डॉ. वर्मा बच्चों को केवल परीक्षा और अंकों की दौड़ तक सीमित नहीं रखते। उनका प्रयास रहता है कि बच्चे खेल, विज्ञान, रचनात्मकता, अभिव्यक्ति और विभिन्न प्रतिस्पर्धी मंचों से जुड़ें और अपनी क्षमताओं को पहचानें।
शिक्षक के लिए बच्चा सिर्फ विद्यार्थी नहीं
डॉ. वर्मा का मानना है कि शिक्षक बच्चे की सीमा तय नहीं करता, बल्कि उसकी संभावनाओं का विस्तार करता है।
इसी सोच के तहत उन्होंने विद्यालय की चारदीवारी से बाहर निकलकर असाक्षरों के लिए साक्षरता कार्यक्रम और निरक्षर पाठशाला जैसे प्रयास किए। मतदाता जागरूकता सहित विभिन्न सामाजिक अभियानों में भी विद्यालय के बच्चों और समुदाय को जोड़ने का प्रयास किया गया।
शिक्षा से आगे समाज को बदलने की मुहिम
डॉ. वर्मा की गतिविधियां केवल शिक्षा और खेल तक सीमित नहीं रहीं। उन्होंने नशामुक्ति और पर्यावरण संरक्षण को भी अपने सामाजिक प्रयासों का हिस्सा बनाया।
नशामुक्ति अभियान के माध्यम से हजारों विद्यालयों और लाखों लोगों तक जागरूकता पहुंचाने का दावा किया गया है। इस अभियान से जुड़े प्रयासों में करीब 1800 परिवारों द्वारा नशा छोड़ना उल्लेखनीय उपलब्धि बताई गई है।
इसी तरह Green & Clean Uttar Pradesh अभियान के तहत उन्नाव में 17 हजार से अधिक पौधों का रोपण किया गया।
सम्मान मिले, लेकिन श्रेय बच्चों को
इन बहुआयामी प्रयासों के लिए डॉ. प्रदीप कुमार वर्मा को जिलाधिकारी, बेसिक शिक्षा अधिकारी, शिक्षामंत्री और अनेक आईएएस अधिकारियों द्वारा सम्मानित किया जा चुका है। ऑनरी डॉक्टरेट और राष्ट्रीय शिक्षा श्री पुरस्कार-2025 भी उनकी कार्ययात्रा को मिली पहचान के प्रमाण हैं।
हालांकि डॉ. वर्मा इन उपलब्धियों का श्रेय स्वयं लेने के बजाय बच्चों की मेहनत, अनुशासन और लगन को देते हैं।
उनके लिए सबसे बड़ा सम्मान कोई प्रशस्ति-पत्र नहीं, बल्कि वह क्षण है जब गांव का कोई बच्चा बड़े मंच तक पहुंचता है, कोई बेटी खेल के मैदान में विद्यालय का नाम रोशन करती है, कोई अभिभावक निजी विद्यालय छोड़कर अपने बच्चे को फिर सरकारी स्कूल भेजता है या कोई असाक्षर पहली बार अक्षरों को पहचानने लगता है।
शिक्षक दिवस पर एक संदेश
शिक्षक दिवस पर डॉ. प्रदीप कुमार वर्मा की यात्रा यह संदेश देती है कि शिक्षक यदि बच्चों की किताबों के साथ उनके सपनों को भी पढ़ना सीख ले, तो वह सिर्फ विद्यार्थियों का भविष्य नहीं संवारता, बल्कि पूरे समाज की दिशा बदल सकता है।
प्रतिभा गांव में भी उतनी ही होती है जितनी शहरों में। जरूरत सिर्फ उसे पहचानने, अवसर देने और लगातार आगे बढ़ने का हौसला देने वाले शिक्षक की है।
डॉ. प्रदीप कुमार वर्मा की कहानी इसी विश्वास की कहानी है—एक ऐसे शिक्षक की, जिसने कक्षा की सीमाओं से आगे बढ़कर गांव के बच्चों को सपने देखने, उन्हें हासिल करने और दुनिया के सामने अपनी पहचान बनाने का हौसला दिया।