
विनय उपाध्याय
कुशीनगर। श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के तीसरे दिन पडरौना शहर में परंपरागंत डोल मेला रविवार की रात से शुरू होकर सकुशल सोमवार की सुबह संपन्न हो गया। बता दें कि डोल मेला हमारी धार्मिक परंपरा, लोक संस्कृति और सामूहिक आस्था का प्रतीक माना जाता है। लेकिन हर बार की तरह तमकुहीरोड के तर्ज पर आस्था की चौखट पर भक्ति के गीतों की जगह आर्केस्ट्रा का शोर, धार्मिक माहौल की जगह फूहड़ गीत और सांस्कृतिक कार्यक्रम की जगह नर्तकियों के कथित अश्लील नृत्य ने डोल मेले की मर्यादा पर ही सवाल खड़े कर दिए।
हर साल की तरह इस बार भी पडरौना नगर के छावनी, सुभाष चौक, बेलवा चुंगी, कसेरा टोली, तुरहा टोली, दरबार रोड, तिलक चौक तुरहाटोली, समेत सभी अखाड़ों के खिलाड़ी भगवान श्रीकृष्ण की डोल की पूजा-अर्चना के बाद रात के साढे दस बजे से नगर भ्रमण के लिए निकले। अखाड़ा दल आर्केस्ट्रा के साथ शहर के मुख्य सड़को से होते हुए तमाम मुहल्लों का भ्रमण करने के बाद नगर के सुभाष चौक पहुंचे और वहां से प्रमुख मार्गों से होकर शहर का भ्रमण किये। लोगों ने जगह-जगह डोल में स्थित भगवान श्रीकृष्ण की मूर्तियों की विधिवत पूजा-अर्चना की।
हालांकि इधर कुछ वर्षों से डोल मेला मे आर्केस्ट्रा नर्तकियो के अश्लील व फूहड़ नृत्यगान पर प्रतिबंध के बाद भी पिछले साल की तरह इस बार भी डोल मेला में भक्ति गीतो की अपेक्षा जमकर अश्लीलता परोसी गयी। नतीजा यह रहा कि ट्रैक्टर-ट्रॉली पर आर्केस्ट्रा सजाकर रातभर कार्यक्रम चलता रहा। उसके पीछे युवाओं की भीड़ भी चलती रही और नृत्य करती रही।आर्केस्ट्रा में शामिल नर्तकियों ने ऐसे नृत्य और प्रस्तुतियां की, जिन्हें धार्मिक आयोजन की गरिमा के अनुरूप नहीं माना जा सकता। सवाल यह भी उठ रहा है कि यदि आयोजकों की नजर के सामने यह सब होता रहा तो इसे रोकने की कोशिश क्यों नहीं की गई?
श्रीकृष्ण की भक्ति के बीच ‘ठुमकों’ का प्रदर्शन क्यों ?
डोल मेला महज मनोरंजन का मंच नहीं है। यह भगवान श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं, भक्ति और सनातन परंपरा से जुड़ी धार्मिक विरासत है। ऐसे आयोजन में लोकगीत, भजन, धार्मिक झांकियां और पारंपरिक प्रस्तुतियां हों तो वह संस्कृति को आगे बढ़ाती हैं। लेकिन जब धार्मिक जुलूस में अश्लील गीत और आपत्तिजनक नृत्य हावी हो जाएं तो सवाल सिर्फ मनोरंजन का नहीं, बल्कि धार्मिक मर्यादा का बन जाता है। श्रद्धालुओं का कहना है कि आस्था के पर्व को मनोरंजन के नाम पर अश्लीलता का मंच बना देना किसी भी स्थिति में उचित नहीं कहा जा सकता।
आयोजकों की ‘सहमति’ पर उठ रहे सवाल
सबसे गंभीर सवाल आयोजन समितियों की भूमिका को लेकर है। यदि आर्केस्ट्रा में आपत्तिजनक गीत और नृत्य प्रस्तुत किए जा रहे थे, तो आयोजकों ने उन्हें रोकने की पहल क्यों नहीं की? क्या कार्यक्रम की पहले से कोई निगरानी व्यवस्था थी? क्या आयोजकों को इस बात की जानकारी नहीं थी कि धार्मिक जुलूस में किस तरह की प्रस्तुति होनी चाहिए?
अगर सब कुछ आंखों के सामने हुआ और फिर भी कार्यक्रम चलता रहा, तो इसे महज ‘मनोरंजन’ कहकर जिम्मेदारी से बचा नहीं जा सकता।

आस्था के नाम पर अश्लीलता कब तक ?
डोल मेला में आने वाले श्रद्धालुओं में महिलाएं, बच्चे और बुजुर्ग भी शामिल होते हैं। ऐसे में धार्मिक जुलूस के दौरान खुलेआम फूहड़ गीत और आपत्तिजनक नृत्य का प्रदर्शन सामाजिक रूप से भी गंभीर सवाल पैदा करता है। लोगों का कहना है कि प्रशासन को धार्मिक आयोजनों की अनुमति देते समय केवल भीड़ और सुरक्षा व्यवस्था पर ही नहीं, बल्कि कार्यक्रम की मर्यादा और स्वरूप पर भी नजर रखनी चाहिए।
प्रशासन से सख्त कार्रवाई की मांग
आस्था से जुड़े लोगों ने जिला प्रशासन से मांग की है कि जिले में आयोजित होने वाले डोल मेलों के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी किए जाएं। धार्मिक जुलूसों में अश्लील गीत, फूहड़ नृत्य और आपत्तिजनक प्रस्तुतियों पर प्रभावी रोक लगाई जाए तथा नियमों का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ कठोर कार्रवाई की जाए।क्योंकि सवाल सिर्फ एक मेले का नहीं है। सवाल यह है कि क्या हमारी धार्मिक परंपराओं को मनोरंजन के नाम पर धीरे-धीरे अपनी मूल पहचान खोने दिया जाएगा? भगवान श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव प्रेम, भक्ति, संस्कार और धर्म की विजय का पर्व है। ऐसे पवित्र अवसर पर यदि आस्था के बीच अश्लीलता के ठुमके लगेंगे, तो सवाल उठेंगे ही। डोल की परंपरा बचानी है तो भक्ति की मर्यादा भी बचानी होगी। वरना आने वाली पीढ़ी डोल मेले को धार्मिक परंपरा के रूप में नहीं, बल्कि आर्केस्ट्रा और फूहड़ मनोरंजन के आयोजन के रूप में याद करेगी।
टकटकी लगाये करते रहे दायित्वों का निर्वहन
मजे की बात यह है कि पुलिस और पीएसी के जवान सभी धार्मिक डोल व अखाड़ों के साथ मुस्तैदी से तैनात रहे और विभिन्न अखाड़ा समितियो द्वारा बाहर से बुलाये गये आर्केस्ट्रा मे नर्तकियो के फूहड नृत्य के जरिए परोसी जा रही अश्लीलता को मुस्तैद खाकी के जवान टकटकी लगाये देखते रहते हुए अपने दायित्वों का निर्वहन करते रहे ।
डोल मेला से लुप्त हो रही है धार्मिक झांकियां
कहना ना होगा कि धार्मिक व पारम्परिक डोल मेला अब आर्केस्ट्रा बालाओं के अश्लील डांस की रौंनक बन कर रह गयी है। नतीजतन रातभर चले मेला मे मर्यादा तार-तार होती रही। आर्केस्ट्रा के नाम पर खुलेआम नंगा नाच का दौर चलता रहा है। इसके बावजूद धर्म और संस्कृति के ठेकेदार बनने वाले संगठन व मेला संचालक धृतराष्ट्र बने बैठे हैं।