
लखनऊ। किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय में दवाओं, इंप्लांट, स्टेंट और सर्जिकल उपकरणों की खरीद एवं वितरण में सामने आए करोड़ों रुपये के घोटालों के बाद प्रशासन ने इलाज प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी और जवाबदेह बनाने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है। संस्थान अब एक अत्याधुनिक डिजिटल व्यवस्था लागू करने जा रहा है, जिसके तहत मरीज के पंजीकृत मोबाइल नंबर पर ओटीपी सत्यापन के बाद ही दवाएं, इंप्लांट और अन्य चिकित्सा सामग्री जारी की जाएगी। प्रशासन का मानना है कि इस व्यवस्था से चिकित्सा सामग्री के वितरण की निगरानी मजबूत होगी और अनियमितताओं पर प्रभावी अंकुश लगाया जा सकेगा।
यूरोलॉजी विभाग में ढाई करोड़ के घपले के बाद लिया गया फैसला
यह निर्णय यूरोलॉजी विभाग में सामने आए करीब ढाई करोड़ रुपये के घोटाले के बाद लिया गया है। जांच में खुलासा हुआ था कि कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों में इस्तेमाल होने वाली महंगी दवाएं पेशाब और गुर्दे के मरीजों के नाम पर जारी की गई थीं। जांच समिति ने मामले में अनियमितताओं की पुष्टि की थी, जिसके बाद संबंधित चिकित्सक और कर्मचारियों के खिलाफ कार्रवाई की गई। इस प्रकरण के बाद केजीएमयू प्रशासन ने सात अन्य विभागों में भी खरीद और वितरण प्रक्रियाओं की जांच शुरू कर दी है, ताकि किसी अन्य विभाग में भी इसी तरह की गड़बड़ियों का पता लगाया जा सके।
मरीज की भर्ती से उपचार तक की हर जानकारी होगी ऑनलाइन दर्ज
केजीएमयू के प्रवक्ता डॉ. केके सिंह के मुताबिक संस्थान का आईटी विभाग एक विशेष मोबाइल एप विकसित कर रहा है। यह एप मरीज की भर्ती से लेकर उपचार की पूरी प्रक्रिया को रियल टाइम में रिकॉर्ड करेगा। मरीज को दी जाने वाली दवाएं, इंप्लांट और अन्य चिकित्सा सामग्री इसी एप के माध्यम से दर्ज और वितरित की जाएगी। अधिकारियों का दावा है कि नई व्यवस्था लागू होने के बाद इलाज से जुड़ी प्रत्येक गतिविधि का डिजिटल रिकॉर्ड उपलब्ध रहेगा, जिससे जवाबदेही और पारदर्शिता दोनों बढ़ेंगी।
फर्जी मरीजों के जरिए सेंधमारी की आशंका भी बरकरार
हालांकि प्रस्तावित व्यवस्था को लेकर कुछ सवाल भी उठ रहे हैं। सूत्रों का कहना है कि दवा और इंप्लांट वितरण की प्रक्रिया मोबाइल नंबर आधारित होने के कारण इसमें फर्जी मरीजों के जरिए सेंधमारी की आशंका से पूरी तरह इनकार नहीं किया जा सकता। आशंका जताई जा रही है कि गोलमाल करने वाले लोग परिवार या परिचितों के मोबाइल नंबरों को मरीज के रूप में पंजीकृत कर व्यवस्था का दुरुपयोग करने की कोशिश कर सकते हैं। ऐसे संभावित मामलों को रोकने के लिए क्या अतिरिक्त सुरक्षा उपाय किए जाएंगे, यह एप के लॉन्च और उसके संचालन के बाद ही स्पष्ट हो सकेगा।
ओटीपी के बिना नहीं होगी सामग्री जारी, मरीज को मिलेगी पूरी जानकारी
नई व्यवस्था के तहत किसी भी दवा, इंप्लांट या सर्जिकल उपकरण को जारी करने से पहले संबंधित मोबाइल नंबर पर ओटीपी भेजा जाएगा। सत्यापन पूरा होने के बाद ही सामग्री निर्गत की जा सकेगी। इसके अलावा मरीज या उनके परिजन एप पर यूएचआईडी नंबर दर्ज कर इलाज से जुड़ी पूरी जानकारी प्राप्त कर सकेंगे। प्रशासन का दावा है कि डिजिटल निगरानी आधारित यह प्रणाली फर्जी तरीके से दवाएं जारी करने और रिकॉर्ड में हेरफेर जैसी अनियमितताओं पर प्रभावी रोक लगाने में मददगार साबित होगी।