
लखनऊ: योगी आदित्यनाथ ने रविवार को प्रेस कांफ्रेंस करते हुए कहा कि यह वार्ता संसद में इंडी गठबंधन के आचरण पर केंद्रित है। उन्होंने कहा कि जब नरेंद्र मोदी ने 2014 में सत्ता संभाली थी, तब उन्होंने देश में चार प्रमुख वर्ग—नारी, गरीब, युवा और किसान—की बात कही थी, जो सरकार की प्राथमिकताओं का आधार बने।
सीएम योगी ने आरोप लगाया कि जातिवाद की राजनीति कर देश को कमजोर करने वाले दलों के लिए यह सोच चुनौती और चेतावनी दोनों थी। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में जब-जब प्रगतिशील कदम उठाए गए, तब-तब भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों ने उनका विरोध किया।
उन्होंने बताया कि यह प्रेस वार्ता विशेष रूप से नारी शक्ति वंदन अधिनियम और उस पर जनता की प्रतिक्रिया को लेकर आयोजित की गई है। उनके अनुसार, विपक्ष के नारी विरोधी रुख को लेकर आधी आबादी में भारी आक्रोश है, जो कांग्रेस और इंडी गठबंधन के सहयोगी दलों—समाजवादी पार्टी, आरजेडी, टीएमसी, डीएमके आदि—के प्रति साफ दिखाई दे रहा है।
सीएम योगी ने कहा कि वर्ष 2023 में नारी शक्ति वंदन अधिनियम पारित हुआ था और महिला संगठनों की मांग पर इसे 2034 की बजाय 2029 में लागू करने के लिए केंद्र सरकार संशोधन लेकर आई। इसके लिए संसद का विशेष सत्र भी बुलाया गया और सभी पक्षों से विचार-विमर्श किया गया।
उन्होंने स्पष्ट किया कि प्रधानमंत्री ने पहले ही आश्वस्त किया था कि इस कानून के तहत किसी का हक नहीं छीना जाएगा और 33 प्रतिशत आरक्षण के लिए लोकसभा व विधानसभाओं में अतिरिक्त सीटें बढ़ाई जाएंगी। साथ ही 2011 की जनगणना के आधार पर राज्यों के बीच संतुलन बनाए रखने की बात भी कही गई।
सीएम योगी ने विपक्ष पर आरोप लगाते हुए कहा कि सदन के अंदर इंडी गठबंधन के दलों का आचरण बेहद गैर-जिम्मेदाराना था। उन्होंने इसकी तुलना महाभारत के द्रौपदी चीरहरण प्रसंग से करते हुए कहा कि जिस तरह की टिप्पणियां और व्यवहार देखने को मिला, वह लोकतांत्रिक मर्यादाओं के खिलाफ है।
उन्होंने कहा कि यदि सर्वसम्मति से यह विधेयक पारित होता तो पूरे सदन को इसका श्रेय मिलता और देश की महिलाओं को उनका अधिकार समय पर मिल जाता। लेकिन विपक्ष ने मुस्लिम महिलाओं के लिए अलग आरक्षण की मांग उठाकर संविधान की मूल भावना के विपरीत कार्य किया।
सीएम योगी ने भीमराव अंबेडकर का उल्लेख करते हुए कहा कि संविधान निर्माण के समय भी धर्म के आधार पर आरक्षण की मांग का विरोध किया गया था। उन्होंने अंबेडकर के विचारों का हवाला देते हुए कहा कि देश दूसरा विभाजन सहन नहीं कर सकता। साथ ही सरदार वल्लभभाई पटेल सहित संविधान सभा के सभी सदस्यों ने भी इस विचार का विरोध किया था।