केतन अग्रवाल हत्याकांड में पुणे पुलिस ने मुख्य आरोपी सिया गोयल के पॉलीग्राफ टेस्ट की अनुमति के लिए अदालत में अर्जी दी। जानिए जांच में अब तक क्या सामने आया।

नई दिल्ली/अमर भारती। केतन अग्रवाल हत्याकांड की जांच में एक महत्वपूर्ण मोड़ सामने आया है। पुणे पुलिस ने मामले की मुख्य आरोपी सिया गोयल का पॉलीग्राफ (लाई डिटेक्टर) टेस्ट कराने के लिए अदालत में अनुमति याचिका दायर की है। जांच एजेंसियों का कहना है कि अब तक मिले साक्ष्यों से यह स्पष्ट नहीं हो पाया है कि केतन अग्रवाल को खाई में किसने धक्का दिया। इसी वजह से पुलिस अब वैज्ञानिक जांच प्रक्रिया की मदद से मामले की सच्चाई तक पहुंचने का प्रयास कर रही है।
प्रत्यक्षदर्शी और निर्णायक साक्ष्य का अभाव
वरिष्ठ पुलिस सूत्रों के अनुसार, जांच के दौरान अब तक ऐसा कोई प्रत्यक्षदर्शी (आई-विटनेस) सामने नहीं आया है, जिसने घटना को अपनी आंखों से देखा हो। इसके अलावा उपलब्ध भौतिक साक्ष्य भी यह तय करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं कि घटना के समय वास्तव में क्या हुआ था। इसी कारण जांच अधिकारियों का मानना है कि केवल मौजूदा साक्ष्यों के आधार पर घटनाक्रम की पूरी कड़ी जोड़ना चुनौतीपूर्ण है। पुलिस का उद्देश्य उपलब्ध तथ्यों की पुष्टि करना और जांच को तार्किक दिशा देना है।
सिया गोयल और सह-आरोपी के बयान दर्ज
पुलिस के अनुसार, मुख्य आरोपी सिया गोयल और सह-आरोपी चेतन चौधरी के बयान पहले ही दर्ज किए जा चुके हैं। हालांकि, जांच एजेंसियों का मानना है कि दोनों के बयानों की सत्यता और घटनाक्रम के विभिन्न पहलुओं की पुष्टि के लिए अतिरिक्त जांच की आवश्यकता है। इसी को ध्यान में रखते हुए पुलिस ने अदालत से पॉलीग्राफ टेस्ट कराने की अनुमति मांगी है। अधिकारियों का कहना है कि यदि अदालत अनुमति देती है, तो जांच के दौरान सामने आए सवालों के जवाब तलाशने में मदद मिल सकती है।
पॉलीग्राफ टेस्ट क्यों कराना चाहती है पुलिस?
केतन अग्रवाल हत्याकांड में पुलिस का कहना है कि पॉलीग्राफ टेस्ट का उद्देश्य आरोपियों के बयानों की विश्वसनीयता का परीक्षण करना है। जांच एजेंसियों के मुताबिक, यह परीक्षण किसी व्यक्ति की शारीरिक प्रतिक्रियाओं के आधार पर पूछे गए सवालों के दौरान संभावित विसंगतियों का विश्लेषण करने में सहायक हो सकता है। हालांकि, किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले पुलिस अन्य उपलब्ध साक्ष्यों, फोरेंसिक रिपोर्ट और गवाहों के बयानों का भी मिलान करेगी।
क्या अदालत में मान्य होता है पॉलीग्राफ टेस्ट?
कानूनी दृष्टि से पॉलीग्राफ (लाई डिटेक्टर) टेस्ट की रिपोर्ट को अदालत में प्रत्यक्ष (डायरेक्ट) साक्ष्य नहीं माना जाता। इसका उपयोग मुख्य रूप से जांच एजेंसियां नए सुराग प्राप्त करने, संदिग्ध बयानों की जांच करने और आगे की जांच की दिशा तय करने के लिए करती हैं। भारत में किसी आरोपी का पॉलीग्राफ टेस्ट उसकी सहमति और न्यायालय की अनुमति के बिना नहीं कराया जा सकता। यदि परीक्षण की अनुमति मिलती है, तब भी उसकी रिपोर्ट अकेले किसी व्यक्ति को दोषी या निर्दोष साबित नहीं करती।
जांच का अगला चरण
पुलिस को उम्मीद है कि अदालत से अनुमति मिलने के बाद जांच को नई दिशा मिल सकती है। इसके साथ ही फोरेंसिक साक्ष्य, डिजिटल रिकॉर्ड और अन्य परिस्थितिजन्य तथ्यों की भी विस्तृत जांच जारी रहेगी। जांच एजेंसियों का कहना है कि उनका उद्देश्य मामले के हर पहलू की निष्पक्ष जांच कर वास्तविक घटनाक्रम सामने लाना है। फिलहाल अदालत के निर्णय का इंतजार किया जा रहा है।
केतन अग्रवाल हत्याकांड की जांच अभी जारी है और पुलिस वैज्ञानिक जांच तकनीकों का सहारा लेकर मामले की गुत्थी सुलझाने का प्रयास कर रही है। पॉलीग्राफ टेस्ट की मांग इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है, हालांकि इसका परिणाम स्वयं में अंतिम कानूनी साक्ष्य नहीं होगा। मामले में आगे की कार्रवाई अदालत के आदेश और जांच में मिलने वाले नए तथ्यों पर निर्भर करेगी।