पाकिस्तान में सिंध और बलूचिस्तान क्षेत्रों में गंभीर जल संकट गहराया। नहरों में पानी की भारी कमी से कृषि और अर्थव्यवस्था पर बड़ा खतरा मंडरा रहा है।

नई दिल्ली/अमर भारती। पाकिस्तान इन दिनों गंभीर जल संकट से जूझ रहा है, जिससे देश के सिंध और बलूचिस्तान प्रांतों में खेती, आजीविका और स्थानीय अर्थव्यवस्था पर बड़ा खतरा मंडरा रहा है। रिपोर्टों के अनुसार, नहरों में पानी की भारी कमी और असमान वितरण के कारण हालात लगातार बिगड़ते जा रहे हैं। यह संकट ऐसे समय में सामने आया है जब भारत ने पहलगाम आतंकी हमले के बाद सिंधु जल समझौते पर अपना रुख सख्त कर दिया है। भारत का कहना है कि आतंकवाद और द्विपक्षीय समझौतों को अलग-अलग नहीं देखा जा सकता।
सिंध और बलूचिस्तान में सबसे गंभीर हालात
पाकिस्तान के सबसे बड़े कृषि क्षेत्र सिंध में पानी की कमी का सबसे ज्यादा असर देखा जा रहा है। यहां स्थित कराची सहित कई इलाकों में जल आपूर्ति बाधित हो गई है। किसानों का कहना है कि नहरों में पानी की कमी से फसलें बर्बाद होने का खतरा बढ़ गया है। सिंध और बलूचिस्तान के कई हिस्सों में लाखों एकड़ कृषि भूमि प्रभावित हो रही है, जिससे देश की कृषि आधारित अर्थव्यवस्था पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार, यह संकट पाकिस्तान की लगभग एक-तिहाई आबादी को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित कर रहा है।
सुक्कुर बैराज सिस्टम में गिरता जल स्तर
रिपोर्टों के मुताबिक, सिंधु नदी पर बने सुक्कुर बैराज सिस्टम में पानी की स्थिति बेहद चिंताजनक हो गई है। यह बैराज सिंध और बलूचिस्तान के बड़े हिस्से की सिंचाई का मुख्य स्रोत है।
डॉन की रिपोर्ट के अनुसार:
- नॉर्थ वेस्ट कैनाल में 64.1% पानी की कमी
- राइस कैनाल में 38% कमी
- दादू कैनाल में 82% कमी दर्ज की गई है
इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि निचले क्षेत्रों में जल आपूर्ति तेजी से घट रही है।
पंजाब पर ज्यादा पानी लेने के आरोप
सिंध के सिंचाई विभाग के अनुसार, पंजाब प्रांत अपने निर्धारित कोटे से अधिक पानी उपयोग कर रहा है। आंकड़ों के मुताबिक:
- पंजाब को 44,000 क्यूसेक के बजाय 53,394 क्यूसेक पानी मिल रहा है
- यह लगभग 21% अधिक है
इसी तरह टौंसा बैराज भी अपने तय हिस्से से अधिक पानी ले रहा है। वहीं दूसरी ओर निचले क्षेत्रों में पानी की भारी कमी देखी जा रही है, जिससे असंतुलन और बढ़ गया है।
राजनीतिक तनाव भी तेज
इस जल संकट ने पाकिस्तान में राजनीतिक विवादों को भी जन्म दे दिया है। विभिन्न राजनीतिक दल एक-दूसरे पर पानी के असमान वितरण और खराब प्रबंधन का आरोप लगा रहे हैं। जमात-ए-इस्लामी और पीपीपी नेताओं के बीच आरोप-प्रत्यारोप तेज हो गए हैं। विपक्ष का कहना है कि सिंध सरकार वर्षों से जल संकट का समाधान करने में विफल रही है, जबकि सरकार का आरोप है कि केंद्र स्तर पर पानी के बंटवारे में भेदभाव हो रहा है।
कृषि अर्थव्यवस्था पर खतरा
विशेषज्ञों के अनुसार, सिंध पाकिस्तान की कृषि अर्थव्यवस्था का प्रमुख केंद्र है। यह क्षेत्र देश के कुल कृषि उत्पादन का बड़ा हिस्सा देता है और चावल निर्यात से अरबों डॉलर की आय अर्जित करता है। लेकिन मौजूदा जल संकट के कारण खरीफ सीजन की फसलें प्रभावित हो सकती हैं। किसानों का कहना है कि नहरों में पानी न आने से खेती शुरू करना मुश्किल हो गया है।
भारत का सख्त रुख और सिंधु जल विवाद
भारत ने पहलगाम आतंकी हमले के बाद सिंधु जल समझौते पर सख्त रुख अपनाया है। भारत का कहना है कि आतंकवाद और सामान्य कूटनीतिक संबंध एक साथ नहीं चल सकते। भारतीय नेतृत्व ने स्पष्ट किया है कि जब तक सीमा पार आतंकवाद पर रोक नहीं लगती, तब तक जल समझौते की समीक्षा जारी रहेगी।पाकिस्तान में बढ़ता जल संकट केवल प्राकृतिक समस्या नहीं बल्कि प्रशासनिक और राजनीतिक असंतुलन का परिणाम भी माना जा रहा है। सिंध और बलूचिस्तान में बिगड़ते हालात आने वाले समय में देश की कृषि और अर्थव्यवस्था के लिए बड़ी चुनौती बन सकते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते जल प्रबंधन में सुधार नहीं किया गया तो यह संकट और गहरा सकता है।
यहां भी पढ़ें-