FCRA Amendment Bill 2026: अमेरिका के आरोपों पर भारत का पलटवार, क्वात्रा ने बताया Myth vs Fact

FCRA Amendment Bill 2026 पर अमेरिकी सांसदों की आपत्तियों के बीच भारत ने जवाब दिया है। जानें FCRA बिल में क्या बदलेगा, NGOs और धार्मिक संस्थाओं पर क्या असर होगा।

FCRA Amendment Bill 2026 को लेकर भारत और अमेरिका के बीच विवाद
FCRA Amendment Bill 2026 पर अमेरिकी सांसदों की आपत्तियों के बीच भारत ने विधेयक का बचाव किया।

नई दिल्ली/अमर भारती। Foreign Contribution (Regulation) Amendment Bill, 2026 यानी FCRA Amendment Bill 2026 को लेकर भारत और अमेरिका के बीच बयानबाजी तेज हो गई है। अमेरिकी सांसदों की ओर से विधेयक के प्रावधानों पर सवाल उठाए जाने के बाद भारत ने स्पष्ट किया है कि विदेशी फंडिंग को नियंत्रित करने वाला कानून देश का आंतरिक विधायी मामला है। सरकार का कहना है कि प्रस्तावित बदलावों का उद्देश्य विदेशी योगदान के इस्तेमाल में पारदर्शिता, जवाबदेही और बेहतर प्रशासन सुनिश्चित करना है।

अमेरिका में भारत के राजदूत विनय मोहन क्वात्रा ने सोशल मीडिया पर एक विस्तृत ‘मिथक बनाम सच्चाई’ स्पष्टीकरण जारी कर विधेयक को लेकर उठाई जा रही आपत्तियों का जवाब दिया है। वहीं, विदेश मंत्रालय भी अमेरिकी सांसदों की टिप्पणियों को खारिज करते हुए कह चुका है कि भारत से जुड़े विधायी मामलों पर निर्णय देश की संसद करती है।

FCRA Bill पर क्यों मचा है विवाद?

FCRA Amendment Bill, 2026 को 25 मार्च 2026 को लोकसभा में पेश किया गया था। विधेयक का एक अहम प्रावधान ऐसी संस्थाओं की विदेशी फंडिंग और उससे बनाई गई संपत्तियों के प्रबंधन से जुड़ा है, जिनका FCRA पंजीकरण रद्द हो जाता है, संस्था स्वयं पंजीकरण सरेंडर कर देती है या उसका पंजीकरण समाप्त हो जाता है। इसके लिए सरकार की ओर से एक Designated Authority का प्रावधान प्रस्तावित किया गया है। यही प्रावधान विपक्ष, नागरिक समाज और कुछ धार्मिक संगठनों की चिंता का प्रमुख कारण बना है। आलोचकों को आशंका है कि इससे सरकार को विदेशी फंड से बनी संपत्तियों पर ज्यादा अधिकार मिल सकता है।

क्वात्रा ने कहा- विदेशी चंदा लेने पर रोक नहीं

विनय मोहन क्वात्रा ने इन आशंकाओं को खारिज करते हुए कहा कि FCRA का उद्देश्य भारतीय संगठनों को विदेशी चंदा लेने से रोकना नहीं है। उनके अनुसार, कानून का मूल उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि विदेशी योगदान निर्धारित प्रक्रिया के तहत मिले और उसका इस्तेमाल नियमों के मुताबिक हो। सरकार का कहना है कि FCRA के तहत पंजीकृत संगठन स्वास्थ्य, शिक्षा, आपदा राहत, शोध और मानवीय कार्यों जैसे क्षेत्रों में विदेशी योगदान प्राप्त करते हैं। इसलिए यह कहना सही नहीं है कि प्रस्तावित कानून सभी NGOs या चैरिटेबल संस्थाओं के लिए विदेशी फंडिंग बंद कर देगा।

भारत में कितने संगठन FCRA के तहत पंजीकृत?

उपलब्ध सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, 15 जुलाई 2026 तक 14,449 सक्रिय FCRA प्रमाणपत्र थे। इसके अलावा 22,498 प्रमाणपत्र रद्द और 15,212 समाप्त माने गए थे। PRS के विश्लेषण के मुताबिक, 2019 से 2022 के बीच 13,520 संगठनों को करीब 55,741 करोड़ रुपये का विदेशी योगदान मिला था। सरकार का तर्क है कि FCRA व्यवस्था का उद्देश्य विदेशी फंडिंग को प्रतिबंधित करना नहीं, बल्कि उसके स्रोत और इस्तेमाल पर निगरानी रखना है।

संपत्तियों पर क्या होगा नया प्रावधान?

FCRA विधेयक का सबसे महत्वपूर्ण बदलाव विदेशी योगदान से बनी संपत्तियों के प्रबंधन से जुड़ा है। यदि किसी संस्था का FCRA प्रमाणपत्र रद्द, सरेंडर या समाप्त हो जाता है तो विदेशी योगदान और उससे जुड़ी संपत्तियां पहले अस्थायी रूप से Designated Authority के अधीन जा सकती हैं।

सरकार के मुताबिक, यह व्यवस्था संपत्तियों को तत्काल स्थायी रूप से जब्त करने के समान नहीं है। यदि संस्था निर्धारित अवधि में अपना पंजीकरण बहाल करा लेती है तो उसके संपत्ति और इस्तेमाल न किए गए फंड वापस किए जाने का प्रावधान है। हालांकि, यदि निर्धारित अवधि में पंजीकरण बहाल नहीं होता है तो विधेयक स्थायी निहितीकरण यानी permanent vesting का प्रावधान करता है। इसके खिलाफ अपील और न्यायिक समीक्षा से जुड़े प्रावधान भी प्रस्तावित किए गए हैं।

धार्मिक संस्थाओं और चर्च को लेकर क्या है विवाद?

अमेरिकी सांसदों की आपत्ति मुख्य रूप से धार्मिक संस्थाओं और चर्च से जुड़ी संपत्तियों को लेकर सामने आई है। रिपब्लिकन सांसद राइली मूर ने आरोप लगाया है कि प्रस्तावित बदलावों से सरकार को चर्च और धार्मिक चैरिटी की संपत्तियों पर नियंत्रण मिल सकता है। उन्होंने इसे ईसाई संगठनों के लिए गंभीर चिंता बताया।

भारत सरकार ने इन आरोपों को खारिज किया है। सरकारी स्पष्टीकरण के मुताबिक, कानून किसी धर्म या समुदाय को अलग से निशाना नहीं बनाता। FCRA का ढांचा धर्म, समुदाय और विचारधारा से परे उन सभी संस्थाओं पर लागू होता है जो विदेशी योगदान प्राप्त करती हैं। सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि पूजा स्थलों से जुड़ी संपत्तियों के मामले में उनके धार्मिक चरित्र को बनाए रखने की व्यवस्था प्रस्तावित है।

अमेरिका के कानूनों का भी दिया उदाहरण

FCRA को लेकर क्वात्रा ने यह तर्क भी दिया कि विदेशी फंडिंग को नियंत्रित करने वाला कानून केवल भारत में नहीं है। उन्होंने अमेरिका के Foreign Agents Registration Act (FARA) और Foreign Account Tax Compliance Act (FATCA) समेत अन्य देशों की व्यवस्थाओं का उदाहरण देते हुए कहा कि विदेशी फंड के प्रवाह पर निगरानी आधुनिक शासन व्यवस्था का हिस्सा है। भारत का कहना है कि विदेशी योगदान से जुड़े नियमों का उद्देश्य देश की संप्रभुता, राष्ट्रीय सुरक्षा और सार्वजनिक हित से जुड़े जोखिमों को नियंत्रित करना है।

अमेरिका की आलोचना पर विदेश मंत्रालय का जवाब

विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने अमेरिकी सांसदों की टिप्पणियों पर कहा कि FCRA में प्रस्तावित बदलाव भारत का आंतरिक विधायी मामला है। उन्होंने कहा कि भारत की संसद देश से जुड़े विधायी मामलों पर निर्णय लेती है।

उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि अमेरिका समेत कई देश विदेशी फंड के प्रवाह को नियंत्रित करने के लिए अपने-अपने कानून लागू करते हैं।

FCRA Amendment Bill 2026 में और क्या बदलेगा?

विधेयक में केवल संपत्तियों के प्रबंधन से जुड़े बदलाव ही नहीं हैं। इसके तहत FCRA उल्लंघनों के लिए अधिकतम कारावास की अवधि को पांच साल से घटाकर एक साल करने का प्रस्ताव है। इसके अलावा विदेशी योगदान के प्रशासन, अनुपालन और जांच प्रक्रिया में भी बदलाव प्रस्तावित हैं।

इस तरह सरकार इसे विदेशी फंडिंग व्यवस्था में प्रशासनिक और गवर्नेंस से जुड़े सुधार के रूप में पेश कर रही है, जबकि आलोचक Designated Authority की शक्तियों और संपत्तियों पर नियंत्रण को लेकर सवाल उठा रहे हैं।

अमेरिकी सांसदों को मिला करारा जबाव

FCRA Amendment Bill 2026 को लेकर विवाद अब केवल भारत की आंतरिक राजनीति तक सीमित नहीं रहा है। अमेरिकी सांसदों की आपत्तियों के बाद यह मुद्दा भारत-अमेरिका संबंधों के संदर्भ में भी चर्चा में आ गया है। हालांकि भारत ने स्पष्ट कर दिया है कि विदेशी फंडिंग को नियंत्रित करने वाला कानून उसकी संप्रभु विधायी प्रक्रिया का हिस्सा है। विधेयक फिलहाल संसद के विचाराधीन है और इसके अंतिम प्रावधान तथा संसद में होने वाली बहस यह तय करेगी कि सरकार और विपक्ष के बीच उठाए गए सवालों का समाधान किस तरह होता है।

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