भोपाल स्टेट म्यूजियम में 12वीं सदी की जिस प्रतिमा को वर्षों तक देवी सरस्वती माना गया, नई 3D मैपिंग और शोध में उसकी पहचान देवी गायत्री के रूप में हुई।

नई दिल्ली/अमर भारती। मध्य प्रदेश के भोपाल स्टेट म्यूजियम में संरक्षित 12वीं सदी की एक प्राचीन प्रतिमा को लेकर बड़ा ऐतिहासिक खुलासा हुआ है। लगभग 900 वर्षों से जिस प्रतिमा को देवी सरस्वती का स्वरूप माना जा रहा था, आधुनिक तकनीक और नए पुरातात्विक अध्ययन के बाद उसकी पहचान देवी गायत्री के रूप में की गई है। राज्य पुरातत्व विभाग की हाई-रिजॉल्यूशन 3D मैपिंग, विस्तृत डॉक्यूमेंटेशन और शिल्पशास्त्र आधारित अध्ययन ने इस लंबे समय से चली आ रही पहचान को बदल दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह खोज भारतीय मूर्तिकला और धार्मिक इतिहास के अध्ययन में महत्वपूर्ण साबित हो सकती है।
धार जिले से मिली थी 12वीं सदी की प्रतिमा
यह लाल बलुआ पत्थर से निर्मित प्रतिमा मध्य प्रदेश के धार जिले से प्राप्त हुई थी। धार कभी परमार राजवंश की राजधानी रहा था और मध्यकालीन भारतीय कला का प्रमुख केंद्र माना जाता है। वर्षों तक इस प्रतिमा पर देवी सरस्वती के रूप में शोध होता रहा, लेकिन हालिया वैज्ञानिक अध्ययन के बाद इसके स्वरूप का पुनर्मूल्यांकन किया गया।
3D मैपिंग से कैसे बदली पहचान?
राज्य पुरातत्व निदेशालय ने प्रतिमा की हाई-रिजॉल्यूशन 3D स्कैनिंग और डिजिटल डॉक्यूमेंटेशन कराया। इसके बाद प्रतिमा के प्रत्येक शिल्प तत्व का शास्त्रीय ग्रंथों और प्राचीन मूर्तिकला मानकों से मिलान किया गया। अध्ययन में पाया गया कि प्रतिमा में मौजूद प्रतीक देवी सरस्वती की बजाय देवी गायत्री के स्वरूप से अधिक मेल खाते हैं।
विशेषज्ञों ने क्या बताया?
पुरातत्वविद रमेश यादव के अनुसार, प्रतिमा में चार भुजाओं वाली देवी ललितासन मुद्रा में विराजमान हैं। उनके हाथों में—
- वेद
- कमल
- अक्षमाला (जपमाला)
दिखाई देती है। साथ ही उनके समीप हंस की सुंदर आकृति भी उकेरी गई है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह पूरा स्वरूप शिल्पशास्त्र और धार्मिक ग्रंथों में वर्णित देवी गायत्री के स्वरूप से पूरी तरह मेल खाता है।
सरस्वती और गायत्री की प्रतिमा में क्या है अंतर?
इतिहासकार एवं पुरातत्वविद बी.के. लोखंडे के अनुसार, गुप्तकाल के बाद देवी सरस्वती की प्रतिमाओं में वीणा प्रमुख पहचान मानी जाती रही है।
इस प्रतिमा में-
- वीणा नहीं है।
- चार भुजाओं में वेद का चित्रण है।
- अक्षमाला और कमल मौजूद हैं।
- हंस आध्यात्मिक ज्ञान का प्रतीक रूप में दर्शाया गया है।
इन्हीं विशेषताओं के आधार पर इसे देवी गायत्री की प्रतिमा माना गया है।
पश्चिमी चालुक्य शैली की झलक
विशेषज्ञों के अनुसार प्रतिमा में परमार कालीन मूर्तिकला के साथ पश्चिमी चालुक्य शैली की स्पष्ट झलक दिखाई देती है। भारत में देवी गायत्री की इतनी प्राचीन और संरक्षित प्रतिमाएं बेहद दुर्लभ मानी जाती हैं। इसलिए यह खोज भारतीय कला इतिहास के लिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
धार्मिक दृष्टि से क्यों है महत्वपूर्ण?
सनातन परंपरा में देवी गायत्री को वेदमाता, मंत्रमाता, ब्रह्मविद्या और जगन्माता के रूप में सर्वोच्च सम्मान प्राप्त है। ऋग्वेद में वर्णित प्रसिद्ध गायत्री मंत्र भारतीय आध्यात्मिक परंपरा का आधार माना जाता है। वहीं शतपथ ब्राह्मण और श्रीमद देवी भागवत पुराण में देवी गायत्री को ज्ञान और वेदों की अधिष्ठात्री देवी बताया गया है। इस नई पहचान के बाद प्रतिमा का धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व और बढ़ गया है।
भारतीय कला इतिहास में क्यों अहम है यह खोज?
विशेषज्ञों का मानना है कि यह खोज केवल एक प्रतिमा की पहचान बदलने तक सीमित नहीं है। इससे-
- भारतीय मूर्तिकला के अध्ययन को नई दिशा मिलेगी।
- मध्यकालीन धार्मिक कला की समझ और स्पष्ट होगी।
- भविष्य में संग्रहालयों में संरक्षित अन्य प्राचीन प्रतिमाओं का भी आधुनिक तकनीक से पुनर्मूल्यांकन किया जा सकता है।
भोपाल स्टेट म्यूजियम गायत्री मूर्ति की नई पहचान भारतीय पुरातत्व और सांस्कृतिक विरासत के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि मानी जा रही है। हाई-रिजॉल्यूशन 3D मैपिंग और शास्त्रीय अध्ययन के आधार पर लगभग 900 वर्षों से देवी सरस्वती मानी जा रही इस प्रतिमा को अब देवी गायत्री के रूप में पहचाना गया है। यह खोज न केवल इतिहासकारों और पुरातत्वविदों के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि भारतीय धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत की समझ को भी नई दिशा देती है।
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