
लखनऊ। बाबासाहेब भीमराव अम्बेडकर विश्वविद्यालय के जैव प्रौद्योगिकी विभाग के वैज्ञानिकों ने क्षय रोग (टीबी) के उपचार और निदान के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। विभाग के डॉ. युसुफ अख्तर और शोधार्थी प्रज्ञा आनंद ने माइकोबैक्टीरियम ट्यूबरकुलोसिस एटीपी सिंथेज़ का एक अत्याधुनिक आभासी मॉडल यथार्थवादी झिल्ली वातावरण में तैयार किया है, जो भविष्य में टीबी के बेहतर निदान और प्रभावी उपचार विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। इस महत्वपूर्ण शोध को अंतरराष्ट्रीय स्तर की प्रतिष्ठित पत्रिका जर्नल ऑफ सेल्युलर बायोकेमिस्ट्री (वाइली) में प्रकाशित किया गया है।
बीबीएयू की शोध टीम ने राष्ट्रीय सुपरकंप्यूटिंग अवसंरचना का उपयोग करते हुए वैश्विक स्तर की प्रतिस्पर्धा में अपनी वैज्ञानिक क्षमता का प्रदर्शन किया और अंतरराष्ट्रीय मंच पर विश्वविद्यालय का गौरव बढ़ाया। विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. राज कुमार मित्तल ने इस उपलब्धि पर डॉ. युसुफ अख्तर और प्रज्ञा आनंद को बधाई देते हुए इसे विश्वविद्यालय के लिए गर्व का विषय बताया।
शोधकर्ताओं के अनुसार
डॉ. युसुफ अख्तर ने बताया कि राष्ट्रीय सुपरकंप्यूटिंग मिशन के अंतर्गत स्थापित ‘परम स्मृति’ सुपरकंप्यूटर की सहायता से तैयार किए गए इस मॉडल में लगभग चार लाख परमाणुओं का समावेश किया गया है। इसमें एटीपी सिंथेज़ प्रोटीन संकुल, उसे घेरे हुए लिपिड द्विपरत, अपने लक्ष्य स्थल पर स्थित टीबीरोधी दवा बेडाक्विलीन तथा हजारों जल अणुओं को शामिल किया गया।
अध्ययन के दौरान यह महत्वपूर्ण तथ्य सामने आया कि बेडाक्विलीन केवल एक स्थिर बिंदु पर नहीं रहती, बल्कि अपने लक्ष्य स्थल से मजबूती से जुड़ी रहने के साथ-साथ लगातार सूक्ष्म स्तर पर अपनी स्थिति भी बदलती रहती है। यह गतिशील व्यवहार केवल प्रोटीन की संरचना से निर्धारित नहीं होता, बल्कि आसपास मौजूद झिल्ली लिपिड और जल अणु भी इसमें सक्रिय भूमिका निभाते हैं। शोधकर्ताओं के अनुसार यही प्रक्रिया यह समझाने में मदद करती है कि दवा केवल एक बिंदु को अवरुद्ध नहीं करती, बल्कि एटीपी सिंथेज़ की संपूर्ण कार्यप्रणाली को प्रभावित करके जीवाणु की ऊर्जा उत्पादन क्षमता को बाधित करती है।
प्रोटॉन मार्गों की पहचान और व्याख्या
अध्ययन में उन प्रोटॉन मार्गों की भी पहचान और व्याख्या की गई है जो एटीपी सिंथेज़ नामक आणविक मोटर की घूर्णन गति को संचालित करते हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि इन मार्गों की संरचना और व्यवहार को समझना भविष्य की ऐसी दवाओं के विकास में सहायक होगा जो जीवाणु की ऊर्जा उत्पादन प्रणाली को अधिक प्रभावी ढंग से निशाना बना सकें तथा दवा-प्रतिरोध की संभावना को कम करें। शोध ने यह भी स्पष्ट किया कि जीवाणु झिल्ली केवल एक निष्क्रिय पृष्ठभूमि नहीं है, बल्कि वह दवा और लक्ष्य प्रोटीन के बीच होने वाली परस्पर क्रियाओं में प्रत्यक्ष रूप से भाग लेती है। शोध दल अब झिल्ली की इस सक्रिय भूमिका का और गहराई से अध्ययन करने की योजना बना रहा है, जिससे टीबी जीवाणु की आणविक संरचना और दवा-प्रभाव की अधिक स्पष्ट तस्वीर सामने आ सकेगी।
भविष्य की दवाओं के सामने सबसे बड़ी चुनौती
शोधकर्ताओं के अनुसार इस अध्ययन का महत्व केवल बेडाक्विलीन दवा तक सीमित नहीं है। विश्व स्वास्थ्य संगठन वर्तमान में दवा-प्रतिरोधी टीबी के लिए दो से छह महीने तक चलने वाले संयोजन उपचार की सिफारिश करता है, जिसमें बेडाक्विलीन सहित कई नई दवाएं शामिल हैं। भविष्य की दवाओं के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वे प्रतिरोधी जीवाणुओं के खिलाफ प्रभावी रहें, रोगियों के लिए सुरक्षित हों तथा जीवाणुओं को प्रतिरोध विकसित करने के कम अवसर दें। ऐसे में वास्तविक जैविक वातावरण में दवा और लक्ष्य प्रोटीन की परमाणु-स्तरीय परस्पर क्रियाओं का अध्ययन नई पीढ़ी की अधिक प्रभावी और सुरक्षित टीबीरोधी दवाओं के विकास के लिए महत्वपूर्ण आधार प्रदान करता है।
नई दवाओं के विरुद्ध प्रतिरोध विकसित करने में सक्षम
टीबी आज भी दुनिया की सबसे घातक संक्रामक बीमारियों में से एक बनी हुई है। वर्ष 2024 में विश्वभर में लगभग 1.07 करोड़ लोग टीबी से प्रभावित हुए और करीब 12.3 लाख लोगों की मृत्यु हुई। इनमें एक चौथाई से अधिक मामले अकेले भारत से संबंधित थे। गरीबी, कुपोषण, भीड़भाड़, उपचार में देरी और अधूरा इलाज इस बीमारी के प्रसार को बढ़ावा देते हैं। वहीं दवा-प्रतिरोधी टीबी के बढ़ते मामले इस चुनौती को और गंभीर बना रहे हैं।
माइकोबैक्टीरियम ट्यूबरकुलोसिस की विशेषता यह है कि वह अपनी चयापचय क्रियाओं को अत्यंत धीमा कर लगभग निष्क्रिय अवस्था में पहुंच सकता है, जिससे पारंपरिक एंटीबायोटिक्स का प्रभाव कम हो जाता है। साथ ही यह लगातार उत्परिवर्तन करके नई दवाओं के विरुद्ध भी प्रतिरोध विकसित करने में सक्षम है।
बीबीएयू के शोधकर्ताओं का अध्ययन
वर्ष 2012 में बेडाक्विलीन को टीबी उपचार के लिए मंजूरी मिली थी और इसे लगभग पांच दशकों में विकसित पहली नई टीबी दवा माना गया। यह दवा पारंपरिक एंटीबायोटिक्स की तरह जीवाणु की कोशिका भित्ति या प्रोटीन निर्माण को निशाना बनाने के बजाय उसकी ऊर्जा उत्पादन प्रणाली पर हमला करती है। एटीपी सिंथेज़ नामक आणविक मोटर, जो कोशिका झिल्ली में स्थित होती है और प्रोटॉन प्रवाह के कारण टरबाइन की तरह घूमती है, जीवाणु के लिए आवश्यक ऊर्जा एटीपी का निर्माण करती है।
बेडाक्विलीन इसी मोटर को बाधित कर जीवाणु को ऊर्जा से वंचित कर देती है। हालांकि समय के साथ इसके प्रति प्रतिरोध के मामले सामने आने लगे, जिससे वैज्ञानिकों के लिए यह समझना आवश्यक हो गया कि यह दवा आणविक स्तर पर एटीपी सिंथेज़ के साथ किस प्रकार क्रिया करती है और किन परिस्थितियों में उसका प्रभाव कम हो जाता है। बीबीएयू के शोधकर्ताओं का यह अध्ययन इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है, जो टीबी उपचार के लिए अधिक प्रभावी दवाओं के विकास का मार्ग प्रशस्त कर सकता है।