जनता की कॉल से दूर अफसर: PRO के भरोसे DM-SP, जनता की कॉल का जवाब देने में अफसर फेल

पंकज चतुर्वेदी

लखनऊ। उत्तर प्रदेश में जिलाधिकारियों और पुलिस कप्तानों के लिए जनता से सीधे संवाद को लेकर जारी शासन के निर्देशों पर सवाल खड़े हो रहे हैं। नवंबर 2020 में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सभी जिलाधिकारियों और एसएसपी-एसपी को निर्देश दिया था कि वे अपने सरकारी यानी CUG नंबर पर आने वाली कॉल खुद रिसीव करें। अधिकारियों को यह नंबर पीए, PRO या किसी अन्य अधीनस्थ कर्मचारी को सौंपने पर भी रोक लगाई गई थी। साथ ही, किसी कारणवश कॉल रिसीव न कर पाने की स्थिति में बाद में संबंधित व्यक्ति को कॉल बैक करने और लापरवाही सामने आने पर कार्रवाई के निर्देश दिए गए थे। इसके बावजूद जमीनी स्तर पर तस्वीर इन निर्देशों के विपरीत नजर आ रही है।

सात दिन तक 75 जिलों में परखी गई व्यवस्था, सिर्फ तीन डीएम से हो सकी सीधे बात

एक रिपोर्ट के मुताबिक प्रदेश के सभी 75 जिलों में सात दिनों तक जिलाधिकारियों और पुलिस कप्तानों के CUG नंबर पर दिन में तीन बार फोन कर व्यवस्था की पड़ताल की गई। इस दौरान सिर्फ तीन जिलाधिकारियों से सीधे बातचीत हो सकी, जबकि अधिकांश जिलों में या तो फोन नहीं उठा या फिर PRO, पीए अथवा अन्य कर्मचारियों ने कॉल रिसीव की। इससे यह सवाल उठने लगा है कि जब शासन ने अफसरों को खुद जनता की कॉल सुनने और समस्याओं पर संज्ञान लेने का निर्देश दिया है, तो व्यवहार में यह जिम्मेदारी अधीनस्थ कर्मचारियों के हाथ में क्यों दिखाई दे रही है।

25 जिलों में बताया गया- बैठक में हैं साहब

रिपोर्ट के अनुसार फिरोजाबाद, मैनपुरी, मथुरा, कानपुर, अयोध्या और सुल्तानपुर समेत करीब 25 जिलों में फोन उठाने वाले कर्मचारियों ने बताया कि जिलाधिकारी बैठक या वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग में व्यस्त हैं। ऐसे में कॉल करने वाले व्यक्ति की अधिकारी से सीधे बात नहीं हो सकी। दूसरी ओर आगरा, झांसी और जालौन समेत करीब 12 जिलों में PRO ने ही फोन पर समस्या सुनने और उसका समाधान बताने की कोशिश की। कुछ मामलों में लोगों को तहसील या SDM के पास जाने की सलाह दी गई, जबकि कुछ को अगले दिन कार्यालय पहुंचकर लिखित शिकायत देने के लिए कहा गया।

तीन जिलों में डीएम ने खुद उठाया फोन

हालांकि सभी जिलों में स्थिति एक जैसी नहीं रही। औरैया, इटावा और लखीमपुर खीरी के जिलाधिकारियों ने स्वयं फोन रिसीव किया और कॉल करने वाले की समस्या सुनने की पहल की। इन जिलों में CUG व्यवस्था का वह स्वरूप दिखाई दिया, जिसकी अपेक्षा शासन के निर्देशों के तहत की गई थी। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि यदि अधिकारी स्वयं CUG नंबर संचालित करें तो आम नागरिकों को अपनी समस्या सीधे जिलाधिकारी तक पहुंचाने का अवसर मिल सकता है।

पुलिस महकमे में भी हालात चिंताजनक

पुलिस विभाग में भी जनता और जिले के शीर्ष पुलिस अधिकारी के बीच सीधे संवाद की व्यवस्था प्रभावी नजर नहीं आई। रिपोर्ट के अनुसार प्रदेश के 68 जिलों के एसएसपी-एसपी और सात जिलों के पुलिस कमिश्नरों में से किसी से भी फोन पर सीधे बातचीत नहीं हो सकी। हापुड़, मिर्जापुर और संतकबीरनगर में पुलिस कप्तान का CUG नंबर बंद मिला। वहीं लखनऊ के तरुण गाबा, गाजियाबाद के जे. रविंदर गौड़, बागपत के सूरज कुमार राय और बलिया के ओमवीर सिंह समेत 16 जिलों में फोन रिसीव ही नहीं हुआ।

महराजगंज और सोनभद्र में एसपी कार्यालय की ओर से बाद में कॉल बैक जरूर किया गया। हालांकि यहां भी PRO ने बताया कि पुलिस कप्तान व्यस्त हैं और बाद में उनसे बात कराई जाएगी। यानी कॉल बैक की व्यवस्था का पालन कुछ हद तक दिखाई दिया, लेकिन आम नागरिक की अधिकारी से सीधे बातचीत की मूल जरूरत फिर भी पूरी नहीं हो सकी।

नियम सख्त, लेकिन जमीनी व्यवस्था में ढिलाई

पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल यही है कि शासन की ओर से CUG नंबर खुद संचालित करने और जनता की कॉल का जवाब देने के स्पष्ट निर्देश होने के बावजूद जिलों में यह व्यवस्था PRO, पीए, स्टेनो और अन्य अधीनस्थ कर्मचारियों के भरोसे क्यों नजर आ रही है। आम नागरिक के लिए जिलाधिकारी या पुलिस कप्तान तक पहुंचने का सबसे आसान और तत्काल माध्यम अक्सर फोन ही होता है। ऐसे में यदि फोन उठाने वाला कर्मचारी ही यह तय करने लगे कि किस व्यक्ति की बात अधिकारी से कराई जाएगी और किसे तहसील, SDM या किसी दूसरे अधिकारी के पास भेज दिया जाएगा, तो सीधे संवाद की पूरी व्यवस्था का उद्देश्य कमजोर पड़ जाता है।

CUG व्यवस्था पर खर्च के बावजूद जवाबदेही का सवाल

पुलिस विभाग में CUG व्यवस्था पर हर साल करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद यदि आम नागरिक को अपने जिले के पुलिस कप्तान से बात करने के लिए कर्मचारियों पर निर्भर रहना पड़े, तो इसकी प्रभावशीलता पर सवाल उठना स्वाभाविक है। खास तौर पर तब, जब जनप्रतिनिधि भी समय-समय पर अधिकारियों द्वारा फोन नहीं उठाने की शिकायत करते रहे हैं। ऐसे में सवाल सिर्फ फोन उठाने या न उठाने का नहीं, बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही और जनता की शिकायतों तक शीर्ष अधिकारियों की सीधी पहुंच का भी है।

जनता से सीधे संवाद की व्यवस्था पर उठे सवाल

शासन का उद्देश्य स्पष्ट है कि जिले के सबसे महत्वपूर्ण प्रशासनिक और पुलिस अधिकारियों तक आम नागरिक की पहुंच बनी रहे और उसकी शिकायत को प्राथमिक स्तर पर सुना जा सके। लेकिन अगर तय व्यवस्था के बावजूद ज्यादातर कॉल अधिकारियों तक पहुंचने से पहले ही कर्मचारियों के स्तर पर रुक जाएं, तो जनता और अफसरों के बीच सीधे संवाद की यह व्यवस्था कितनी प्रभावी है, इस पर गंभीर सवाल उठना लाजिमी है। अब देखना होगा कि शासन इन निष्कर्षों के बाद CUG व्यवस्था की निगरानी और अधिकारियों की जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए क्या कदम उठाता है।