भूख हड़ताल (Hunger Strike) लोकतांत्रिक विरोध का एक स्वीकृत माध्यम, भारतीय संविधान के तहत राज्य का दायित्व उसके जीवन की रक्षा करना

डिजिटल डेस्क, अमर भारती: भारत में भूख हड़ताल (Hunger Strike) लोकतांत्रिक विरोध का एक स्वीकृत माध्यम माना जाता है। हालांकि यदि किसी अनशनकारी की स्वास्थ्य स्थिति गंभीर हो जाए और उसके जीवन को खतरा उत्पन्न हो जाए, तो भारतीय संविधान के तहत राज्य का दायित्व उसके जीवन की रक्षा करना बन जाता है।
ऐसे मामलों में अदालतें और प्रशासन लोकतांत्रिक अधिकारों तथा जीवन के अधिकार के बीच संतुलन स्थापित करने का प्रयास करते हैं।
अनुच्छेद 21: जीवन का अधिकार सर्वोपरि
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 प्रत्येक नागरिक को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार प्रदान करता है।
यदि किसी भख हड़ताल या अनशनकारी की मेडिकल रिपोर्ट यह बताती है कि उसकी जान को गंभीर खतरा है, तो सरकार और प्रशासन पर उसके जीवन की रक्षा करने की संवैधानिक जिम्मेदारी होती है।

क्या सरकार भख हड़ताल या अनशनकारी को जबरन अस्पताल भेज सकती है?
यदि चिकित्सकों की रिपोर्ट में यह स्पष्ट हो कि व्यक्ति की स्थिति अत्यंत गंभीर है और तत्काल चिकित्सा सहायता आवश्यक है, तो प्रशासन—
- मजिस्ट्रेट के आदेश,
- या न्यायालय के निर्देश,
के आधार पर अनशनकारी को अस्पताल में भर्ती करा सकता है।
इसका उद्देश्य आंदोलन समाप्त कराना नहीं, बल्कि व्यक्ति के जीवन की रक्षा करना होता है।
क्या जबरन भोजन कराया जा सकता है?
भारत में भख हड़ताल या अनशन पर जबरन भोजन (Force Feeding) को लेकर कोई एक समान या विशेष कानून नहीं है।
ऐसे मामलों में अदालतें प्रत्येक मामले की परिस्थितियों और मेडिकल रिपोर्ट के आधार पर निर्णय लेती हैं।
यदि मेडिकल बोर्ड यह मानता है कि बिना चिकित्सकीय हस्तक्षेप के व्यक्ति की मृत्यु की आशंका है, तो न्यायालय या सक्षम प्राधिकारी चिकित्सा निगरानी में आवश्यक उपचार की अनुमति दे सकता है।
हालांकि ऐसे मामलों में व्यक्तिगत स्वतंत्रता, मानवाधिकार और जीवन के अधिकार—तीनों पहलुओं पर विचार किया जाता है।
सुप्रीम कोर्ट का क्या दृष्टिकोण है?
सुप्रीम कोर्ट समय-समय पर यह स्पष्ट कर चुका है कि राज्य की पहली जिम्मेदारी नागरिक के जीवन की रक्षा करना है।
यदि भूख हड़ताल या अनशन की वजह से किसी व्यक्ति का जीवन गंभीर खतरे में हो, तो सरकार आवश्यक चिकित्सा सहायता उपलब्ध कराने से पीछे नहीं हट सकती।

क्या आंदोलन का अधिकार भी सुरक्षित है?
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तथा अनुच्छेद 19(1)(b) शांतिपूर्ण ढंग से एकत्र होकर विरोध प्रदर्शन करने का अधिकार देता है।
हालांकि ये अधिकार पूर्ण नहीं हैं।
यदि—
- सार्वजनिक व्यवस्था प्रभावित हो,
- कानून-व्यवस्था पर संकट उत्पन्न हो,
- या किसी व्यक्ति के जीवन को गंभीर खतरा हो,
तो प्रशासन कानून के अनुसार आवश्यक हस्तक्षेप कर सकता है।
अदालत कैसे करती है संतुलन?
ऐसे मामलों में न्यायालय मुख्य रूप से दो संवैधानिक अधिकारों के बीच संतुलन स्थापित करता है—
- लोकतांत्रिक विरोध और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता।
- अनुच्छेद 21 के तहत जीवन की रक्षा का संवैधानिक दायित्व।
इन्हीं तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर अदालत तय करती है कि भूख हड़ताल या अनशन कर रहे व्यक्ति के लिए चिकित्सा हस्तक्षेप आवश्यक है या नहीं।
मुख्य बातें (Key Highlights)
- भारत में भूख हड़ताल स्वयं में अवैध नहीं है।
- जीवन को खतरा होने पर सरकार हस्तक्षेप कर सकती है।
- मेडिकल रिपोर्ट के आधार पर अस्पताल में भर्ती कराया जा सकता है।
- जबरन भोजन को लेकर कोई एक समान कानून नहीं है।
- अदालतें हर मामले में परिस्थितियों के अनुसार फैसला देती हैं।
- संविधान का अनुच्छेद 21 जीवन की रक्षा को सर्वोच्च महत्व देता है।

जीवन रक्षा सर्वोच्च संवैधानिक प्राथमिकता
भारत में भूख हड़ताल लोकतांत्रिक विरोध का एक महत्वपूर्ण माध्यम है, लेकिन जब किसी अनशनकारी का जीवन गंभीर खतरे में पड़ जाता है, तब अनुच्छेद 21 के तहत जीवन की रक्षा सर्वोच्च संवैधानिक प्राथमिकता बन जाती है।
ऐसी परिस्थितियों में अदालतें और प्रशासन चिकित्सा सहायता, अस्पताल में भर्ती कराने या अन्य आवश्यक कदम उठाने के निर्देश दे सकते हैं। हालांकि प्रत्येक मामले का निर्णय उसके तथ्यों, मेडिकल स्थिति और न्यायिक विवेक के आधार पर किया जाता है। (Expose India)
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