
लखनऊ। लखनऊ पुलिस कमिश्नरेट की ‘स्पेशलाइज्ड ट्रेनिंग शाखा’ द्वारा विवेचना में वैज्ञानिक साक्ष्यों की भूमिका, ‘लोकार्ड थ्योरी’ और क्राइम सीन प्रोटेक्शन विषय पर एक दिवसीय विशेष प्रशिक्षण कार्यशाला का आयोजन किया गया। यह कार्यशाला रिजर्व पुलिस लाइन्स स्थित संगोष्ठी सदन में आयोजित की गई, जिसमें लगभग 70 पुलिस कर्मियों ने भाग लिया।

यह प्रशिक्षण कार्यक्रम उत्तर प्रदेश शासन और पुलिस मुख्यालय के निर्देशों के अनुपालन में अमरेन्द्र कुमार सेंगर के निर्देशन में आयोजित किया गया। कार्यक्रम में संयुक्त पुलिस आयुक्त (अपराध एवं मुख्यालय) अपर्णा कुमार, संयुक्त पुलिस आयुक्त (कानून एवं व्यवस्था) बबलू कुमार तथा पुलिस उपायुक्त मुख्यालय अनिल कुमार यादव का मार्गदर्शन रहा।
कार्यशाला का पर्यवेक्षण सहायक पुलिस आयुक्त (महिला अपराध/साइबर क्राइम) सौम्या पांडेय ने किया। प्रशिक्षण सत्र में मुख्य वक्ता के रूप में विधि विज्ञान प्रयोगशाला लखनऊ की वैज्ञानिक अधिकारी मनीषा और उनकी टीम ने पुलिस कर्मियों को विस्तृत जानकारी दी।
कार्यशाला का मुख्य विषय “घटनास्थल के प्रकार तथा घटनास्थल को सुरक्षित करने की प्रक्रिया” रहा। इस दौरान इंडोर और आउटडोर क्राइम सीन के प्रबंधन, साक्ष्यों के संरक्षण और वैज्ञानिक जांच के विभिन्न पहलुओं पर विस्तार से चर्चा की गई। प्रशिक्षण में ‘लोकार्ड के विनिमय सिद्धांत’ (Every contact leaves a trace) के महत्व को समझाते हुए बताया गया कि घटनास्थल पर मौजूद सूक्ष्म भौतिक साक्ष्य जैसे बाल, रेशे, रक्त और मिट्टी के नमूने अपराध की जांच में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
प्रशिक्षण सत्र के दौरान पुलिस कर्मियों को आधुनिक फॉरेंसिक तकनीकों जैसे स्केल फोटोग्राफी, एविडेंस मार्किंग और प्रभावी वीडियोग्राफी के बारे में भी जानकारी दी गई। विशेषज्ञों ने बताया कि इन तकनीकों की मदद से घटनास्थल का सटीक पुनर्निर्माण (क्राइम सीन रिकंस्ट्रक्शन) संभव होता है, जो जटिल आपराधिक मामलों की जांच में अहम साबित होता है।
वैज्ञानिक अधिकारी मनीषा ने बताया कि अपराध स्थल की सही तरीके से सुरक्षा और साक्ष्यों का वैज्ञानिक ढंग से संकलन ही किसी भी मामले की मजबूत विवेचना की नींव होता है। यदि घटनास्थल पर मौजूद सूक्ष्म साक्ष्यों को सही तरीके से सुरक्षित किया जाए तो अदालत में अपराधियों के खिलाफ मजबूत साक्ष्य प्रस्तुत किए जा सकते हैं और सजा दिलाने की संभावना बढ़ जाती है।
पुलिस अधिकारियों ने बताया कि इस तरह के तकनीकी प्रशिक्षण कार्यक्रमों का उद्देश्य पुलिस कर्मियों को आधुनिक फॉरेंसिक उपकरणों और प्रक्रियाओं के प्रति दक्ष बनाना है, ताकि वे वैज्ञानिक साक्ष्यों के आधार पर त्रुटिहीन विवेचना कर सकें।
अधिकारियों के अनुसार इस प्रशिक्षण से पुलिस कर्मियों की पेशेवर दक्षता में वृद्धि होगी और भविष्य में अपराधों की जांच अधिक वैज्ञानिक और प्रभावी ढंग से की जा सकेगी। इससे न केवल क्राइम सीन की सटीक जांच संभव होगी बल्कि अदालत में अपराधियों के खिलाफ मजबूत साक्ष्य पेश कर सजा दिलाने की दर भी बढ़ेगी।