अनुच्छेद 14 और 16 के तहत समानता के अधिकार का सवाल

डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। ओबीसी आरक्षण में क्रीमी लेयर तय करने के नियमों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को राहत देने से इनकार कर दिया है। अदालत ने केंद्र की उस अर्जी को खारिज कर दिया, जिसमें 11 मार्च को दिए गए फैसले को लागू करने से कुछ समय की छूट मांगी गई थी। केंद्र ने UPSC सिविल सेवा परीक्षा 2025 और 2026 के लिए पुराने नियमों के आधार पर प्रक्रिया जारी रखने की अनुमति मांगी थी।
OBC क्रीमी लेयर पर क्या था सुप्रीम कोर्ट का फैसला?
सुप्रीम कोर्ट ने 11 मार्च को दिए अपने फैसले में कहा था कि ओबीसी आरक्षण के तहत क्रीमी लेयर तय करने के लिए केवल माता-पिता की आमदनी को आधार नहीं बनाया जा सकता। इसके साथ उनके पद और सामाजिक स्थिति को भी ध्यान में रखना जरूरी है।
अदालत ने केंद्र सरकार के 2004 के उस आदेश को गलत माना था, जिसमें सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (PSU), बैंकों और निजी क्षेत्र में काम करने वाले कर्मचारियों के बच्चों के लिए वेतन से होने वाली आय के आधार पर क्रीमी लेयर या नॉन-क्रीमी लेयर तय करने का प्रावधान था।
इस व्यवस्था में सरकारी कर्मचारियों के बच्चों को अलग रखा गया था। उनके मामले में माता-पिता के पद के आधार पर क्रीमी लेयर की श्रेणी तय की जाती थी। सुप्रीम कोर्ट ने इस अंतर को संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 में दिए गए समानता के अधिकार के खिलाफ माना था।
केंद्र सरकार ने क्यों मांगी थी फैसले को लागू करने में छूट?
केंद्र सरकार ने अगस्त में सुप्रीम कोर्ट में अर्जी दाखिल कर 11 मार्च के फैसले पर स्पष्टीकरण मांगा था। सरकार का कहना था कि फैसले को अचानक लागू करने से प्रशासनिक स्तर पर कई तरह की जटिलताएं पैदा हो सकती हैं।

केंद्र ने विशेष रूप से UPSC सिविल सेवा परीक्षा 2025 और 2026 के लिए छूट देने की मांग की थी। सरकार की दलील थी कि फैसले को तत्काल लागू करने से सिविल सेवा परीक्षा 2025 के कैडर और सेवाओं के आवंटन के साथ प्रशिक्षण तथा दूसरी प्रशासनिक प्रक्रियाएं प्रभावित हो सकती हैं।
सरकार ने यह भी कहा था कि नए नियमों को लागू करने से पहले राज्यों और विभिन्न सरकारी संस्थानों के साथ बातचीत जरूरी होगी। इस पूरी प्रक्रिया में करीब दो साल तक का समय लग सकता है।
3.70 लाख OBC नियुक्तियों का दिया गया हवाला
केंद्र सरकार ने अपनी अर्जी में 2016 के बाद हुई ओबीसी नियुक्तियों का भी जिक्र किया था। सरकार के मुताबिक, केंद्र सरकार, रेलवे, बैंक, अर्धसैनिक बलों और विश्वविद्यालयों में करीब 3 लाख 70 हजार ओबीसी नियुक्तियां हुई हैं।
केंद्र की आशंका थी कि अगर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पिछली तारीख से लागू किया गया तो इन नियुक्तियों को लेकर बड़ी संख्या में नए विवाद और मुकदमे सामने आ सकते हैं।
सरकार ने यह भी दलील दी थी कि निजी क्षेत्र में काम करने वाले कर्मचारियों के पदों की तुलना सरकारी पदों से करने के लिए अलग प्रक्रिया अपनानी होगी। इसमें भी काफी समय लग सकता है।
सरकारी और गैर-सरकारी कर्मचारियों के बच्चों के लिए अलग नियम पर सवाल
इस मामले में विवाद की एक प्रमुख वजह केंद्र सरकार का 2004 का आदेश था। इसके तहत PSU, बैंक और निजी क्षेत्र के कर्मचारियों के बच्चों की क्रीमी लेयर की स्थिति तय करने में वेतन से होने वाली आय को आधार बनाया गया था, जबकि सरकारी कर्मचारियों के बच्चों के मामले में माता-पिता के पद को महत्व दिया जाता था।

सुप्रीम कोर्ट ने इस अंतर को समानता के संवैधानिक सिद्धांतों के खिलाफ माना था। अदालत के अनुसार, क्रीमी लेयर निर्धारित करने के लिए केवल आय को आधार बनाना पर्याप्त नहीं है। माता-पिता का पद और सामाजिक स्थिति भी देखी जानी चाहिए।
आगे क्या होगा?
केंद्र सरकार ने 11 मार्च के फैसले को लागू करने में प्रशासनिक कठिनाइयों का हवाला देकर UPSC सिविल सेवा परीक्षा 2025 और 2026 के लिए राहत मांगी थी, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने उसकी अर्जी खारिज कर दी। इस फैसले के बाद OBC क्रीमी लेयर निर्धारित करने में माता-पिता की आय के साथ उनके पद और सामाजिक स्थिति को ध्यान में रखने का मुद्दा महत्वपूर्ण बना हुआ है। (Expose India)
यह भी पढ़े
कौन हैं नित्या रमन? लॉस एंजेलिस में जीत के बाद न्यूयॉर्क के मेयर जोहरान ममदानी हो रही तुलना
जंतर-मंतर प्रदर्शन: सुप्रीम कोर्ट सख्त, उच्चस्तरीय समिति को 1 महीने में रिपोर्ट देने का निर्देश