हैदरगढ़ में भाजपा की अंदरूनी जंग तेज, विकास बनाम सादगी की चर्चा ने पकड़ा जोर

रिपोर्ट : संतोष शुक्ला


बाराबंकी। उत्तर प्रदेश की चर्चित और राजनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण हैदरगढ़ विधानसभा सीट पर आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर सियासी सरगर्मियां तेज हो गई हैं। भारतीय जनता पार्टी के मौजूदा विधायक दिनेश रावत जहां अपने विकास कार्यों के दम पर दोबारा टिकट मिलने का दावा कर रहे हैं, वहीं भाजपा के जिला महामंत्री और अनुसूचित जाति-जनजाति आयोग के अध्यक्ष बैजनाथ रावत के पुत्र बृजेश रावत भी समर्थकों के बीच मजबूत दावेदार के रूप में उभर रहे हैं। क्षेत्र में इन दिनों “विकास बनाम सादगी” की चर्चा जोरों पर है।
हैदरगढ़ विधानसभा को हमेशा से वीआईपी सीट माना जाता रहा है। देश के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह इस क्षेत्र से दो बार विधायक रह चुके हैं, जबकि समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता अरविंद सिंह गोप ने भी इस सीट पर लंबे समय तक अपना प्रभाव बनाए रखा। वर्ष 2012 में परिसीमन के बाद सीट अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित हुई, जिसके बाद समाजवादी पार्टी के राममगन रावत ने जीत दर्ज की थी।
हालांकि 2014 के लोकसभा चुनाव और उसके बाद प्रदेश में भाजपा के बढ़ते प्रभाव का असर हैदरगढ़ पर भी पड़ा। वर्ष 2017 में भाजपा प्रत्याशी बैजनाथ रावत ने शानदार जीत हासिल कर सीट भाजपा की झोली में डाल दी। उनके कार्यकाल में विकास कार्यों के साथ-साथ संगठनात्मक मजबूती भी देखने को मिली। बाद में 2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने बैजनाथ रावत का टिकट काटकर दिनेश रावत को उम्मीदवार बनाया। इसके बावजूद बैजनाथ रावत ने पार्टी के प्रति निष्ठा दिखाते हुए दिनेश रावत का खुलकर समर्थन किया, जिसका लाभ भाजपा को मिला और दिनेश रावत पहली बार विधायक बने।
विधायक बनने के बाद दिनेश रावत ने क्षेत्र में कई विकास कार्य कराए। गोमती नदी पर कई पंटून पुलों की स्वीकृति और टीकाराम घाट पर स्थायी पुल का निर्माण उनकी प्रमुख उपलब्धियों में गिना जाता है। उनके समर्थक दावा कर रहे हैं कि हैदरगढ़ में जितना विकास उनके कार्यकाल में हुआ, उतना पहले कभी नहीं हुआ।
हालांकि राजनीतिक समीकरणों का दूसरा पहलू भी सामने आ रहा है। वर्ष 2023 के नगर निकाय चुनावों में हैदरगढ़ और सुबेहा नगर पंचायतों में भाजपा को हार का सामना करना पड़ा। इसके बाद 2024 के लोकसभा चुनाव में भी हैदरगढ़ विधानसभा क्षेत्र में भाजपा प्रत्याशी अपेक्षित बढ़त हासिल नहीं कर सके। विपक्ष और पार्टी के कुछ कार्यकर्ता इसे स्थानीय नेतृत्व की कमजोरी से जोड़कर देख रहे हैं।
इसी बीच भाजपा जिला महामंत्री बृजेश रावत के समर्थकों ने भी क्षेत्र में सक्रियता बढ़ा दी है। समर्थकों का कहना है कि बृजेश रावत का सरल स्वभाव, कार्यकर्ताओं से सीधा संवाद और संगठन में सक्रिय भूमिका उन्हें एक मजबूत विकल्प बनाती है। उनका दावा है कि भाजपा का “सबका साथ, सबका विकास और सबका विश्वास” का नारा बृजेश रावत की कार्यशैली में अधिक दिखाई देता है।
वहीं बृजेश रावत स्वयं टिकट की दावेदारी को लेकर संयमित नजर आते हैं। उनका कहना है कि वह पार्टी के एक साधारण कार्यकर्ता हैं और जिला महामंत्री के रूप में संगठन की जिम्मेदारी निभा रहे हैं। उन्होंने कहा कि यदि पार्टी नेतृत्व उन पर विश्वास जताता है तो वह पूरी निष्ठा के साथ जिम्मेदारी निभाने का प्रयास करेंगे।
फिलहाल हैदरगढ़ में भाजपा के भीतर टिकट को लेकर चर्चाएं तेज हैं। अंतिम फैसला पार्टी नेतृत्व को करना है, लेकिन क्षेत्र में यह बहस जरूर छिड़ चुकी है कि आगामी चुनाव में भाजपा “विकास” पर भरोसा करेगी या “सादगी” को मौका देगी।