Vikram Batra: वो सिर्फ एक फौजी नहीं थे, वो जिंदा जज्बा थे। जिनकी रगों में हिंदुस्तान दौड़ता था। जिनकी आखिरी सांसें भी तिरंगे को सलाम कर रही थीं। कारगिल युद्ध के वो शेर , कैप्टन विक्रम बत्रा। आइए जानते हैं उनकी वीरता की अमर कहानी।”
Vikram Batra: कारगिल जंग में बहादुरी
विक्रम बत्रा का जन्म 9 सितंबर 1974 को हिमाचल प्रदेश के पालमपुर में हुआ। बचपन से ही उनमें देशभक्ति और फौज के लिए जुनून था। IMA देहरादून से ट्रेनिंग के बाद उन्हें 13 JAK RIF में नियुक्त किया गया।
“जुलाई 1999 में जब कारगिल युद्ध अपने चरम पर था, कैप्टन बत्रा को टाइगर हिल और प्वाइंट 5140 जैसे महत्वपूर्ण पोस्ट्स को दुश्मन से छुड़ाने का जिम्मा सौंपा गया। उन्होंने न सिर्फ मिशन को पूरा किया, बल्कि अपने साथी सैनिकों की जान बचाते हुए वीरगति को प्राप्त हुए।”
“हमारा झंडा कभी झुकेगा नहीं – ये सिर्फ उनके शब्द नहीं थे, बल्कि उन्होंने उसे अपने लहू से सच किया।”
“उनका कोड वर्ड था – Yeh Dil Maange More – जो आज भी फौजियों के दिल की आवाज़ है।”
मरणोपरांत सम्मान और प्रेरणा
कैप्टन विक्रम बत्रा को मरणोपरांत भारत का सर्वोच्च युद्ध सम्मान परमवीर चक्र प्रदान किया गया।
उनकी शहादत पर बनी फिल्म ‘शेरशाह’ ने आज की युवा पीढ़ी को उनके बलिदान से रूबरू कराया।
“कैप्टन विक्रम बत्रा सिर्फ नाम नहीं, वो हर भारतीय का गर्व हैं। उनका साहस, त्याग और ‘दिल मांगे मोर’ वाला जज़्बा हमें हर मुश्किल में आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है। कारगिल के इस अमर शहीद को हमारी भावभीनी श्रद्धांजलि। जय हिन्द!
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