₹10 लीटर में गोमूत्र खरीदेगी यूपी सरकार! ग्रामीण अर्थव्यवस्था और जैविक खेती को बढ़ावा देने की तैयारी

उत्तर प्रदेश में ग्रामीण अर्थव्यवस्था और प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने के लिए ₹10 प्रति लीटर गोमूत्र खरीद की पहल की जानकारी सामने आई है। जानें पूरी योजना।

उत्तर प्रदेश में गोमूत्र खरीद और प्राकृतिक खेती
उत्तर प्रदेश में प्राकृतिक खेती और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने के लिए गोमूत्र खरीद की पहल।

नई दिल्ली/अमर भारती। उत्तर प्रदेश सरकार ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने और प्राकृतिक व जैविक खेती को बढ़ावा देने के लिए गोमूत्र की खरीद से जुड़ी पहल शुरू करने जा रही है। पायलट प्रोजेक्ट के तहत ग्रामीण क्षेत्रों से 10 रुपये प्रति लीटर की दर से गोमूत्र खरीदने की शुरुआत किए जाने की जानकारी सामने आई है। सरकार की इस पहल से किसानों और पशुपालकों को अतिरिक्त आय का जरिया मिलने के साथ प्राकृतिक खेती के लिए स्थानीय स्तर पर जैविक इनपुट उपलब्ध कराने में मदद मिलने की उम्मीद है।

कृषि क्षेत्र में गोमूत्र का इस्तेमाल कई पारंपरिक प्राकृतिक खेती के मिश्रणों में किया जाता है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) की सामग्री में भी गोमूत्र और गोबर से तैयार किए जाने वाले प्राकृतिक खेती के इनपुट, जैसे जीवामृत और बीजामृत, का उल्लेख मिलता है।

देसी गाय के गोमूत्र की मांग

वरिष्ठ आयुर्वेद विशेषज्ञ डॉ. शिव शंकर त्रिपाठी के अनुसार, आयुर्वेद में गोमूत्र का इस्तेमाल कुछ पारंपरिक औषधीय तैयारियों में किया जाता रहा है। उनका कहना है कि औषधि निर्माता भी देसी गाय के गोमूत्र की उपलब्धता की मांग कर रहे थे और सरकार की खरीद व्यवस्था से इसकी उपलब्धता आसान हो सकती है।

डॉ. त्रिपाठी के मुताबिक, आयुर्वेदिक परंपरा में गोमूत्र का इस्तेमाल विभिन्न औषधीय formulations में किया जाता है। उन्होंने लिवर से जुड़ी समस्याओं सहित कुछ स्थितियों में इसके इस्तेमाल का दावा किया है। हालांकि, ऐसे चिकित्सीय दावों को आधुनिक चिकित्सा विज्ञान में स्थापित उपचार के तौर पर नहीं माना जाना चाहिए और किसी बीमारी के इलाज के लिए इसका सेवन चिकित्सकीय सलाह के बिना नहीं किया जाना चाहिए।

प्राकृतिक खेती में गोमूत्र का इस्तेमाल

गोमूत्र का एक प्रमुख इस्तेमाल प्राकृतिक और जैविक खेती से जुड़े पारंपरिक इनपुट तैयार करने में किया जाता है। ICAR के अनुसार, जीवामृत और बीजामृत जैसी प्राकृतिक खेती की तैयारियों में गोबर और गोमूत्र का इस्तेमाल किया जाता है। कुछ प्राकृतिक खेती की प्रणालियों में गोमूत्र आधारित मिश्रणों का उपयोग पौधों की वृद्धि और कीट प्रबंधन के लिए भी किया जाता है।

ICAR की एक तकनीकी सामग्री में गोमूत्र आधारित बायोपेस्टिसाइड फॉर्मूलेशन का भी उल्लेख किया गया है। सरकार की खरीद योजना इसी तरह के कृषि उपयोगों के लिए कच्चे माल की उपलब्धता बढ़ाने और ग्रामीण स्तर पर इससे जुड़ी आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा देने की दिशा में एक कदम मानी जा रही है।

एक देसी गाय कितना गोमूत्र देती है?

डॉ. एसएस त्रिपाठी के अनुसार, एक स्वस्थ वयस्क देसी गाय प्रतिदिन औसतन करीब पांच लीटर तक गोमूत्र दे सकती है। हालांकि वास्तविक मात्रा गाय की उम्र, स्वास्थ्य, खान-पान, चारे और पानी की उपलब्धता जैसे कई कारकों पर निर्भर करती है।

अगर किसी पशुपालक को प्रतिदिन पांच लीटर गोमूत्र उपलब्ध होता है और पूरी मात्रा ₹10 प्रति लीटर की दर से खरीदी जाती है, तो सैद्धांतिक रूप से इससे प्रतिदिन ₹50 की अतिरिक्त आय हो सकती है। वास्तविक आय खरीद व्यवस्था, गुणवत्ता मानकों और संग्रह की मात्रा पर निर्भर करेगी।

गोमूत्र के औषधीय दावों पर क्या कहता है विज्ञान?

गोमूत्र को लेकर आयुर्वेद और पारंपरिक चिकित्सा में कई दावे किए जाते हैं, लेकिन इन्हें आधुनिक चिकित्सा विज्ञान में सिद्ध उपचार मानने से पहले मजबूत क्लिनिकल प्रमाण जरूरी हैं। उपलब्ध वैज्ञानिक साहित्य में प्रयोगशाला और प्री-क्लिनिकल स्तर पर कुछ शोध जरूर हुए हैं, लेकिन इनसे मनुष्यों में किसी बीमारी के प्रभावी उपचार का निष्कर्ष सीधे नहीं निकाला जा सकता।

इसलिए गोमूत्र को लिवर रोग, त्वचा रोग, संक्रमण, बवासीर या अन्य गंभीर बीमारियों का इलाज बताना वैज्ञानिक रूप से सावधानी के बिना उचित नहीं है। किसी भी बीमारी में प्रमाणित उपचार के स्थान पर इसका इस्तेमाल करने से पहले डॉक्टर की सलाह जरूरी है।

किसानों के लिए क्या बदल सकता है?

अगर गोमूत्र की खरीद व्यवस्था बड़े स्तर पर लागू होती है तो इससे ग्रामीण क्षेत्रों में पशुपालन से अतिरिक्त आय, प्राकृतिक खेती के लिए स्थानीय इनपुट की उपलब्धता और गोवंश आधारित कृषि गतिविधियों को बढ़ावा मिल सकता है। हालांकि योजना की वास्तविक सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि सरकार खरीद केंद्र कहां स्थापित करती है, गुणवत्ता के मानक क्या होंगे, भुगतान कैसे किया जाएगा और खरीदे गए गोमूत्र का इस्तेमाल किन उत्पादों या कृषि गतिविधियों में किया जाएगा। इन पहलुओं की स्पष्ट जानकारी सामने आने के बाद ही योजना के आर्थिक प्रभाव का आकलन किया जा सकेगा।

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