ISRO Scientist Resignation: इसरो के वैज्ञानिकों के लगातार इस्तीफों के बीच सरकार ने नए नियम लागू किए हैं।

नई दिल्ली/अमर भारती। भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने वाली भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) इन दिनों एक नई चुनौती का सामना कर रही है। बीते एक वर्ष में कई वरिष्ठ वैज्ञानिकों और तकनीकी विशेषज्ञों के इस्तीफा देकर निजी अंतरिक्ष कंपनियों का रुख करने की खबरों के बीच केंद्र सरकार ने बड़ा प्रशासनिक फैसला लिया है। अब ISRO के वैज्ञानिकों के इस्तीफे और स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति (VRS) के मामलों को पहले की तरह आसानी से मंजूरी नहीं मिलेगी। हर मामला अंतिम निर्णय के लिए सीधे अंतरिक्ष विभाग (DoS) के मुख्यालय भेजा जाएगा।
सरकार ने क्यों बदले इस्तीफे के नियम?
अंतरिक्ष विभाग (Department of Space) ने 14 जुलाई को जारी एक आंतरिक आदेश में स्पष्ट किया है कि हाई-प्रोफाइल मिशनों से जुड़े ग्रुप-A वैज्ञानिक और तकनीकी अधिकारियों के इस्तीफे या VRS को अब सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया के तहत मंजूरी नहीं दी जाएगी। सरकार का मानना है कि हाल के महीनों में अनुभवी वैज्ञानिकों के लगातार इस्तीफों से राष्ट्रीय महत्व की परियोजनाओं पर सीधा असर पड़ रहा है। यही वजह है कि अब किसी भी वैज्ञानिक के इस्तीफे पर अंतिम फैसला मुख्यालय स्तर पर लिया जाएगा।
डायरेक्टर्स को दिए गए सख्त निर्देश
नए आदेश के तहत सभी ISRO केंद्रों के निदेशकों को निर्देश दिया गया है कि किसी भी वैज्ञानिक या तकनीकी अधिकारी के इस्तीफे अथवा VRS आवेदन को अपने स्तर पर मंजूर न करें। ऐसे सभी मामलों को अपनी विस्तृत टिप्पणी और सिफारिश के साथ मुख्यालय भेजा जाएगा। साथ ही यह भी कहा गया है कि जिन वैज्ञानिकों की भूमिका किसी महत्वपूर्ण स्पेस मिशन में है, उनके मिशन पूरा होने तक इस्तीफा स्वीकार करने से बचा जाए।
गगनयान और चंद्रयान-3 से जुड़े अधिकारी भी छोड़ चुके हैं नौकरी
हाल के महीनों में इस्तीफा देने वालों में कई बड़े मिशनों से जुड़े वरिष्ठ अधिकारी भी शामिल बताए जा रहे हैं। इनमें गगनयान और चंद्रयान-3 जैसी परियोजनाओं से जुड़े प्रोजेक्ट डायरेक्टर और मैनेजर शामिल हैं। रिपोर्टों के अनुसार इस्तीफा देने वालों में विक्रम साराभाई स्पेस सेंटर के LVM-3 प्रोजेक्ट डायरेक्टर विक्टर जोसेफ, यूआर राव सैटेलाइट सेंटर के SpaDeX प्रोजेक्ट डायरेक्टर और चंद्रयान-3 प्रोजेक्ट मैनेजर (सिमुलेशन) आदित्य रल्लापल्ली जैसे नाम भी शामिल हैं।
हालांकि ISRO प्रमुख वी. नारायणन ने इसे सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया बताया है। उनका कहना है कि नए नियमों का उद्देश्य केवल यह सुनिश्चित करना है कि महत्वपूर्ण परियोजनाओं पर अचानक कोई प्रतिकूल प्रभाव न पड़े
कितने वैज्ञानिक छोड़ चुके हैं ISRO?
अंतरिक्ष विभाग ने इस्तीफा देने वाले वैज्ञानिकों की आधिकारिक संख्या सार्वजनिक नहीं की है। हालांकि विभिन्न मीडिया रिपोर्टों और सूत्रों के अनुसार पिछले एक वर्ष में करीब 100 से 120 वैज्ञानिकों और तकनीकी विशेषज्ञों ने ISRO छोड़ा है।
बताया जा रहा है कि:
- यूआर राव सैटेलाइट सेंटर (URSC) से लगभग 80 कर्मचारी नौकरी छोड़ चुके हैं।
- विक्रम साराभाई स्पेस सेंटर (VSSC) से कम से कम 20 वैज्ञानिकों ने इस्तीफा दिया है।
हालांकि यह संख्या ISRO के लगभग 14,600 कर्मचारियों की कुल संख्या के मुकाबले काफी कम है, लेकिन अनुभवी वैज्ञानिकों के जाने से अहम परियोजनाओं पर असर पड़ने की आशंका बढ़ गई है।
आखिर क्यों ISRO छोड़ रहे हैं वैज्ञानिक?
भारत का निजी अंतरिक्ष क्षेत्र (Private Space Sector) तेजी से विस्तार कर रहा है। कई स्टार्टअप और निजी स्पेस कंपनियां सैटेलाइट, लॉन्च व्हीकल और स्पेस टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में बड़े निवेश कर रही हैं। ऐसे में ISRO के अनुभवी वैज्ञानिकों की मांग तेजी से बढ़ी है। निजी कंपनियां बेहतर वेतन, आकर्षक सुविधाएं, तेज करियर ग्रोथ और रिसर्च में अधिक स्वतंत्रता की पेशकश कर रही हैं। यही कारण माना जा रहा है कि कई अनुभवी वैज्ञानिक सरकारी सेवा छोड़कर निजी क्षेत्र का रुख कर रहे हैं।
क्या होगा नए नियमों का असर?
सरकार का मानना है कि नए नियम लागू होने से गगनयान, चंद्रयान, आदित्य-L1 और भविष्य के अन्य रणनीतिक अंतरिक्ष मिशनों में अचानक विशेषज्ञों की कमी नहीं होगी। साथ ही महत्वपूर्ण परियोजनाओं की समयसीमा और गुणवत्ता भी प्रभावित होने से बच सकेगी। हालांकि विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि केवल इस्तीफे रोकना पर्याप्त नहीं होगा। प्रतिभाशाली वैज्ञानिकों को बनाए रखने के लिए बेहतर वेतन, आधुनिक रिसर्च सुविधाएं और स्पष्ट करियर ग्रोथ जैसे सुधारों पर भी ध्यान देना होगा।
ISRO के वैज्ञानिकों के बढ़ते इस्तीफों ने भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम के सामने नई चुनौती खड़ी कर दी है। सरकार ने इसे गंभीरता से लेते हुए इस्तीफे और VRS प्रक्रिया को सख्त बना दिया है। अब देखना होगा कि यह कदम अनुभवी वैज्ञानिकों को रोकने में कितना सफल होता है या फिर प्रतिभाओं को बनाए रखने के लिए व्यापक सुधारों की भी आवश्यकता पड़ेगी।
यहां भी पढ़ें-
बलूचिस्तान का इतिहास: आजादी के ऐलान से पाकिस्तान में विलय तक, क्या है पूरा सच?