सोनम वांगचुक से पहले भारत में अन्ना हजारे, इरोम शर्मिला, पोटी श्रीरामुलु, मेधा पाटकर, ममता बनर्जी और भगत सिंह जैसे आंदोलनकारियों ने लंबी भूख हड़ताल की।

नई दिल्ली/अमर भारती। लोकतंत्र में विरोध दर्ज कराने के कई तरीके हैं। कोई सड़क पर उतरता है, कोई धरना देता है, कोई सत्याग्रह करता है और कोई अपनी मांगों को सरकार तक पहुंचाने के लिए भूख हड़ताल का रास्ता चुनता है। भारत के राजनीतिक और सामाजिक इतिहास में भूख हड़ताल केवल विरोध का माध्यम नहीं रही, बल्कि कई बार यह आंदोलन की सबसे प्रभावशाली रणनीति भी बनी है।
सोनम वांगचुक की बिगड़ती तबीयत को लेकर पुलिस की कार्रवाई
हाल ही में सामाजिक कार्यकर्ता और शिक्षा सुधार के लिए लंबे समय से आवाज उठाने वाले सोनम वांगचुक ने परीक्षा व्यवस्था में कथित अनियमितताओं और जवाबदेही की मांग को लेकर अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल शुरू की। उनका आंदोलन Cockroach Janta Party से जुड़े विरोध-प्रदर्शन के बीच शुरू हुआ और इसमें केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग भी प्रमुख रही। लगातार 20 दिन के उपवास के बाद 18 जुलाई 2026 को दिल्ली पुलिस ने उनकी बिगड़ती सेहत के मद्देनजर उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया। पुलिस के अनुसार यह कदम चिकित्सकीय सलाह और स्वास्थ्य संबंधी चिंता के कारण उठाया गया, जबकि आंदोलन से जुड़े लोगों ने इसे जबरन अस्पताल ले जाने की कार्रवाई बताया।
सोनम वांगचुक का यह आंदोलन इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि यह देश में भूख हड़ताल की उस लंबी परंपरा की याद दिलाता है, जिसमें अलग-अलग दौर में सामाजिक कार्यकर्ताओं, राजनीतिक नेताओं और क्रांतिकारियों ने अपनी मांगों के लिए भोजन त्याग दिया। सवाल है कि सोनम वांगचुक से पहले भारत में किन-किन आंदोलनकारियों ने लंबी भूख हड़ताल की और उनके आंदोलन का देश पर क्या असर पड़ा?
सोनम वांगचुक: परीक्षा व्यवस्था के खिलाफ 20 दिन का अनशन
सोनम वांगचुक को देश शिक्षा सुधार और पर्यावरण से जुड़े मुद्दों पर मुखर आवाज के रूप में जानता है। 2026 में उन्होंने परीक्षा व्यवस्था में कथित गड़बड़ियों, पेपर लीक के आरोपों और छात्रों से जुड़े मुद्दों को लेकर चल रहे Cockroach Janta Party आंदोलन को समर्थन दिया। वांगचुक ने शिक्षा व्यवस्था में जवाबदेही की मांग करते हुए केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग का समर्थन किया। इसके बाद उन्होंने दिल्ली के जंतर-मंतर पर अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल शुरू की। आंदोलन का संबंध कथित परीक्षा अनियमितताओं और छात्रों की परेशानियों से जोड़ा गया।
20 दिनों तक चले अनशन के बाद उनकी सेहत बिगड़ने लगी। 18 जुलाई को पुलिस उन्हें अस्पताल ले गई। पुलिस का कहना था कि स्वास्थ्य की स्थिति को देखते हुए चिकित्सकीय हस्तक्षेप जरूरी था, जबकि आंदोलनकारियों ने इसे विरोध को दबाने की कार्रवाई बताया। इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर यह बहस तेज कर दी कि क्या किसी आंदोलनकारी को उसकी इच्छा के विरुद्ध अस्पताल ले जाया जा सकता है और भूख हड़ताल की सीमा क्या होनी चाहिए?
वांगचुक का आंदोलन उस समय सामने आया है जब भारत में भूख हड़ताल को लेकर एक लंबा और प्रभावशाली इतिहास रहा है। इस इतिहास में महात्मा गांधी से लेकर भगत सिंह, अन्ना हजारे और इरोम शर्मिला तक के नाम शामिल हैं।
अन्ना हजारे: जन लोकपाल आंदोलन ने देश की राजनीति बदल दी
भारत में आधुनिक दौर की सबसे चर्चित भूख हड़तालों में अन्ना हजारे का जन लोकपाल आंदोलन सबसे ऊपर गिना जाता है। वर्ष 2011 में भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना हजारे ने दिल्ली के रामलीला मैदान में अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल शुरू की। उनकी प्रमुख मांग थी कि देश में एक मजबूत Jan Lokpal Bill लाया जाए, ताकि बड़े स्तर के भ्रष्टाचार की स्वतंत्र जांच और कार्रवाई हो सके। उस समय देश में भ्रष्टाचार के कई बड़े मामलों को लेकर जनता में गुस्सा था। अन्ना हजारे का आंदोलन देखते ही देखते एक राष्ट्रीय आंदोलन बन गया।
दिल्ली के रामलीला मैदान से शुरू हुआ यह आंदोलन देश के अलग-अलग हिस्सों तक पहुंच गया। बड़ी संख्या में लोग अन्ना के समर्थन में सड़कों पर उतरे। सोशल मीडिया और टेलीविजन कवरेज ने आंदोलन को देशव्यापी रूप दे दिया। सरकार और आंदोलनकारियों के बीच बातचीत हुई। संसद में भी इस मुद्दे पर चर्चा हुई और अन्ना हजारे ने अपनी मांगों पर सरकार से आश्वासन मिलने के बाद अनशन समाप्त किया। हालांकि बाद में लोकपाल कानून के स्वरूप और उसके प्रभाव को लेकर बहस जारी रही, लेकिन अन्ना हजारे के आंदोलन ने यह जरूर दिखाया कि एक भूख हड़ताल किस तरह देश की राजनीति और जनमत को प्रभावित कर सकती है।
इरोम शर्मिला: 16 साल तक चला दुनिया के सबसे लंबे अनशनों में से एक
भारत के इतिहास में सबसे लंबी भूख हड़तालों में इरोम चानू शर्मिला का नाम बेहद महत्वपूर्ण है। मणिपुर की मानवाधिकार कार्यकर्ता इरोम शर्मिला ने 5 नवंबर 2000 को अपना अनशन शुरू किया। यह अनशन मणिपुर के मालोम इलाके में असम राइफल्स की कार्रवाई में नागरिकों की मौत के विरोध में शुरू किया गया था। उनका मुख्य विरोध Armed Forces Special Powers Act यानी AFSPA के खिलाफ था।
इरोम शर्मिला ने लगभग 16 वर्षों तक अपना विरोध जारी रखा। इस दौरान उन्हें कई बार हिरासत में लिया गया और चिकित्सकीय निगरानी में रखा गया। प्रशासन की ओर से उन्हें जबरन नाक के जरिए भोजन दिया जाता था, लेकिन उन्होंने अपने विरोध को समाप्त नहीं किया।
उनका आंदोलन दुनिया भर में चर्चा का विषय बना। इरोम शर्मिला का कहना था कि AFSPA के कारण सुरक्षा बलों को अत्यधिक शक्तियां मिलती हैं और इससे आम नागरिकों के अधिकार प्रभावित होते हैं। वर्षों तक चले इस संघर्ष के बाद उन्होंने 2016 में अपना अनशन समाप्त किया और चुनावी राजनीति में प्रवेश करने का निर्णय लिया। इरोम शर्मिला का आंदोलन यह दिखाता है कि भूख हड़ताल केवल कुछ दिनों का विरोध नहीं, बल्कि किसी विचार और मांग के लिए वर्षों तक चलने वाला संघर्ष भी हो सकता है।
ममता बनर्जी: सिंगूर आंदोलन और 26 दिन की भूख हड़ताल
पश्चिम बंगाल की राजनीति में सिंगूर आंदोलन एक बड़ा मोड़ माना जाता है। टाटा मोटर्स के Nano Project के लिए कृषि भूमि के अधिग्रहण के विरोध में तत्कालीन विपक्षी नेता ममता बनर्जी ने भूख हड़ताल की। वर्ष 2006 में शुरू हुआ यह आंदोलन किसानों की जमीन के अधिग्रहण के विरोध से जुड़ा था। ममता बनर्जी का आरोप था कि किसानों की इच्छा के विरुद्ध उनकी जमीन ली जा रही है।
उन्होंने कोलकाता में लंबी भूख हड़ताल की। यह आंदोलन करीब 26 दिनों तक चला और पश्चिम बंगाल की राजनीति में इसका गहरा असर पड़ा। सिंगूर आंदोलन ने तत्कालीन वाम मोर्चा सरकार के खिलाफ राजनीतिक माहौल तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। बाद में भूमि अधिग्रहण का यह मुद्दा पश्चिम बंगाल की राजनीति का केंद्रीय विषय बन गया। ममता बनर्जी का आंदोलन यह उदाहरण है कि भूख हड़ताल किस तरह किसी स्थानीय मुद्दे को राज्यव्यापी और राष्ट्रीय राजनीतिक मुद्दे में बदल सकती है।
मेधा पाटकर: नर्मदा आंदोलन और विस्थापितों के पुनर्वास की लड़ाई
सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटकर ने नर्मदा घाटी में बड़े बांधों के निर्माण और उससे प्रभावित होने वाले लोगों के पुनर्वास के मुद्दे को राष्ट्रीय स्तर पर उठाया। Narmada Bachao Andolan के माध्यम से उन्होंने सरदार सरोवर बांध की ऊंचाई बढ़ाने का विरोध किया। उनका कहना था कि बांध के कारण बड़ी संख्या में परिवार विस्थापित होंगे और उनके पुनर्वास की व्यवस्था पर्याप्त नहीं है। मेधा पाटकर ने कई बार भूख हड़ताल और सत्याग्रह का सहारा लिया। उनका आंदोलन केवल बांध के खिलाफ नहीं था, बल्कि विकास की उस नीति पर सवाल था जिसमें परियोजनाओं के लिए विस्थापित होने वाले लोगों के अधिकारों और पुनर्वास को प्राथमिकता देने की मांग की गई। नर्मदा आंदोलन ने देश में Development vs Displacement की बहस को नई दिशा दी।
सुप्रीम कोर्ट और सरकार के स्तर पर भी इस मुद्दे पर लंबी कानूनी और राजनीतिक प्रक्रिया चली। मेधा पाटकर के आंदोलन ने यह सवाल उठाया कि क्या बड़े विकास प्रोजेक्ट्स की कीमत आम लोगों के विस्थापन के रूप में चुकाई जा सकती है और अगर विस्थापन जरूरी है तो प्रभावित परिवारों के अधिकारों की रक्षा कैसे होगी।
पोटी श्रीरामुलु: 58 दिन के अनशन के बाद बना आंध्र राज्य
भारत के भाषाई आधार पर राज्यों के पुनर्गठन के इतिहास में पोटी श्रीरामुलु का नाम बेहद महत्वपूर्ण है। उन्होंने तेलुगु भाषी लोगों के लिए अलग राज्य की मांग को लेकर आमरण अनशन शुरू किया। उनका अनशन 58 दिनों तक चला। लंबे समय तक भूख हड़ताल के बाद उनकी मृत्यु हो गई। उनकी मृत्यु के बाद आंध्र क्षेत्र में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए।
जनता के आक्रोश ने केंद्र सरकार पर दबाव बढ़ाया और अंततः अलग आंध्र राज्य के गठन का रास्ता खुला। पोटी श्रीरामुलु का बलिदान भारत के राजनीतिक इतिहास में एक निर्णायक घटना बन गया। इसके बाद भाषाई आधार पर राज्यों के पुनर्गठन की मांग तेज हुई और 1956 में States Reorganisation Act के जरिए देश के राज्यों की सीमाओं में बड़े बदलाव किए गए। इस तरह एक व्यक्ति की भूख हड़ताल ने भारत के प्रशासनिक और राजनीतिक नक्शे को बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
महात्मा गांधी: उपवास को बनाया सत्याग्रह का हथियार
भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में महात्मा गांधी ने उपवास को एक शक्तिशाली नैतिक और राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया। गांधीजी के लिए उपवास केवल भोजन त्यागना नहीं था। यह आत्मसंयम, आत्मशुद्धि और नैतिक दबाव का माध्यम था। उन्होंने कई मौकों पर सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों को लेकर उपवास किया। 1933 में गांधीजी ने 21 दिन का उपवास किया। यह उपवास दलितों के अधिकारों, सामाजिक समानता और छुआछूत के खिलाफ उनके अभियान से जुड़ा था।
उनका मानना था कि राजनीतिक स्वतंत्रता तभी सार्थक होगी, जब समाज में जातिगत भेदभाव और छुआछूत समाप्त हो। गांधीजी के उपवास का असर केवल सरकार पर नहीं, बल्कि समाज पर भी पड़ता था। उनके उपवास के दौरान देश भर में प्रार्थना सभाएं होती थीं और सामाजिक सुधार को लेकर बहस तेज होती थी। गांधीजी ने यह स्थापित किया कि अहिंसक आंदोलन में व्यक्ति का अपना त्याग भी जनता और सत्ता दोनों पर गहरा नैतिक प्रभाव डाल सकता है।
भगत सिंह और जतिन दास: जेल में 63 दिनों की ऐतिहासिक भूख हड़ताल
भारत के स्वतंत्रता संग्राम में भगत सिंह और उनके साथियों की जेल में की गई भूख हड़ताल भी इतिहास का महत्वपूर्ण अध्याय है। लाहौर जेल में भारतीय कैदियों के साथ भेदभावपूर्ण व्यवहार किया जाता था। क्रांतिकारियों का आरोप था कि यूरोपीय कैदियों को बेहतर भोजन, कपड़े और सुविधाएं दी जाती थीं, जबकि भारतीय कैदियों को खराब परिस्थितियों में रखा जाता था। भगत सिंह और उनके साथियों ने जेल में राजनीतिक कैदियों के अधिकारों और समान व्यवहार की मांग को लेकर भूख हड़ताल शुरू की।
इस आंदोलन के दौरान क्रांतिकारी जतिन दास ने 63 दिनों तक भूख हड़ताल की। लंबे उपवास के बाद 1929 में उनकी मृत्यु हो गई। जतिन दास की शहादत ने पूरे देश को झकझोर दिया। उनके अंतिम संस्कार में भारी भीड़ उमड़ी और स्वतंत्रता आंदोलन को नई ऊर्जा मिली। भगत सिंह की जेल भूख हड़ताल ने यह साबित किया कि क्रांतिकारी आंदोलन केवल हथियारों और संघर्ष तक सीमित नहीं था। जेल के भीतर भी राजनीतिक कैदी अपने अधिकारों और सम्मान के लिए लड़ रहे थे।
भूख हड़ताल क्यों बनती है आंदोलन का प्रभावशाली हथियार?
भारत में भूख हड़ताल की परंपरा को समझने के लिए इसके सामाजिक और राजनीतिक प्रभाव को समझना जरूरी है। भूख हड़ताल में आंदोलनकारी अपने शरीर को ही विरोध का माध्यम बना लेता है। वह सरकार और समाज के सामने यह संदेश देता है कि उसकी मांग इतनी गंभीर है कि वह उसके लिए अपनी बुनियादी जरूरत तक त्यागने को तैयार है। यही कारण है कि भूख हड़ताल आम धरने से अलग प्रभाव पैदा करती है। लेकिन इसके साथ गंभीर सवाल भी जुड़े हैं। लंबे समय तक भोजन न करने से शरीर पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है।
कई मामलों में आंदोलनकारी की हालत बिगड़ने पर प्रशासन चिकित्सकीय हस्तक्षेप करता है। यहीं से यह बहस शुरू होती है कि किसी व्यक्ति के व्यक्तिगत अधिकार और राज्य की जिम्मेदारी के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। सोनम वांगचुक के मामले में भी यही बहस सामने आई है। उनके समर्थकों का कहना है कि उन्हें उनकी इच्छा के विरुद्ध अस्पताल ले जाया गया, जबकि पुलिस और प्रशासन का पक्ष है कि उनकी बिगड़ती स्वास्थ्य स्थिति को देखते हुए चिकित्सा सहायता जरूरी थी।
सोनम वांगचुक से गांधी और भगत सिंह तक- विरोध के तरीकों में बदलाव
भारत में भूख हड़ताल की राजनीति समय के साथ बदलती रही है। महात्मा गांधी के लिए यह नैतिक दबाव और अहिंसक सत्याग्रह का माध्यम था। भगत सिंह और जतिन दास के लिए यह जेल में राजनीतिक कैदियों के अधिकारों की लड़ाई थी। पोटी श्रीरामुलु का अनशन भाषाई पहचान और अलग राज्य की मांग से जुड़ा था।
इरोम शर्मिला ने AFSPA के खिलाफ 16 वर्षों तक संघर्ष किया। अन्ना हजारे ने भ्रष्टाचार के खिलाफ जन लोकपाल की मांग को राष्ट्रीय आंदोलन बना दिया। ममता बनर्जी ने भूमि अधिग्रहण के खिलाफ आंदोलन किया, जबकि मेधा पाटकर ने विस्थापन और पुनर्वास के सवाल को देश के सामने रखा।
अब सोनम वांगचुक का आंदोलन परीक्षा व्यवस्था, जवाबदेही और छात्रों के भविष्य से जुड़े मुद्दों के बीच सामने आया है। इन सभी आंदोलनों की मांगें अलग थीं, उनके तरीके अलग थे और उनके परिणाम भी अलग-अलग रहे। लेकिन एक बात समान रही—भूख हड़ताल ने उन मुद्दों को राष्ट्रीय बहस के केंद्र में ला दिया, जिन्हें आंदोलनकारी जनता और सरकार के सामने रखना चाहते थे।
क्या भूख हड़ताल आज भी प्रभावी है?
सोशल मीडिया, डिजिटल कैंपेन और ऑनलाइन आंदोलनों के दौर में भी भूख हड़ताल की ताकत खत्म नहीं हुई है। बल्कि आज यह आंदोलन का एक ऐसा रूप बन गई है, जो डिजिटल दुनिया और जमीन पर चल रहे विरोध—दोनों को जोड़ती है। सोनम वांगचुक का आंदोलन इसका ताजा उदाहरण है। एक तरफ उनका अनशन जंतर-मंतर पर चल रहा था, वहीं दूसरी तरफ उनके समर्थन में सोशल मीडिया पर चर्चा और डिजिटल अभियान भी जारी रहा।
हालांकि किसी भी आंदोलन की सफलता केवल भूख हड़ताल की अवधि से तय नहीं होती। असली सवाल यह है कि आंदोलन की मांग कितनी स्पष्ट है, जनता का समर्थन कितना व्यापक है और सरकार उस पर किस तरह प्रतिक्रिया देती है। भारत का इतिहास बताता है कि कई बार एक व्यक्ति का उपवास पूरे देश को सोचने पर मजबूर कर देता है। कभी वह भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन बनता है, कभी सामाजिक न्याय की लड़ाई, कभी राज्य निर्माण का कारण और कभी राजनीतिक व्यवस्था के खिलाफ प्रतिरोध का प्रतीक।
सोनम वांगचुक का 20 दिन का अनशन भी अब इसी लंबे इतिहास की नई कड़ी बन चुका है। आने वाले समय में यह आंदोलन किस दिशा में जाता है और सरकार इसकी मांगों पर क्या कदम उठाती है, यह देखना महत्वपूर्ण होगा। लेकिन इतना तय है कि भारत में भूख हड़ताल आज भी विरोध की राजनीति का एक बेहद शक्तिशाली और भावनात्मक हथियार बनी हुई है।
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