
लखनऊ, 7 अगस्त। मंदिर केवल आस्था के केंद्र नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक चेतना, तकनीकी कौशल और कलात्मक विरासत के जीवंत दस्तावेज भी हैं। इन्हीं अनछुए पहलुओं को सामने लाने के उद्देश्य से संस्कृति विभाग, उत्तर प्रदेश के अधीन राज्य संग्रहालय, लखनऊ में आयोजित “डॉ. वासुदेव शरण अग्रवाल स्मृति व्याख्यानमाला” के अंतर्गत “वल्लभी की मंदिर वास्तुकला” विषय पर व्याख्यान आयोजित किया गया।
व्याख्यान के मुख्य वक्ता भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के पूर्व महानिदेशक डॉ. राकेश तिवारी ने पावरपॉइंट प्रस्तुति के माध्यम से भारतीय मंदिर स्थापत्य की वल्लभी शैली के ऐतिहासिक विकास, स्थापत्य विशेषताओं और सांस्कृतिक महत्व पर विस्तार से प्रकाश डाला। कार्यक्रम में कला, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और स्थापत्य से जुड़े विद्वानों, शोधार्थियों तथा विद्यार्थियों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया।
डॉ. तिवारी ने बताया कि भारतीय मंदिर वास्तुकला का विकास सदियों की सतत प्रक्रिया का परिणाम है, जिसमें विभिन्न क्षेत्रीय शैलियों का महत्वपूर्ण योगदान रहा। उन्होंने कहा कि वल्लभी शैली उत्तर भारतीय मंदिर निर्माण की एक विशिष्ट परंपरा है, जिसकी पहचान आयताकार योजना और बैरल-वॉल्ट (गजपृष्ठाकार या ढोलाकार) छत से होती है।
उन्होंने बताया कि गुप्त काल के बाद इस शैली का उल्लेखनीय विकास हुआ और इसके प्रमाण मध्य भारत, राजस्थान तथा उत्तर भारत के अनेक पुरातात्त्विक स्थलों पर आज भी देखे जा सकते हैं। सरल संरचना के बावजूद वल्लभी शैली के मंदिर अपनी प्रभावशाली वास्तुकला के कारण अलग पहचान रखते हैं। उन्होंने विभिन्न मंदिरों और पुरातात्त्विक स्थलों के चित्रों के माध्यम से यह भी समझाया कि यही शैली आगे चलकर विकसित नागर मंदिर परंपरा की आधारशिला बनी।
व्याख्यान में यह भी रेखांकित किया गया कि भारतीय मंदिर केवल पूजा-अर्चना के स्थान नहीं थे, बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक और कलात्मक गतिविधियों के भी प्रमुख केंद्र रहे हैं। मंदिर स्थापत्य के अध्ययन से तत्कालीन समाज की तकनीकी दक्षता, धार्मिक मान्यताओं और सांस्कृतिक चेतना की गहरी समझ विकसित होती है।
इस अवसर पर राज्य संग्रहालय, लखनऊ के निदेशक डॉ. विनय कुमार सिंह ने मुख्य वक्ता का स्वागत करते हुए कहा कि डॉ. वासुदेव शरण अग्रवाल ने भारतीय संस्कृति, कला और इतिहास की व्याख्या को नई दृष्टि प्रदान की। उन्होंने कहा कि उनकी स्मृति में आयोजित यह व्याख्यानमाला भारतीय विरासत के प्रति नई पीढ़ी में जागरूकता और शोध की भावना को प्रोत्साहित कर रही है।