रिपोर्ट – पंकज चतुर्वेदी

बाराबंकी। तहसील सिरौली गौसपुर के किंतूर गांव स्थित श्री कुंतेश्वर महादेव मंदिर अपनी पौराणिक मान्यताओं, रहस्यमयी घटनाओं और धार्मिक महत्व के कारण प्रदेश के प्रमुख शिवधामों में गिना जाता है। महाभारत काल से जुड़ा यह मंदिर सावन, गुरु पूर्णिमा और अन्य पर्वों पर हजारों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बन जाता है।
पौराणिक मान्यता के अनुसार वनवास के दौरान पांडवों की माता कुंती ने सरयू नदी के तट पर इस शिवलिंग की स्थापना की थी। कहा जाता है कि महाबली भीम हिमालय से बहंगी में दो दिव्य शिलाएं लेकर आए थे। इनमें से एक शिला से किंतूर में कुंतेश्वर महादेव और दूसरी से रामनगर क्षेत्र के लोधौरा गांव में लोधेश्वर महादेव की स्थापना हुई। माता कुंती के नाम पर ही इस धाम का नाम कुंतेश्वर पड़ा।
मंदिर की सबसे अनोखी विशेषता यहां का स्वयं पूजित शिवलिंग माना जाता है। मंदिर के पुजारी शीतल प्रसाद के अनुसार प्रतिदिन रात्रि में मंदिर बंद करने से पहले शिवलिंग से पूजा सामग्री हटा दी जाती है, लेकिन सुबह कपाट खुलने पर शिवलिंग फिर से पूजित अवस्था में दिखाई देता है। स्थानीय श्रद्धालुओं का विश्वास है कि रात्रि में किसी अदृश्य दिव्य शक्ति द्वारा भगवान शिव का जलाभिषेक होता है और माता कुंती स्वयं यहां आकर पूजा-अर्चना करती हैं। कई लोगों का दावा है कि रात के समय मंदिर परिसर से घंटा-घड़ियाल की ध्वनि भी सुनाई देती है। बताया जाता है कि इस रहस्य को जानने के लिए एक टीवी चैनल ने कैमरे भी लगाए थे, लेकिन कैमरा अचानक गिर गया और रहस्य बरकरार रहा।
एक अन्य पौराणिक कथा के अनुसार माता कुंती ने भगवान शिव से स्वर्ण पुष्पों से अभिषेक कराने का वर मांगा था। भगवान श्रीकृष्ण की सलाह पर अर्जुन इंद्रलोक से पारिजात वृक्ष लेकर आए। इसी कारण आज भी श्रद्धालु पारिजात के पुष्प अर्पित कर अपनी मनोकामनाएं मांगते हैं।
सावन के प्रत्येक सोमवार, मलमास, गुरु पूर्णिमा और अन्य विशेष अवसरों पर यहां श्रद्धालुओं का विशाल जनसैलाब उमड़ता है। लोधेश्वर महादेव धाम जाने वाले अधिकांश कांवरिए भी पहले कुंतेश्वर महादेव के दर्शन कर अपनी यात्रा आगे बढ़ाते हैं। मंदिर परिसर धार्मिक आयोजनों, भागवत कथा, रासलीला और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का भी प्रमुख केंद्र बना रहता है।