अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सैन्य सलाह और रणनीतिक समीक्षा के बाद ईरान पर आगे के हवाई हमले रोकने का फैसला लिया।

नई दिल्ली/अमर भारती। अमेरिका और ईरान के बीच जुलाई 2026 में दोबारा भड़के सैन्य संघर्ष के बीच एक बड़ा घटनाक्रम सामने आया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 23 जुलाई को ईरान पर पहले से भी बड़े सैन्य हमले का संकेत दिया था। लेकिन महज 24 घंटे बाद उन्होंने अमेरिकी सेना को नए हवाई हमले रोकने का निर्देश दे दिया। अब अमेरिकी मीडिया की एक नई रिपोर्ट में इस फैसले के पीछे की वजहों पर रोशनी डाली गई है। रिपोर्ट के अनुसार, सैन्य अधिकारियों की सलाह, इंटरसेप्टर मिसाइलों के घटते भंडार और कूटनीतिक विकल्पों को अधिक समय देने की रणनीति ने ट्रंप के फैसले को प्रभावित किया।
पहले बड़े हमले का ऐलान, फिर अचानक बदला फैसला
23 जुलाई को पत्रकारों से बातचीत में ट्रंप ने कहा था कि वे ईरान पर पहले से भी बड़े सैन्य अभियान पर विचार कर रहे हैं और फैसला लेने के बेहद करीब हैं। इसके बाद अमेरिकी सेना ने लगातार 13वीं रात ईरान के कई ठिकानों पर हवाई हमले किए, जिन्हें अमेरिकी प्रशासन ने सैन्य लक्ष्य बताया। हालांकि अगले ही दिन ट्रंप ने आगे की बमबारी रोकने का फैसला लिया। यह निर्णय ऐसे समय आया जब अमेरिकी रक्षा विभाग ने 14वीं रात के हमले की विस्तृत योजना भी तैयार कर ली थी।
Axios रिपोर्ट में सामने आई नई जानकारी
अमेरिकी मीडिया Axios की रिपोर्ट के मुताबिक, मध्य पूर्व में अमेरिकी सेना के शीर्ष कमांडर एडमिरल ब्रैड कूपर ने व्हाइट हाउस को दी गई ब्रीफिंग में सुझाव दिया कि होर्मुज स्ट्रेट और दक्षिणी ईरान के आसपास जारी हवाई अभियान अपनी प्रभावशीलता की सीमा तक पहुंच चुका है।
रिपोर्ट में सूत्रों के हवाले से कहा गया है कि कूपर का आकलन था कि जिन प्रमुख सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया जाना था, उनमें से अधिकांश पहले ही नष्ट किए जा चुके हैं। ऐसे में बिना नई रणनीति के लगातार बमबारी जारी रखने से अपेक्षित सैन्य लाभ नहीं मिलेगा।
“ज्यादातर लक्ष्य पहले ही नष्ट हो चुके हैं”
Axios के अनुसार, एडमिरल कूपर ने बताया कि दो सप्ताह के अभियान के दौरान ईरान की होर्मुज क्षेत्र में जहाजों को निशाना बनाने की क्षमता काफी कमजोर हो चुकी है। उन्होंने यह भी कहा कि यदि आगे कोई बड़ा सैन्य अभियान चलाना है तो केवल उन लगभग 20 प्रतिशत शेष लक्ष्यों को निशाना बनाकर व्यापक ऑपरेशन शुरू करना होगा। अन्यथा सीमित हवाई हमलों को जारी रखने का कोई विशेष रणनीतिक लाभ नहीं होगा।
मिसाइलों के घटते भंडार ने भी बढ़ाई चिंता
रिपोर्ट के मुताबिक, ज्वाइंट चीफ्स ऑफ स्टाफ के अध्यक्ष जनरल डैन केन ने भी राष्ट्रपति ट्रंप और रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ को चेतावनी दी थी कि एयर डिफेंस इंटरसेप्टर मिसाइलों का भंडार तेजी से कम हो रहा है। बताया गया कि यदि संघर्ष लंबा खिंचता है तो इससे क्षेत्र में तैनात अमेरिकी सैनिकों और सहयोगी देशों की सुरक्षा पर असर पड़ सकता है। इससे पहले भी अमेरिकी मीडिया में ऐसी रिपोर्टें सामने आ चुकी थीं कि पेंटागन मिसाइलों के इस्तेमाल को लेकर सतर्क रुख अपनाने की सलाह दे रहा है।
कूटनीति को भी देना चाहते थे मौका
रिपोर्टों के अनुसार, ट्रंप प्रशासन के भीतर यह राय भी बन रही थी कि सैन्य कार्रवाई के साथ-साथ कूटनीतिक प्रयासों को भी पर्याप्त अवसर दिया जाना चाहिए। इसी कारण व्हाइट हाउस ने तत्काल बड़े सैन्य अभियान को आगे न बढ़ाने का फैसला लिया और बातचीत के रास्ते खुले रखने पर जोर दिया।
होर्मुज को लेकर जारी है बातचीत
रिपोर्टों के अनुसार, ईरान और ओमान के बीच ऐसे संभावित समझौते पर बातचीत जारी है, जिससे होर्मुज स्ट्रेट से अंतरराष्ट्रीय जहाजों की आवाजाही सुरक्षित तरीके से दोबारा शुरू हो सके। हालांकि यह स्पष्ट नहीं है कि किसी भी संभावित समझौते को अमेरिका किस रूप में स्वीकार करेगा। इस बीच संयुक्त राष्ट्र में अमेरिका के राजदूत माइक वॉल्ट्ज ने कहा कि ट्रंप प्रशासन ने सभी विकल्प खुले रखे हैं और विभिन्न स्तरों पर ईरान के साथ संपर्क जारी है।
अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन की तैयारी
रिपोर्टों के मुताबिक अमेरिका और ब्रिटेन होर्मुज स्ट्रेट की सुरक्षा और समुद्री मार्गों से बारूदी सुरंगों को हटाने के मुद्दे पर एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित करने की संभावना पर भी विचार कर रहे हैं। हालांकि सम्मेलन की तारीख अभी तय नहीं हुई है। फिलहाल क्षेत्र में सैन्य कार्रवाई थमी हुई है, लेकिन तनाव पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। कूटनीतिक प्रयासों, संभावित समझौतों और भविष्य की सैन्य रणनीति को लेकर स्थिति अभी भी अनिश्चित बनी हुई है।
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