BRICS Summit 2026: बदलती वैश्विक व्यवस्था के बीच भारत में जुटेंगे 11 देश, हर सदस्य का अपना एजेंडा

युद्ध, प्रतिबंध, व्यापारिक तनाव और पश्चिम एशिया संकट के बीच 12-13 सितंबर को भारत में होने वाले BRICS Summit पर दुनिया की नजर, विकास से लेकर वैश्विक शासन तक कई मुद्दों पर चर्चा।

BRICS Summit 2026 India Bharat Mandapam
भारत में होने वाले BRICS Summit में सदस्य देशों के बीच कई वैश्विक मुद्दों पर चर्चा

नई दिल्ली/अमर भारती। युद्ध, आर्थिक प्रतिबंधों, व्यापारिक बाधाओं और पश्चिम एशिया संकट के बीच वैश्विक व्यवस्था तेजी से बदल रही है। ऐसे समय में 12-13 सितंबर को भारत में होने वाले BRICS Summit पर दुनिया की नजर है। भारत मंडपम में होने वाले 18वें शिखर सम्मेलन में 11 सदस्य देशों के जुटने की बात कही गई है।

BRICS अब केवल आर्थिक सहयोग का मंच नहीं रह गया है। इसके विस्तार के साथ इसकी कूटनीतिक और रणनीतिक अहमियत भी बढ़ी है। हालांकि सदस्य देशों के राष्ट्रीय हित अलग-अलग हैं और इसी वजह से मंच पर हर देश का अपना एजेंडा दिखाई देता है।

भारत का फोकस विकास और व्यावहारिक सहयोग पर

मेजबान भारत BRICS को पश्चिम विरोधी गठबंधन के रूप में पेश करने के बजाय विकास और व्यावहारिक सहयोग का मंच बनाए रखना चाहता है। भारत की विदेश नीति एक साथ कई बहुपक्षीय मंचों पर सक्रिय रहने की रही है।

भारत एक तरफ क्वाड का हिस्सा है, तो दूसरी तरफ BRICS और SCO में भी सक्रिय है। ऐसे में नई दिल्ली बहुध्रुवीय वैश्विक व्यवस्था को आगे बढ़ाने पर जोर दे सकती है। भारत के एजेंडे में MSME, स्टार्टअप, डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर, UPI जैसे डिजिटल भुगतान तंत्र, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और स्वच्छ ऊर्जा जैसे मुद्दे प्रमुख रह सकते हैं।

पश्चिम एशिया के मुद्दे पर भी भारत संतुलित रुख बनाए रखने की कोशिश करेगा। ईरान और यूएई जैसे देशों के बीच मतभेदों के बीच संयुक्त बयान पर सहमति बनाना मेजबान देश के लिए महत्वपूर्ण चुनौती होगी।

चीन की नजर वैश्विक व्यवस्था पर

चीन BRICS को अमेरिका केंद्रित वैश्विक व्यवस्था के विकल्प के रूप में मजबूत करने की कोशिश कर सकता है। बीजिंग व्यापार, निवेश, डिजिटल अर्थव्यवस्था और न्यू डेवलपमेंट बैंक के विस्तार पर जोर दे रहा है।

स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ाना और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में विकासशील देशों की भूमिका मजबूत करना भी चीन के एजेंडे का हिस्सा हो सकता है। चीन BRICS को ग्लोबल साउथ के प्रभावशाली मंच के तौर पर स्थापित कर अपनी आर्थिक और कूटनीतिक पहुंच बढ़ाना चाहता है।

रूस के लिए प्रतिबंधों के बीच ताकत दिखाने का मंच

रूस BRICS Summit के जरिए यह संदेश देना चाहता है कि पश्चिमी प्रतिबंधों के बावजूद वह वैश्विक स्तर पर अलग-थलग नहीं पड़ा है। मॉस्को खाद्य सुरक्षा, अनाज व्यापार, ऊर्जा सहयोग, परिवहन गलियारों और वैकल्पिक वित्तीय व्यवस्थाओं जैसे मुद्दों को आगे बढ़ा सकता है।

रूस स्थानीय मुद्राओं में लेन-देन को बढ़ावा देने की दिशा में भी बात कर सकता है। हालांकि भारत BRICS को सीधे डॉलर विरोधी अभियान में बदलने के पक्ष में नहीं है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के बीच द्विपक्षीय बातचीत में व्यापार, ऊर्जा और रक्षा सहयोग जैसे मुद्दे भी उठ सकते हैं।

ईरान के लिए कूटनीतिक ताकत दिखाने का मौका

ईरान के लिए BRICS Summit पश्चिम एशिया में तनाव और अंतरराष्ट्रीय दबाव के बीच अपनी कूटनीतिक स्थिति दिखाने का मंच है।राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान व्यापार, ऊर्जा निर्यात, चाबहार बंदरगाह और स्थानीय मुद्राओं में भुगतान बढ़ाने जैसे मुद्दों को उठा सकते हैं। ईरान यह संदेश भी देना चाहेगा कि क्षेत्रीय तनाव के बावजूद वह बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के साथ संवाद और सहयोग के लिए सक्रिय है।

ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका का अलग एजेंडा

ब्राजील ग्लोबल साउथ, जलवायु वित्त, अमेजन संरक्षण, कृषि निर्यात और विकासशील देशों के लिए वित्तीय सहयोग पर जोर दे सकता है। न्यू डेवलपमेंट बैंक के जरिए हरित परियोजनाओं के लिए अधिक संसाधन जुटाना भी उसकी प्राथमिकताओं में शामिल हो सकता है।

दक्षिण अफ्रीका अफ्रीकी देशों की आवाज को BRICS के मंच पर मजबूती से उठाने की कोशिश करेगा। महत्वपूर्ण खनिज, ऊर्जा संक्रमण, औद्योगिक विकास और वैश्विक संस्थाओं में अफ्रीका के प्रतिनिधित्व जैसे मुद्दे उसके एजेंडे में रह सकते हैं।

मिस्र और इथियोपिया की प्राथमिकताएं

मिस्र व्यापार मार्गों, ऊर्जा सहयोग और खाद्य सुरक्षा पर ध्यान देगा। स्वेज नहर को वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं और BRICS सहयोग से जोड़ना उसके लिए महत्वपूर्ण हो सकता है। इथियोपिया अफ्रीकी विकास, बुनियादी ढांचे, कृषि और निवेश पर जोर देगा। वह BRICS को अफ्रीकी औद्योगीकरण और ऊर्जा परियोजनाओं के लिए सहयोगी मंच के रूप में देखता है।

इंडोनेशिया की बढ़ती भूमिका

इंडोनेशिया के लिए BRICS में पूर्ण सदस्य के रूप में भूमिका बढ़ाने का अवसर है। राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांतो व्यापार, समुद्री संपर्क, खाद्य सुरक्षा और डिजिटल अर्थव्यवस्था जैसे मुद्दों पर जोर दे सकते हैं। जकार्ता BRICS को आसियान और ग्लोबल साउथ के बीच एक संभावित सेतु के रूप में भी देखता है। साथ ही इंडोनेशिया इस मंच के जरिए अपनी बढ़ती वैश्विक भूमिका को प्रदर्शित करना चाहता है।

यूएई की नजर पश्चिम एशिया संकट पर

यूएई के लिए पश्चिम एशिया संकट महत्वपूर्ण मुद्दा रहेगा। अबू धाबी यह सुनिश्चित करना चाहेगा कि BRICS के मंच पर ईरान का पक्ष एकतरफा तरीके से हावी न हो। इसके साथ ही यूएई ऊर्जा बाजार और वैश्विक व्यापार से जुड़े मुद्दों पर भी अपनी स्थिति स्पष्ट कर सकता है।

BRICS में एक मंच, लेकिन अलग-अलग हित

BRICS की सबसे बड़ी ताकत उसकी विविधता है और यही उसकी सबसे बड़ी चुनौती भी है। भारत विकास और व्यावहारिक सहयोग पर जोर देता है, चीन वैश्विक व्यवस्था में अपनी भूमिका बढ़ाना चाहता है, रूस प्रतिबंधों के बीच अपनी वैश्विक मौजूदगी दिखाना चाहता है और ईरान पश्चिम एशिया संकट के बीच कूटनीतिक समर्थन तलाश रहा है।

वहीं ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका ग्लोबल साउथ तथा विकासशील देशों के मुद्दों को आगे बढ़ाना चाहते हैं। ऐसे में भारत के सामने चुनौती सिर्फ सम्मेलन की मेजबानी करने की नहीं, बल्कि अलग-अलग राष्ट्रीय हितों के बीच सहमति बनाने की भी है। अगर नई दिल्ली इन मतभेदों के बावजूद ठोस सहयोग और साझा घोषणाओं की दिशा में आगे बढ़ती है, तो यह BRICS की बदलती वैश्विक भूमिका के लिहाज से महत्वपूर्ण संकेत होगा।

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