किसान की चौखट पर चवन्नी की खैरात: गेहूं के एमएसपी में एक फीसदी भी बढ़ोतरी नहीं

मथुरा। केंद्र सरकार ने रबी फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) घोषित कर दिया है, लेकिन गेहूं के समर्थन मूल्य में हुई मामूली बढ़ोतरी ने किसानों की आय, बढ़ती लागत और महंगाई के बीच सरकार की कृषि नीति पर सवाल खड़े कर दिए हैं। गेहूं के एमएसपी में महज 25 रुपये प्रति कुंतल की बढ़ोतरी की गई है। यह वृद्धि करीब 0.97 प्रतिशत है, यानी एक फीसदी से भी कम।
सरकार ने वर्ष 2027-28 के लिए गेहूं का एमएसपी 2585 रुपये से बढ़ाकर 2610 रुपये प्रति कुंतल किया है। वहीं अन्य रबी फसलों में अपेक्षाकृत अधिक वृद्धि की गई है। ऐसे में दलहन और तिलहन के मुकाबले गेहूं का मूल्य कम बढ़ाए जाने से आने वाले समय में गेहूं के रकबे पर भी असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है।
आंकड़ों पर नजर डालें तो जौ के एमएसपी में 136 रुपये, चने में 83 रुपये, मसूर में 390 रुपये, सरसों में 413 रुपये और कुसुम में 675 रुपये प्रति कुंतल की बढ़ोतरी की गई है। प्रतिशत के लिहाज से गेहूं की वृद्धि सबसे कम है।
फसल
2026-27 एमएसपी
2027-28 एमएसपी
बढ़ोतरी
वृद्धि प्रतिशत
गेहूं
₹2585
₹2610
₹25
0.97%
जौ
₹2150
₹2286
₹136
6.33%
चना
₹5875
₹5958
₹83
1.41%
मसूर
₹7000
₹7390
₹390
5.57%
सरसों
₹6200
₹6613
₹413
6.66%
कुसुम
₹6540
₹7215
₹675
10.32%
एमएसपी घोषित, लेकिन सरकारी खरीद कितनी?
एमएसपी की घोषणा के साथ सबसे बड़ा सवाल सरकारी खरीद को लेकर है। उत्तर प्रदेश में कुल उत्पादित गेहूं का सरकारें 10 से 15 प्रतिशत से अधिक खरीद पाने में सफल नहीं रही हैं। ऐसे में घोषित समर्थन मूल्य का वास्तविक लाभ कितने किसानों तक पहुंचता है, यह अपने आप में बड़ा सवाल है।
कुसुम जैसी फसलों की स्थिति तो और भी चुनौतीपूर्ण है। कई इलाकों में किसानों को उपज का खरीदार तक नहीं मिल पाता। मथुरा के गोवर्धन क्षेत्र के अड़ींग गांव निवासी किसान नेमसिंह बघेल इसका उदाहरण हैं। उनके मुताबिक तीन साल से कुसुम के फूल और करीब पांच कुंतल बीज उनके पास पड़े हैं। स्थानीय स्तर पर प्रयास के बावजूद उन्हें अब तक खरीदार नहीं मिल सका। यहां तक कि मथुरा मंडी के अधिकारियों के प्रयास भी उनके लिए खरीददार उपलब्ध नहीं करा सके।
गेहूं का रकबा बड़ा, कीमत में वृद्धि छोटी
ब्रज फार्मर प्रोड्यूसर कंपनी के शिवराम सिंह के मुताबिक देश में करीब 335 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में गेहूं की खेती होती है। उत्तर प्रदेश के मथुरा जिले में भी करीब दो लाख हेक्टेयर क्षेत्र में गेहूं की खेती होती है। ऐसे में गेहूं के एमएसपी में मामूली वृद्धि का प्रभाव बड़ी संख्या में किसानों पर पड़ना स्वाभाविक है।
महंगाई की रफ्तार से पीछे एमएसपी
रिपोर्ट के अनुसार गत जुलाई में खाद्य महंगाई दर 5.52 प्रतिशत रही थी। ग्रामीण क्षेत्रों में यह 6.13 प्रतिशत और शहरी क्षेत्रों में 5.64 प्रतिशत दर्ज की गई। ऐसे में गेहूं जैसी प्रमुख खाद्यान्न फसल के एमएसपी में 0.97 प्रतिशत की वृद्धि को किसान हित के नजरिए से अपर्याप्त माना जा रहा है।
गेहूं और चावल देश में सबसे अधिक उपभोग की जाने वाली प्रमुख खाद्यान्न फसलों में शामिल हैं। कृषि लागत, खाद, बीज, सिंचाई, डीजल, मजदूरी और परिवहन जैसी लागतों में लगातार बढ़ोतरी के बीच गेहूं के एमएसपी में मामूली इजाफा किसानों के लिए राहत से ज्यादा निराशा का कारण बन सकता है।
दलहन-तिलहन पर जोर, लेकिन जमीन पर चुनौती
सरकार ने दलहन और तिलहन का उत्पादन बढ़ाकर आयात पर निर्भरता कम करने के उद्देश्य से पांच वर्ष के लिए आत्मनिर्भरता मिशन शुरू किया है। इसके तहत 11,400 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है।
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के एडीजी दलहन-तिलहन डॉ. एसके झा के अनुसार मिशन के तहत किसानों को उन्नत किस्म के नए बीज, मिनी किट सहित अन्य सामग्री उपलब्ध कराई जा रही है। यह सामग्री विभिन्न राज्यों के कृषि विभागों के माध्यम से किसानों तक पहुंचाई जा रही है।
हालांकि सवाल यह है कि किसानों को नई फसलों की ओर आकर्षित करने के लिए सिर्फ एमएसपी बढ़ाना पर्याप्त होगा या फिर खरीद की गारंटी, बाजार, भंडारण और लागत में कमी की व्यवस्था भी करनी होगी। खासकर तब, जब कुसुम जैसी फसलों के किसानों को उपज बेचने के लिए खरीदार तक नहीं मिल पा रहे हैं।
किसानों की चौखट तक पहुंचने वाली एमएसपी की राहत अगर बाजार और सरकारी खरीद व्यवस्था में नहीं बदलती, तो कागज पर बढ़ा समर्थन मूल्य किसानों की वास्तविक आय बढ़ाने में कितना कारगर होगा, यह बड़ा सवाल बना रहेगा।